
धार्मिक आस्था केंद्रों के प्रबंधन का मुद्दा गंभीर मोड़ पर
आलोक मेहता
मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, शिक्षा, समाज सेवा और अर्थव्यवस्था के सबसे पुराने केंद्र रहे हैं। आज देश में एक बार फिर यह बहस तेज है कि क्या हिन्दू मंदिरों का प्रबंधन सरकार के हाथ में रहना चाहिए या उन्हें पूरी तरह स्वतंत्र ट्रस्टों को सौंप दिया जाना चाहिए? यह प्रश्न केवल धर्म का नहीं, बल्कि संविधान, प्रशासन, पारदर्शिता, करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति से जुड़ा हुआ है।
विशेष रूप से अयोध्या के श्रीराम मंदिर के निर्माण और उसके बाद देशभर में मंदिरों के प्रबंधन को लेकर चर्चा और भी तेज हुई है। कई धार्मिक संगठन यह मांग करते हैं कि जैसे मस्जिदों, चर्चों, गुरुद्वारों और जैन मंदिरों का संचालन उनके अपने धार्मिक निकाय करते हैं, उसी प्रकार हिन्दू मंदिरों को भी सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाना चाहिए। दूसरी ओर कुछ लोग मानते हैं कि सरकार के नियंत्रण से पारदर्शिता, विरासत संरक्षण और सार्वजनिक जवाबदेही बनी रहती है।अयोध्या का श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट अक्सर इस बहस में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह ट्रस्ट सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद केंद्र सरकार द्वारा गठित किया गया था और इसका उद्देश्य मंदिर निर्माण एवं प्रबंधन है।इसके समर्थक कहते हैं— सरकार दैनिक धार्मिक प्रबंधन नहीं करती। ट्रस्ट निर्णय लेता है।देशभर से दान आता है।बड़े पैमाने पर विकास कार्य हुए।वहीं आलोचक समय-समय पर पारदर्शिता, भूमि खरीद, प्रशासनिक निर्णयों या ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाते रहे हैं। इन मुद्दों पर ट्रस्ट ने विभिन्न अवसरों पर अपना पक्ष भी सार्वजनिक रूप से रखा है।
हजारों वर्षों से मंदिर केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं रहे, बल्कि वे समाज के विकास की धुरी भी रहे हैं।प्राचीन भारत में मंदिरों के माध्यम से—शिक्षा दी जाती थी।वेद और शास्त्रों का अध्ययन होता था।संगीत और नृत्य का संरक्षण होता था।आयुर्वेद और चिकित्सा सेवाएं संचालित होती थीं।यात्रियों के लिए धर्मशालाएं बनती थीं।गरीबों को भोजन मिलता था।किसानों को सहायता दी जाती थी।अकाल के समय अन्न भंडार खोले जाते थे।दक्षिण भारत के अनेक मंदिर मध्यकाल में स्थानीय अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े संस्थान थे। उनके पास कृषि भूमि, जलाशय, बाजार और हजारों कर्मचारी होते थे। मंदिर अपने क्षेत्र के सबसे बड़े “नियोक्ता” भी होते थे।
22 जनवरी 2024 को प्राण-प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या विश्व के प्रमुख हिन्दू तीर्थों में तेजी से उभरा।बताया जाता है कि अब तक लगभग 15 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने दर्शन किए |जून 2026 में अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़े दान के गबन का मामला सामने आया।प्रधानमंत्री कार्यालय ने अयोध्या के बीजेपी नेता रजनीश सिंह, की ओर से लिखे गए लेटर के आधार पर जवाब मांगा था | जब जिला प्रशासन ने राम मंदिर ट्रस्ट से आमदनी, खर्च, दान, बैंक खातों, जमीन के लेन-देन और संपत्ति के बारे में जानकारी मांगी तो ट्रस्ट के सचिव चंपत राय ने जानकारी देने से इनकार कर दिया |
