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Bharat Tiwari Encounter: पुलिस की सामंतशाही ने एक और जीवन किया खत्म

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Bharat Tiwari Encounter: पुलिस की सामंतशाही ने एक और जीवन किया खत्म

रंजन श्रीवास्तव

30 वर्षीय भरत भूषण तिवारी एक सामान्य किसान परिवार का पुत्र था. वह उसी बीमारी से ग्रस्त था जिस बीमारी से देश के लाखों नौजवान ग्रस्त होते हैं यानि सत्ता और व्यवस्था को भ्रष्टाचार रहित होकर जनता के हित में काम करते हुए देखना. उसका दिवास्वप्न उसी दिन टूट गया जब उसने देखा कि एसडीएम और अन्य अधिकारी आज भी ब्रिटिश राजशाही के तौर तरीकों से ही काम कर रहे हैं.

बिहार के भोजपुर जिले के बिलौटा गांव का यह युवक अपनी लड़ाई नहीं लड़ रहा था. उसकी लड़ाई अपनी जाति और समुदाय के हितों के भी नहीं थी. वह अपने गाँव के गंगा कटाव से सभी प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा दिलाने की लड़ाई लड़ रहा था.

बिलौटी गांव और उसके आसपास के इलाके गंगा कटाव से गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्र हैं. भरत के गाँव के कई घर लगातार कटाव के कारण गंगा नदी में समा गए थे और प्रभावित लोग बहुत समय से पुनर्वास और मुआवजा की माँग कर रहे थे. यही मुद्दा भरत तिवारी लगातार उठा रहे थे.

रिपोर्टों के अनुसार गंगा कटाव से प्रभावित परिवारों के लिए प्रशासन ने कुछ भूमि चिह्नित की थी और कई परिवारों को वहां बसाने की प्रक्रिया शुरू की थी पर जिन जगहों पर बसाने की बात हुई, वहां पर्याप्त बुनियादी सुविधाएं नहीं थीं. ग्रामीणों के अनुसार सिर्फ यही नहीं बल्कि पुनर्वास की गति बहुत धीमी थी और विस्थापित परिवारों को स्थायी आजीविका का समाधान नहीं मिला था. साथ ही वे गंगा कटाव से बचने के लिए स्थायी समाधान चाहते थे. इन परिवारों में सभी जाति समुदाय के लोग थे और इनके से अधिकतर समाज के निचले और पिछड़े तबके से आते हैं.

जब संबंधित एसडीएम और अन्य अधिकारियों के यहाँ लगातार चक्कर लगाने के बावजूद भी उचित समाधान नहीं मिला तो भरत तिवारी ने कुंठा में आकर पिस्तौल हाथ में उठा ली तथा उसने क्रांतिकारियों के रास्ते चलकर अपनी मांगों को पूरा करवाना चाहा. ये एक गलती थी भरत की जिसने पुलिस को एक ऐसा हथियार दे दिया जिससे वह किसी की भी जान ले सके चाहे वह हत्या की श्रेणी में ही क्यों ना हो.

भरत ने स्वयं उस घटना को फेसबुक पर लाइव स्ट्रीम किया. उसने किसी पुलिस जवान या अधिकारी पर हमला नहीं किया पर वह क्रांति की बातें कर रहा था और अपनी मांगों को पूरा नहीं होने पर सिस्टम को भला बुरा बोल रहा था.

फेसबुक लाइव के पीछे संभवतः भरत उस अपनी उस आशंका को दूर करना चाहता था कि पुलिस उसका “एनकाउंटर” कर देगी अतः अगर वह पूरी घटना को लाइव दिखाएगा तो पुलिस के पास एनकाउंटर करने का कोई बहाना नहीं मिलेगा. अपने अंतिम फेसबुक लाइवस्ट्रीमिंग में वह बार बार बोल भी रहा था कि पुलिस उसको एनकाउंटर में मार देगी. उसने अपना हथियार फेंककर उसको भी फेसबुक पर दिखाया पर उसको नहीं पता था कि अगर पुलिस चाहे तो किसी ऐसे व्यक्ति को भी फर्जी एनकाउंटर में मार सकती है, जिसने भले ही कोर्ट के सामने भी आत्मसमर्पण किया हो.

