
कर्नाटक का बेमौसम कांग्रेसी नाटक
राकेश अचल की विशेष रिपोर्ट
मुख्यमंत्री कोई आर ओ मशीन का फिल्टर नहीं जो चाहे जब बदल दिया जाए. मुख्यमंत्री का पद जनादेश का प्रतीक होता है लेकिन कोई इसे माने तब न!. न कांग्रेस इसे मानती है और न भाजपा. हर बडे राजनीतिक दल में हाईकमान की चलती है. कर्नाटक में भी चली. मुख्यमंत्री पद से सिद्दरामैया बिना कोई नाटक किए हट गए.अब डीके शिवकुमार कर्नाटक के नये मुख्यमंत्री होंगे.
कर्नाटक में अभी ऐसी कोई परिस्थिति नहीं बनीं थी कि वहाँ नेतृत्व परिवर्तन किया जाए, लेकिन नेतृत्व परिवर्तन कर दिया गया. बिना मांगे कर दिया गया. इससे कर्नाटक में कांग्रेस मजबूत नहीं, मजबूर हुई है. कांग्रेस के आम कार्यकर्ता का अपमान हुआ है. लेकिन मजबूर हाईकमान डीके शिवकुमार से वादाखिलाफी कैसे करता?
सब जानते हैं कि कर्नाटक राजनीतिक नाटकों का मंच है. राज्य में किसी भी पार्टी की सरकार रहे, वहां नाटक होता ही है.भाजपा की सरकार में भी नाटक हुआ, जनतादल एस की सरकार में भी नाटक हुआ.येदुरप्पा हों, कुमारस्वामी हों या कोई और हो नाटक करते आए हैँ. लेकिन नाटक का हर अंक क्लाइमेक्स का आनंद नही देता. नाटक ही नाटक में भाजपा जैसी कैडर आधारित पार्टी टूट जाती है, कांग्रेस की तो बिसात ही क्या है?
कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनवाने में यदि सिद्दारमैया का जातीय आधार था तो डीके शिवकुमार का पूंजी निवेश. ऐसे में कांग्रेस को समय पर डिवीडेंट का भुगतान तो करना ही था, भुगतान में आनाकानी करती तो भाजपा की तरह कांग्रेस भी टूट सकती थी. पार्टी हाईकमान बुजुर्ग सिद्दारमैया को मनाने में कामयाब रही. सिद्दारमैया ने भी आपदा में अवसर नही तलाशा. वे चाहते तो मप्र की तरह पार्टी तोडकर सरकार गिरा सकते थे, किंतु उन्होने बुढापे में कलंकित होने का जोखिम नहीं लिया. वे समझदार थे, समझदार हैं.उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोडने के बदले में राज्यसभा जाने की पेशकस भी विनम्रतापूर्वक ठुकरा दी और कहा कि वे विधायक ही ठीक हैं.
अब मुश्किल कांग्रेस की होने वाली है. भाजपा सिद्दारमैया को हटाने के मुद्दे को ओबीसी विरोधी बताकर भुनाने की कोशिश करेगी. कांग्रेस भाजपाई हमले का बचाव शायद ही कर पाए. कर पाए तो अच्छी बात है लेकिन इतिहास बताता है कि प्रबंधकीय कौशल के नेता सफल मुख्यमंत्री साबित नहीं होते. कमलनाथ इसका उदाहरण है. प्रमोद महाजन मुख्यमंत्री नहीं बने मैनेजर ही बने रहे, इसलिए बच गए.
बात ये है कि कांग्रेस को बहुत देर में पता चला कि राज्य सरकार बैंक के एटीएम की तरह है. भाजपा ने ही कांग्रेस को ये ज्ञान दिया. आज देश में भाजपा के एटीएम ज्यादा हैं, कांग्रेस के कम. इसीलिए भाजपा के 400 जिलों में अपने दफ्तर हैं, कांग्रेस के नहीं. कांग्रेस कर्नाटक को राजनीति का ‘रेयर अर्थ’ समझ रही है. यहाँ से कमाएगी तब कहीं पार्टी चला पाएगी.
मैं बार -बार कहता हूँ कि सत्ता को दोहन करने में कांग्रेस और भाजपा में कोई बुनियादी अंतर नहीं है.
मैं अपनी बात कर्नाटक के ताजा नाटक से बात समाप्त करता हूँ. सच ये है कि सत्ता में नेतृत्व परिवर्तन तभी होता है जब एक नेता की बलि ले ली जाए. उसे दूसरे के लिए कुर्बान कर दिया जाए. बरसों बाद कांग्रेस ने बकरीद के दिन एक समाजवादी मिजाज के नेता की कुर्बानी एक पूंजीपति नेता के लिए दी है.
डीके 1413 करोड की पूंजी के मालिक हैं. जाहिर है कि वे सत्ता का इस्तेमाल अपनी पूंजी बढाने के लिए करेंगे और कोई उन्हे रोक नहीं सकेगा.
हम कामना करते है कि सिद्दारमैया की ये कुर्बानी बेकार न जाए. कांग्रेस की सत्ता अगले विधानसभा चुनाव तक बनी रहे.सिद्दारमैया इसलिए याद रखे जाएंगे कि वे कांग्रेस के येदुरप्पा बनने से अपने आपको बचा ले गए. देखना होगा कि डीके शिवकुमार कब तक भाजपा का शिकार होने से बचते हैं और उनके सत्तारूढ होने से कांग्रेस कितनी मजबूत या कमजोर होती है?