राम मंदिर में चढ़ावा चोरी मामले को लेकर भाजपा नेता रजनीश सिंह ने दो बार पत्र लिखा था | पहला पत्र 9 जून को लिखा गया था. जिसमें उन्होंने मांग की थी कि मंदिर ट्रस्ट को निर्देश दिया जाए कि वह अपनी शुरुआत से लेकर अब तक के वित्तीय लेनदेन और संपत्ति की पूरी जानकारी सार्वजनिक करें | प्रधान मंत्री को लिखे गए पत्र में बीजेपी के नेता ने कई जानकारियों को सार्वजनिक करने की मांग की थी | इनमें ‘समर्पण निधि’ अभियान के जरिए इकट्ठा किए गए पैसे, अलग-अलग तरीकों से मिले दान, सोना, चांदी और गहनों के तौर पर मिले योगदान, बैंक खाते और वित्तीय लेन-देन, जमीन की खरीद-बिक्री, मंदिर निर्माण और प्रशासन पर खर्च, ऑडिट और निरीक्षण रिपोर्ट शामिल हैं | दूसरा पत्र 12 जून को लिखा गया | 13 जून को पूरे मामले की जांच के लिए SIT का गठन हो गया |
जिला प्रशासन से इसकी जानकारी मांगी गई थी. जिला प्रशासन ने इस मामले को लेकर श्रीराम मंदिर ट्रस्ट से संपर्क किया. चंपत राय ने यह कहकर कुछ भी जानकारी देने से मना कर दिया कि फिलहाल SIT जांच चल रही है. जांच पैनल सभी जरूरी रिकॉर्ड और जानकारी इकट्ठा कर रहा है. इसलिए अभी मांगी गई जानकारी नहीं दी जा सकती |
राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने चढ़ावा चोरी मामले को बेहद गंभीर माना है。 उन्होंने स्पष्ट किया है कि दान की गिनती में ‘शून्य निगरानी’ थी और इसे ‘चोरी’ नहीं बल्कि एक ‘खुला डाका’ कहा जाना चाहिए |मिश्रा जी ने बताया कि ट्रस्ट और बैंक के बीच हुए समझौते के अनुसार, दान की गिनती की पूरी जिम्मेदारी बैंक की है | बैंक ने अपने स्थायी कर्मचारियों को लगाने के बजाय नियमों की अनदेखी की और प्रक्रिया में बड़ी लापरवाही बरती | गिनती वाले कमरे में निगरानी नाम की कोई चीज़ नहीं थी | लोग अपनी जेबों में नोटों के बंडल छिपाकर बाहर ले जाते थे |इसके अलावा, दान पेटी में आए आभूषणों की कोई रसीद नहीं काटी जा रही थी |उन्होंने माना कि दान कक्ष का सीसीटीवी फुटेज 45 दिनों के बाद ऑटोमैटिक डिलीट हो जाता था और उसका कोई बैकअप नहीं रखा जाता था, जिससे एसआईटी की जांच में मुश्किलें आ रही है | उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी दान प्रणाली में हुई इस अनियमितता को लेकर काफी चिंतित है | भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए, उन्होंने मंदिर प्रशासन में एक वरिष्ठ नौकरशाह (आईएएस) को पूर्णकालिक सीईओ नियुक्त करने की वकालत की है, जिसका अयोध्या से भावनात्मक जुड़ाव हो |
इस महाघोटाले को लेकर राम मंदिर आंदोलन के फायरब्रांड नेता और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सांसद विनय कटियार ने अयोध्या में इस समय बनी मौजूदा स्थिति पर अपनी गहरी नाराजगी और गुस्सा जाहिर किया है।कटियार का आरोप है कि चंपत राय कई बार मंदिर के चढ़ावे को लेकर अपने निजी निवास, कारसेवकपुरम गए थे, जो कि नियमों के खिलाफ और एक गंभीर अपराध है। उन्होंने स्पष्ट किया कि परंपरा और नियम के अनुसार मंदिर में आने वाला दान वहीं गिना जाता है और सीधे बैंक भेजा जाता है। ऐसे में उस धन को किसी के निजी निवास स्थान पर ले जाने की क्या आवश्यकता थी, यह एक बहुत बड़ा सवाल है पूर्व सांसद ने यह भी उजागर किया कि जब उन्हें इस बात का पता चला, तो उन्होंने इस संबंध में सीधे चंपत राय से जवाब मांगा था, जिसके बाद दोनों नेताओं के बीच तीखी बहस भी हुई थी। कटियार ने बताया कि प्रधानमंत्री के दखल के बाद अब इस पूरे प्रकरण की जांच के लिए विशेष जांच दल का गठन कर दिया गया है। चूंकि प्रधानमंत्री खुद इस मामले की निगरानी कर रहे हैं, इसलिए बहुत जल्द सच सबके सामने आ जाएगा।चंपत राय पर सीधा हमला बोलते हुए कटियार ने कहा कि उन्हें उनके पद से बर्खास्त किया जाना चाहिए। मंदिर का चढ़ावा निवास स्थान पर ले जाने के अपराध का जवाब उन्हें देना ही होगा। उन्होंने आम प्रक्रिया का हवाला देते हुए कहा कि हर दिन मंदिर में लाखों-करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है, जिसकी गिनती बैंक अधिकारियों के सामने होती है और उसे सीधे बैंक में जमा किया जाता है। इस तय व्यवस्था के बावजूद पैसे को बाहर ले जाना पूरी तरह से गलत है। विनय कटियार ने इस पूरे घटनाक्रम पर गहरा दुख जताते हुए कहा कि राम मंदिर करोड़ों देशवासियों की अटूट आस्था का प्रतीक है, इसलिए मंदिर परिसर के भीतर अनुशासन, मर्यादा और पारदर्शिता बनाए रखना सबसे ज्यादा जरूरी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मंदिर की पूरी व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कड़े कदम उठाए जाने चाहिए। अयोध्या की पावन भूमि पर चढ़ावे के पैसों के साथ ऐसी गंभीर वित्तीय अनियमितता की खबर से वह बेहद आहत हैं।
