
Suvendu Adhikari:‘मैदान’ से ‘मंत्रालय’ तक — कैसे बने बंगाल भाजपा के निर्विवाद नायक?
उनकी विनम्रता देखिए अपने जूते उतार कर मंच पर योगी जी को दंडवत प्रणाम किया!
वेद माथुर
पश्चिम बंगाल की राजनीति आज, 8 मई 2026, एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। भाजपा विधायक दल की बैठक में शुभेंदु अधिकारी को सर्वसम्मति से नेता चुन लिया गया है और वे 9 मई, को पश्चिम बंगाल के पहले भाजपाई मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे।
सिर्फ पश्चिमी बंगाल ही नहीं, वरन् संपूर्ण भारत इस कट्टर सनातनी छवि वाले आक्रामक, लेकिन प्रशासनिक अनुभव और सूझ बूझ रखने वाले नेता शुभेंदु अधिकारी की ओर आशा और विश्वास से देख रहा है।
यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि बंगाल की दशकों पुरानी राजनीतिक संस्कृति में एक बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है। सबसे बड़ा प्रश्न यही है किटीएमसी से भाजपा में “लेटरल एंट्री” करने वाले एक नेता ने इतने कम समय में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व, संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच स्वयं को निर्विवाद चेहरा कैसे स्थापित कर लिया?
15 दिसंबर 1970 को पूर्व मेदिनीपुर जिले में जन्मे शुभेंदु अधिकारी राजनीतिक विरासत वाले परिवार से आते हैं। उनके पिता सिसिर अधिकारी बंगाल की राजनीति के प्रभावशाली चेहरों में रहे हैं।
हालांकि शुभेंदु की पहचान केवल पारिवारिक पृष्ठभूमि से नहीं बनी; उन्होंने अपनी राजनीतिक जमीन स्वयं तैयार की।
– उन्होंने 1995 में कांग्रेस से पार्षद राजनीति से शुरुआत
– बाद में तृणमूल कांग्रेस के उभार के साथ क्षेत्रीय राजनीति में प्रभाव बढ़ा
– 2006 में पहली बार विधायक बने
लेकिन उनका वास्तविक राजनीतिक उदय नंदीग्राम आंदोलन (2006-07) के दौरान हुआ। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ उस आंदोलन ने उन्हें “सड़क के संघर्ष से निकले जन नेता” की छवि दी।
ममता बनर्जी सरकार में उन्होंने परिवहन, सिंचाई और जल संसाधन जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाले। इसी दौरान उन्होंने जंगलमहल और ग्रामीण बंगाल में गहरी संगठनात्मक पकड़ विकसित की।
2019 के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन तेजी से बदला। अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव और पार्टी की आंतरिक राजनीति को लेकर शुभेंदु अधिकारी लगातार असहज दिखाई देने लगे।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, शुभेंदु ने इसे केवल व्यक्तिगत असहमति नहीं, बल्कि “परिवारवाद बनाम संगठन” की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत किया। शुभेंदु खुद को ममता बनर्जी का उत्तराधिकारी मानकर चल रहे थे लेकिन अभिषेक बनर्जी के आने के बाद उन्हें समझ में आ गया कि उनके लिए नंबर वन की कुर्सी तक पहुंचना असंभव है।
17 दिसंबर, 2020 को उन्होंने टीएमसी छोड़कर अमित शाह की उपस्थिति में भाजपा का दामन थामा।
यह केवल एक नेता का दल-बदल नहीं था; उनके साथ बड़ी संख्या में स्थानीय संगठनात्मक कार्यकर्ता और प्रभावशाली क्षेत्रीय चेहरे भी भाजपा में आए। यही वह क्षण था जिसने बंगाल भाजपा को ग्रामीण इलाकों में वास्तविक विस्तार दिया। शुभेंदु अल्पकाल में भारतीय जनता पार्टी और इसके कार्यकर्ताओं में इतना घुल मिल गए कि किसी को लगा ही नहीं कि ये कुछ साल पहले ही भाजपा में आए हैं।
