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राज काज : इन्होंने अपने संत पिता की छवि पर भी लगा दिया बट्टा….! 

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राज काज : इन्होंने अपने संत पिता की छवि पर भी लगा दिया बट्टा….!

दिनेश निगम ‘त्यागी’

इन्होंने अपने संत पिता की छवि पर भी लगा दिया बट्टा….!

– है न हैरान करने वाली बात, भाजपा में संत नेता की उपाधि पाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय कैलाश जोशी के बेटे पूर्व मंत्री दीपक जोशी कथित तौर पर तीन-तीन शादियां कर रहे हैं और थाने में शिकायत दर्ज करा रहे हैं कि उनकी दो पत्नियां उनकी छवि खराब कर रही हैं। दीपक जी, इतनी शादियां कर आपने पहले ही अपने साथ अपने संत पिता की छवि पर बट्टा लगा रखा है। छवि का कचरा तब और हुआ जब एक पत्नी नम्रता जोशी ने कोर्ट में पल्लवी के साथ शादी को शून्य घोषित करने के साथ घरेलू हिंसा का मामला दायर कर दिया। पल्लवी के साथ शादी के बाद वायरल कुछ वीडियो के कारण दीपक की अलग ही छवि सार्वजनिक हुई। भाजपा-कांग्रेस में आने-जाने के कारण वे पहले ही अप्रासंगिक हो चले थे, शादी प्रकरण ने उन्हें राजनीति में कहीं का नहीं छोड़ा। दीपक जोशी कथित दो पूर्व पत्नियों के दावे को गलत बता रहे हैं। उन्होंने थाने में शिकायत की है कि शिखा मित्रा, नमृता जोशी और महेंद्र जाट सोशल मीडिया के जरिए उन्हें बदनाम कर रहे हैं। आपत्तिजनक टिप्पणियों, फोटो क्राप कर वायरल करने की धमकी के साथ चरित्र हनन के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने शिखा मित्रा के कॉल डिटेल की जांच की मांग की है। राजनीति के संत कैलाश जोशी का बेटा अपनी ऐसी छवि बनाएगा, ऐसी कल्पना किसी ने नहीं की थी। दीपक जी, अब शिकायत से आपकी छवि चमकने वाली नहीं।

ये विवाद युवा मोर्चा अध्यक्ष का ‘टेलर’, या महज संयोग….

– प्रदेश में तेजी से सक्रिय भाजयुमो के प्रदेश अध्यक्ष श्याम टेलर का विवादों से नाता जुड़ता जा रहा है। एक सप्ताह में ही उनके साथ दो विवाद जुड़ गए। भाजपा की कार्य संस्कृति की दृष्टि से दोनों चिंता में डालने वाले हैं। इसे युवा मोर्चा के कांग्रेस की शैली में जाने का संकेत माना जा रहा है। सवाल पैदा हो रहा है कि ये घटनाएं महज संयाग हैं या मोर्चा अध्यक्ष के ‘टेलर’ का नतीजा। पहली घटना मुरैना में हुई। यहां रात साढ़े 8 बजे श्याम टेलर को टॉयलेट जाने के लिए एक बैंक का ताला खोला गया। अकेले टेलर नहीं, उनके साथ लगभग आधा दर्जन अन्य युवा भी रात में बैंक के अंदर गए। सवाल, क्या इस तरह नेताओं के लिए किसी बैंक का ताला रात में खुलवाया जा सकता है? तीन दिन के अंदर दूसरी घटना राजगढ़ में घटी। यहां टेलर के स्वागत कार्यक्रम के दौरान मंच पर इतनी भीड़ चढ़ गई कि वह भरभरा कर गिर गया। इससे अफरा-तफरी मच गई और कई कार्यकर्ता घायल हो गए। मंच पर टेलर भी थे लेकिन वे बाल-बाल बच गए। इससे पहले कांग्रेस के मंचों का गिरना चर्चा में रहता था। भोपाल में तो कांग्रेस के कई नेता गंभीर घायल हो गए थे। मंच पर भीड़ के कारण ग्वालियर के एक कार्यक्रम में दिग्वजय सिंह ने भविष्य में मंच पर न बैठने की घोषणा कर दी थी। लगता है, भाजपा के नेता भी कांग्रेस नेताओं की कार्यशैली से प्रभावित हो रहे हैं।

यह इस दिग्गज को दरकिनार करने की साजिश तो नहीं….!