प्रारंभिक जांच के बाद पुलिस ने दान राशि के कथित गबन के संबंध में एफआईआर दर्ज की और कई कर्मचारियों तथा संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई की।अब तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया।उन पर आरोप है कि मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए नकद दान के एक हिस्से का कथित गबन किया गया।पुलिस ने आरोपियों के विरुद्ध चोरी, आपराधिक विश्वासघात , आपराधिक षड्यंत्र सहित विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया। पुलिस ने जांच के दौरान लगभग ₹79.85 लाख की बरामदगी की भी जानकारी दी है। अंतिम राशि और जिम्मेदारी का निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।विपक्षी दलों ने मांग की है—सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में जांच हो |
यह मामला केवल राम मंदिर तक सीमित नहीं है।यह पूरे देश के लिए एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है | देश में मंदिरों की कोई एक आधिकारिक राष्ट्रीय गणना उपलब्ध नहीं है। विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी आकलनों के अनुसार देश में 20 लाख से अधिक हिन्दू मंदिर हैं। इनमें अधिकांश छोटे ग्राम-स्तरीय मंदिर हैं, जबकि कुछ हजार मंदिर ऐतिहासिक, आर्थिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।इनमें से केवल सीमित संख्या— बड़े, आय-संपन्न या ऐतिहासिक मंदिर—राज्य सरकारों के अधीन विभिन्न कानूनों के तहत आते हैं।ब्रिटिश शासन के समय कई बड़े मंदिरों में आय और संपत्ति को लेकर विवाद उत्पन्न हुए। औपनिवेशिक प्रशासन ने कुछ क्षेत्रों में धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन के लिए कानून बनाए | यदि किसी राज्य में सबसे अधिक हिन्दू मंदिर सरकारी विभाग के अधीन हैं, तो वह तमिलनाडु है। राज्य सरकार का एक विभाग हजारों मंदिरों, मठों और धार्मिक संस्थानों का प्रशासन देखता है।चिदंबरम नटराज मंदिर का प्रशासन समय-समय पर न्यायिक विवादों का विषय भी रहा है | वहीं सरकार का तर्क है कि उसने अनेक मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया, भूमि वापस दिलाई और डिजिटल रिकॉर्ड बनाए |
आंध्र प्रदेश का तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् एक स्वतंत्र वैधानिक ट्रस्ट-जैसी संस्था है, लेकिन इसके बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति राज्य सरकार करती है। इसलिए इसे पूर्णतः निजी ट्रस्ट नहीं माना जाता है | यह विश्व के सबसे समृद्ध मंदिर संस्थानों में से एक है |केरल का मॉडल पूरे देश में अलग माना जाता है।यहाँ मंदिर सीधे सरकार द्वारा नहीं, बल्कि देवस्वम बोर्डों द्वारा संचालित होते हैं।इन बोर्डों में सरकार की भूमिका नियुक्तियों और प्रशासनिक ढाँचे में होती है, लेकिन वे स्वतंत्र वैधानिक संस्थाएँ हैं।प्रमुख मंदिर सबरीमला , गुरुवायूर (अलग वैधानिक व्यवस्था) और पद्मनाभस्वामी (विशेष न्यायिक व्यवस्था के अंतर्गत) हैं | ओडिशा में पुरी का जगन्नाथ मंदिर विशेष कानून के अंतर्गत संचालित होता है। राज्य सरकार की प्रशासनिक निगरानी , रथयात्रा व्यवस्था , सुरक्षा और वित्तीय नियंत्रण के कुछ पहलू उसके अधीन हैं |लेकिन धार्मिक परंपराओं का संचालन सेवायत समुदाय द्वारा किया जाता है। जम्मू-कश्मीर में श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड एक वैधानिक बोर्ड है, जिसकी अध्यक्षता परंपरागत रूप से उपराज्यपाल (पूर्व में राज्यपाल) करते हैं।
