
रविवारीय गपशप : न्यूजीलैंड के छोटे से कस्बे में भारत के 100 परिवार ऐसे रहते हैं मिलजुल कर
आनंद शर्मा
जिंदगी के सबक जरूरी नहीं कि हम किसी बड़े विद्वान से सीखें , कई बार सादा इंसान भी कुछ गंभीर सबक दे जाता है ।
बात पुरानी है , तब मैं नौकरी से नया नया रिटायर हुआ था । रिटायरमेंट के बाद कुछ साथियों के साथ मिल कर हम सब ने सोचा कि अब तक व्यस्तता के चलते ख़ुद के और परिवार के लिए समय नहीं निकाल पाते थे तो क्यों न मिल कर सपरिवार विदेश यात्रा का कार्यक्रम बनायें ? योजना बड़ी आकर्षक थी , सो जल्द ही एक ग्रुप बन गया और कुल मिलाकर आठ जोड़े विदेश यात्रा के लिए तैयार हो गये । कई दिनों की मशक्कत के बाद आख़िरकार प्लान तैयार हो गया , और मियाँ बीबी मिला कर हम सोलह यात्री आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की यात्रा पर रवाना हो गये । बाहर जाने के पूर्व अपने ट्रेवल एजेंट से हमने ये वादा ले लिया था कि हर शहर में भ्रमण के दौरान भोजन उत्तर भारतीय होना चाहिये और विदेश की धरती पर कदम रखते ही हमें ये महसूस हो गया कि हमने बड़ी नायाब माँग पूरी करा ली थी , क्योंकि अपने स्तर पर विदेश में भारतीय भोजन ढूँढने का उपक्रम बड़ा समय लेने वाला होता । इसके दो फायदे भी थे , अव्वल तो ये था ही कि पेट भर जाया करता था , क्योंकि जब भूखे भजन नहीं होते तो भूखे पेट भ्रमण क्या होता , और दूसरा ये कि भोजन के ये रेस्टोरेंट्स हिन्दी बोलने और समझने वाले लोगों के ही होते थे , तो भ्रमण के दौरान कुछ स्थानीय टिप भी हमें रेस्तरां के मालिक से मिल जाया करती थी ।
आस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड दोनों हो देशों में ख़ासकर विद्यार्थी और युवा वर्ग के भारतीय बड़ी तादाद मे मिल जाते हैं । घूमने फिरने का पहला पड़ाव आस्ट्रेलिया और उसके बाद न्यूजीलैंड था । न्यूजीलैंड पहुँचने के बाद हमें महसूस हुआ कि इस देश पर क़ुदरत जैसे विशेष मेहरबान है , चारों ओर बिखरी प्राकृतिक सुंदरता के साथ ही हर जगह साफ़ सफ़ाई ऐसी माकूल कि कचरे का एक रेशा भी ढूंढे न मिले । न्यूज़ीलैंड पहुँचने के तीसरे या चौथे दिन जब हम रोटोरुआ के रोमांचक सफ़र के लिए जा रहे थे , तो रास्ते में पड़ने वाले एक छोटे से क़स्बे में भोजन के लिए रुके । बड़ी ख़ूबसूरत जगह थी , नाम अब मैं भूल गया । रेस्टोरेंट में खाना बनाने वाले लोगों में होटल के मालिक के परिवार के सदस्य की महिलाएँ भी थीं , तो हमारे साथ में ग्रुप की महिलाएँ उनसे जाकर बात करने लगीं । उन लोगों से बातचीत में पता लगा कि पंजाब के किसी गाँव से करीब दस बरस पहले वे आकर यहाँ बस गए थे । पहले लड़के आए , बाद में परिवार भी बुला लिया । दो भाई हैं , और दोनों मिल कर रेस्टोरेंट संभालते हैं । छोटे भाई की पत्नी की गोद में एक छोटा सा प्यारा बच्चा भी था । इस आपसी परिचय के बाद हम खाना खाने बैठ गये ।
खाने के बाद रेस्टोरेंट में मालिक की कुर्सी पर बैठे नवजवान से मेरे साथी श्री डीडी अग्रवाल बात करने लगे । डीडी भाई की आदत है वे पूरी जानकारी गहराई से निकालते हैं । कितना कमाते हो ? इस कस्बे में कितने साल से हो , क्या धर्म है , इंडिया कब से नहीं गये , और हिंदुस्तान से कितने लोग इस कस्बे में हैं , आदि आदि । बातों बातों में उसने बताया , क़रीब सौ लोग होंगे जो इंडिया से हैं , इनमें हिंदू हैं , सिख हैं , जैन हैं , मुस्लिम हैं । सब अलग अलग कारोबार करते हैं और सप्ताह में एक बार सब परिवार सहित इकट्ठा होते हैं और मिलजुलकर पार्टी करते हैं । डीडी भाई ने जिज्ञासा वश आगे पूछा , “ अच्छा आप लोगों के पूजा पाठ के कोई स्थान हैं क्या , जैसे मंदिर , मस्जिद या गुरुद्वारा ? नवजवान ने कहा “नहीं साहब वो सब तो नहीं हैं , और अच्छा है कि नहीं हैं , वरना फिर हम आपस में कहाँ मिल पाते ? सब अपने अपने धर्मस्थलों तक ही सीमित रह जाते , अभी तो हम खूब मिलते हैं और सबको एक दूसरे का सहारा है । मैंने उसके भोले भाले चेहरे पर एक निष्कपट मुस्कान देखी और सोचा गहरे अर्थ वाली बात कह गया ये बंदा ।