– भाजपा के दिग्गज प्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को मालवा और इंदौर की राजनीति में ही दरकिनार करने की खबरें इन दिनों सुर्खियां बन रही हैं। ये हालात मौजूदा भाजपा सरकार बनने के बाद से ही बनने शुरू हो गए थे। ताजा मामला केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर के दौरे के दौरान सामने आया। कार्यक्रम केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के खास मंत्री तुलसी सिलावट के विधानसभा क्षेत्र सांवेर में था। इसमें खट्टर, मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के साथ कैलाश विजयवर्गीय भी मंच पर मौजूद रहे लेकिन जो बैनर पोस्टर लगाए गए, उनसे विजयवर्गीय का फोटो नदारद था। पोस्टर में आगे मुख्य चेहरा मुख्यमंत्री डॉ यादव, केंद्रीय मंत्री खट्टर के साथ खुद सिलावट का था। बांई ओर नरेंद्र मोदी, अमित शाह, नितिन नबीन के साथ इंदौर के सांसद और पार्टी के जिलाध्यक्ष को भी जगह दी गई। पोस्टर में सबसे बड़ा फोटो उनके आका सिंधिया और उनके साथ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का था लेकिन कैलाश विजयवर्गीय पूरी तरह सीन से नदारद। उन्हें भाजपा के जिलाध्यक्ष के बराबर भी नहीं समझा गया। क्या इसका मतलब यह है कि सिंधिया खेमा इंदौर की राजनीति में कैलाश को अलग-थलग करने की योजना पर काम कर रहा है या किसी के इशारे पर उन्हें यहां की राजनीति में दरकिनार किया जा रहा है? सच जो भी हो लेकिन राजनीति में यह चर्चा हर जुबान पर है।

कांग्रेस में खत्म हो गए नाथ-दिग्विजय के अच्छे दिन….!

 

– कांग्रेस में भाजपा की तरह वरिष्ठों के लिए मार्गदर्शक मंडल की परंपरा न होने के बावजूद पार्टी के अंदर दो वरिष्ठ नेताओं कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के अच्छे दिन खत्म हो गए लगते हैं। कमलनाथ के बुरे दिनों की शुरूआत तब ही हो गई थी, जब मुख्यमंत्री रहते वे पार्टी को टूटने से नहीं बचा पाए। उनके नेतृत्व में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी की पराजय ने भी उनकी आशाओं पर पानी फेरा। उनके असल बुरे दिन तब शुरू हुए जब लोकसभा चुनाव के दौरान दलबदल के उद्देश्य से उन्होंने भाजपा के दरवाजे पर दस्तक दे दी। बात नहीं बनी तो कांग्रेस में रह गए और उनके बेटे नकुलनाथ लोकसभा का चुनाव भी हार गए। तब से वे कई बार सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मिल चुके लेकिन उन्हें कोई दायित्व नहीं मिला। राज्यसभा जाने के लिए उन्होंने अंतिम समय तक कोशिश की लेकिन राहुल ने उनके नाम पर सहमति नहीं दी। दूसरे दिग्विजय को लोकसभा चुनाव में पराजयों के बावजूद राज्यसभा दो बार भेजा गया लेकिन मीनाक्षी नटराजन मामले में प्रभारी हरीश चौधरी और प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने उनके साथ जो बर्ताव किया, उससे कांग्रेस मेंं उनके बुरे दिन प्रारंभ होने का अंदाजा लगा। गिने-चुने समर्थकों को छोड़ न कोई अन्य नेता उनके समर्थन में खड़ा नहीं हुआ, न अपमानित करने वालों पर कोई कार्रवाई होती दिख रही। साफ है कि उनके भी अच्छे दिन खत्म हैं।

फिर भी भाजपा के लिए शुभंकर रह पाएंगे दिग्वजय….?

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– दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कभी भाजपा ज्वाइन कर सकते हैं, इसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी, लेकिन देश भर में जिस तरह भाजपा को गाली देने वाले विभिन्न दलों के नेता पाला और दल बदल रहे हैं, इसे देख कर लगता है कि मौजूदा राजनीति में कुछ भी संभव है। दरअसल, कांग्रेस में रहते हुए ही दिग्विजय को भाजपा के लिए शुभंकर माना जाता है। वे हिंदू-मुस्लिम और मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दों पर बोलने से कभी चूकते नहीं और उनके बोलते ही भाजपा के वोट बढ़ जाते हैं। पहली बार केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में जाने वाली पूर्व मंत्री इमरती देवी ने दिग्विजय को भाजपा में आने का ऑफर दे दिया। उन्होंने कहा कि जीतू पटवारी जब से कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बने हैं तब से पूरी कांग्रेस डांवाडोल है। दिग्विजय का भी वहां कोई सम्मान नहीं है। इमरती ने उन्हें भाजपा में आने का न्योता देते हुए कहा कि दिग्विजय आएं, उनका स्वागत है और उन्हें पूरा सम्मान मिलेगा। इमरती के इस बयान ने एक बहस छेड़ दी। वजह बना राज्यसभा के लिए दाखिल मीनाक्षी नटराजन के नामांकन का रद्द होना। इसे लेकर हुई प्रेस कांफ्रेंस में दिग्विजय के अपमान का मुद्दा जोर-शोर से उठा। बड़ा सवाल है कि क्या भाजपा दिग्विजय को पार्टी में लेगी और भाजपा में आने के बाद भी क्या वे पार्टी के लिए शुभंकर रह पाएंगे?