भारत में प्रतिवर्ष करोड़ों लोग तीर्थयात्रा करते हैं। कई प्रमुख मंदिरों में प्रतिदिन 50 हजार से लेकर 2 लाख तक श्रद्धालु पहुँचते हैं, जबकि प्रमुख पर्वों पर यह संख्या कई लाख तक पहुँच जाती है। इन मंदिरों के आसपास होटल, परिवहन, प्रसाद, हस्तशिल्प, भोजन, फूल, पूजा सामग्री और स्थानीय व्यापार का विशाल नेटवर्क विकसित हो चुका है। सरकार पिछले कुछ वर्षों से धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रही है। रामायण सर्किट, कृष्ण सर्किट, बौद्ध सर्किट, चारधाम परियोजना, काशी कॉरिडोर, महाकाल लोक और अयोध्या विकास जैसी योजनाओं ने मंदिरों के आसपास भारी निवेश आकर्षित किया है।मंदिरों के सरकारी नियंत्रण की बहस केवल पूजा-पद्धति की नहीं है, बल्कि हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति, लाखों एकड़ भूमि, श्रद्धालुओं के दान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी है।
संविधान भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित करता है। लेकिन भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी देशों जैसी “राज्य और धर्म के पूर्ण पृथक्करण”की अवधारणा नहीं है। भारत में राज्य आवश्यकता पड़ने पर धार्मिक संस्थाओं के प्रशासनिक पहलुओं को विनियमित कर सकता है, जबकि धार्मिक आस्था और आवश्यक धार्मिक प्रथाओं की रक्षा भी संविधान करता है।कई निर्णयों में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य का उद्देश्य स्थायी रूप से धार्मिक संस्थाओं पर अधिकार स्थापित करना नहीं, बल्कि आवश्यकता होने पर प्रशासनिक सुधार करना हो सकता है।यदि किसी मंदिर में गंभीर कुप्रबंधन हो, तो राज्य हस्तक्षेप कर सकता है; परंतु यह हस्तक्षेप अनिश्चितकाल तक चलता रहे, यह संवैधानिक बहस का विषय बना रहा है।
अन्य धार्मिक केंद्रों में अधिकांश मस्जिदें वक्फ संपत्तियों के ढाँचे से जुड़ी होती हैं। वक्फ बोर्ड कानून द्वारा स्थापित वैधानिक निकाय हैं जो वक्फ संपत्तियों का प्रशासन देखते हैं। हालाँकि मस्जिदों की धार्मिक गतिविधियों का संचालन स्थानीय इमाम, मुतवल्ली और संबंधित समुदाय की भूमिका के साथ चलता है।प्रमुख गुरुद्वारों का संचालन निर्वाचित समितियों द्वारा होता है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी है | इन संस्थाओं में सरकार प्रत्यक्ष दैनिक प्रबंधन नहीं करती, हालांकि उनका संचालन विशेष कानूनों के अधीन होता है। अधिकांश चर्च संबंधित ईसाई संप्रदायों, डायोसीज़ या चर्च ट्रस्टों द्वारा संचालित होते हैं। वे भी लागू नागरिक, कर और चैरिटी कानूनों के अधीन रहते हैं।
मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने वाले हिन्दू संगठनों की मुख्य आपत्ति संगठनों के प्रमुख तर्क हैं कियदि सभी धर्म समान हैं, केवल हिन्दू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण क्यों? दान श्रद्धालु भगवान को देता है,सरकार को नहीं मंदिर की आय मंदिर पर ही खर्च होनी चाहिए।सरकार बदलने सेमंदिर प्रशासन नहीं बदलना चाहिए।राजनीतिक नियुक्ति न हो।राज्य सरकारें कहती हैं—मंदिरों में सार्वजनिक धन आता है। इसलिएऑडिट आवश्यक है।हजारों एकड़ भूमि की सुरक्षा करनी पड़ती है।यदि प्रशासन भ्रष्ट हो, तो सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ेगा।छोटे मंदिरों को भी सहायता चाहिए।पुरातात्विक धरोहर की रक्षा सरकार की जिम्मेदारी भी है। कई विधि विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि भारत में एक राष्ट्रीय मंदिर प्रशासन मॉडल बनाया जा सकता है।