जिन्होंने उस दृश्य को देखा हो उसको फिर से याद करें. जिन्होंने नहीं देखा हो वो उस दृश्य की कल्पना करें कि कैसे एक पिता अपने पुत्र के जीवन की रक्षा के लिए उसकी पिटाई कर रहा है कि वह पुलिस की कस्टडी में चला जाये और कैसे एक पुत्र पुलिस की कस्टडी में जाने के विरुद्ध प्रतिरोध कर रहा है इस आशंका से कि उसकी पुलिस कस्टडी में हत्या कर दी जाएगी.

अंततः वही हुआ. अपने अहंकार को चोट लगने से पुलिस ने वह कर ही दिया जिसकी आशंका भरत को थी. पिता स्वयं पुलिस बुलाकर अपने पुत्र की सुरक्षा चाहता था वह भी ग़लत साबित हुआ. उसे अपने पुत्र का शव ही वापस मिला.

पुलिस की सामंतवादी सोच और कार्यप्रणाली पर देश के उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय तक कई बार गंभीर टिप्पणी कर चुके हैं. पुलिस की कार्यक्रमों में रिफार्म पर और उसे आधुनिक बनाने के लिए कमीशन भी गठित हो चुके हैं पर सुधार नगण्य है.

नियमित अंतराल पर पुलिस द्वारा टार्चर, कस्टोडियल किलिंग और महकमे में भ्रष्टाचार की खबरें आती रहती हैं पर दुर्भाग्य से सत्ताधीशों द्वारा इसको जानबूझकर नजरअंदाज किया जाता है.

पर भरत तिवारी की मौत के कारण इस समय बिहार में सामाजिक और राजनीतिक भूचाल आया हुआ है. फेसबुक पर वह दृश्य जिसे स्वयं भरत तिवारी लाइव दिखा रहा था और अपना हथियार पुलिस के सामने फेंकते हुए दिखाई दे रहा है. पुलिस कस्टडी में जाने के बाद भरत के ऊपर 5 गोलियां दागी गईं जिससे उसकी मौत हुई. यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि गाँव वालों के कथनानुसार पुलिस कस्टडी में जाने के बाद उन्हें तीन गोलियों की आवाज सुनाई दी.

तो क्या दो गोलियां बाद में पुलिस द्वारा इसलिए दागी गईं कि अस्पताल ले जाने के पूर्व उसकी मौत को सुनिश्चित किया जा सके?

भरत की मौत पुलिस और सरकार के गले की हड्डी बन गया है. पुलिस के पास ऐसा कोई वीडियो या अन्य एविडेंस नहीं है जिससे वह अपने कथित एनकाउंटर को सही ठहरा पाए. उच्च पुलिस अधिकारियों ने गलती तो मानी है पर हत्या के लिए नहीं बल्कि थाना प्रभारी सहित पाँच पुलिस कर्मियों को सेवा से निलंबित इसलिए किया गया है कि वे शुरुआती तौर पर ही मामले को नियंत्रित नहीं कर सके. पर क्या पुलिस ने एनकाउंटर बिना पुलिस अधीक्षक के अनुमति के की होगी? यह भी एक सवाल है? अगर अनुमति थी तो पुलिस अधीक्षक के ख़िलाफ़ कार्रवाई क्यों नहीं?

सरकार ने उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अगुवाई में न्यायिक जांच का गठन कर दिया है. एक वर्ग सोशल मीडिया पर भरत तिवारी को भगत सिंह और चंद्रशेखर जैसे क्रांतिकारी की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं.

भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी डिफेंसिव मोड में दिख रहे हैं क्योंकि राजनीतिक रूप से अपनी उपेक्षा होने से उत्तर प्रदेश और बिहार में ब्राह्मण समुदाय के लोग पहले से ही भाजपा से खफा हैं. पर भरत तिवारी के मामले में अन्य कई वर्ग भी उद्वेलित हैं. भाजपा को 2024 के लोक सभा चुनावों में बिहार में आशा से अधिक सफलता और उत्तर प्रदेश में तो उसे घोर विफलता मिली थी.