2021 विधानसभा चुनाव में भाजपा सत्ता तक नहीं पहुंच सकी, लेकिन शुभेंदु अधिकारी ने स्वयं को विपक्ष के सबसे आक्रामक और सक्रिय चेहरे के रूप में स्थापित किया।
पिछले पाँच वर्षों में उन्होंने अपनी राजनीति को केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रखा बल्कि सड़कों पर उतरकर संघर्ष किया।

उनकी शैली की तीन प्रमुख विशेषताएँ उभरकर सामने आईं:
– सड़क आधारित राजनीति: राजनीतिक हिंसा और कार्यकर्ताओं के मुद्दों पर लगातार सक्रियता
– सीधा संवाद: ग्रामीण और अर्ध-शहरी बंगाल में लगातार जनसंपर्क
– आक्रामक विपक्ष: राज्य सरकार के खिलाफ लगातार राजनीतिक नैरेटिव तैयार करना
इसी दौर में समर्थकों के बीच उनकी “टाइगर ऑफ बंगाल” वाली छवि और मजबूत हुई।
हाल ही में हुआ विधानसभा चुनाव बंगाल की राजनीति का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। भाजपा ने अप्रत्याशित प्रदर्शन करते हुए स्पष्ट बहुमत हासिल किया।
इस चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने न केवल नंदीग्राम से अपनी पकड़ बनाए रखी, बल्कि भवानीपुर जैसी प्रतीकात्मक सीट पर ममता बनर्जी को परास्त कर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरीं। ममता बनर्जी को कोलकाता में उनके अपने विधानसभा क्षेत्र में घुसकर हराना हर किसी के बूते की बात नहीं थी।
राजनीतिक रूप से यह चुनाव भाजपा के लिए केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि बंगाल में दीर्घकालिक वैकल्पिक राजनीतिक धुरी स्थापित करने का संकेत माना जा रहा है।
वे 5 गुण जिन्होंने शुभेंदु को ‘निर्विवाद’ नेता बनाया :
संगठन क्षमता: जमीनी कार्यकर्ताओं को सक्रिय और ऊर्जावान बनाए रखने की क्षमता
आक्रामक नेतृत्व शैली: कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में भी लगातार सक्रिय उपस्थिति
प्रशासनिक अनुभव: मंत्री पद संभालने के कारण शासन और नौकरशाही की गहरी समझ
केंद्रीय नेतृत्व से तालमेल:दिल्ली नेतृत्व के साथ मजबूत समन्वय और विश्वास
ग्राउंड कनेक्ट: ग्रामीण बंगाल और स्थानीय सामाजिक समीकरणों की गहरी समझ
शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक यात्रा भारतीय राजनीति में बदलते समीकरणों का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
लेकिन मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना उनकी यात्रा का अंत नहीं, बल्कि सबसे कठिन चरण की शुरुआत होगी।
उनके सामने सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं- बंगाल में राजनीतिक हिंसा की संस्कृति को नियंत्रित करना,निवेश और उद्योगों को पुनर्जीवित करना,बेरोजगारी और पलायन जैसे मुद्दों से निपटना,प्रशासनिक स्थिरता और कानून-व्यवस्था बहाल करना और राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच सामाजिक संतुलन बनाए रखना
अब असली परीक्षा इस बात की होगी कि क्या वे संघर्षशील विपक्षी नेता की अपनी छवि को एक स्थिर, प्रभावी और विकासोन्मुख मुख्यमंत्री में बदल पाते हैं या नहीं।
क्योंकि इतिहास केवल सत्ता परिवर्तन को याद नहीं रखता — वह यह भी दर्ज करता है कि सत्ता में आने के बाद परिवर्तन कितना वास्तविक था।
लेखक पूर्व बैंकर और राजनीतिक विश्लेषक हैं।




