घोसलों का विज्ञान:”टिटहरी के घोसले में पारस पत्थर खोजते है लोग”

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टिटहरी

“टिटहरी के घोसले में पारस पत्थर खोजते है लोग”

एक छोटी सी चिड़िया की दृढ़ निश्चय की पचतंत्र की एक रोचक कहानी हम बचपन से सुनते आ रहे  हैं।  एक टिटहरी समुद्र के किनारे एक गड्ढे में रहती थी। वहां टिटहरी ने दो अंडे दिए। सुबह होने पर टिटहरी अपने अंडों को वहीं छोड़कर दाना चुगने निकल गई।

शाम को दाना चुगने के बाद जब टिटहरी वापस आई तो उसने देखा की उसके अंडे वहां नहीं थे, । तब उस टिटहरी ने समुद्र से पूछा, समुंद्र मैंने यहां अपने दो अंडे रखे थे, क्या तुमने देखे? समुद्र हंसते हुए बोला तेरे अंडो का मुझे क्या पता। समुंदर के हंसने से टिटहरी को अंदाजा हो गया कि उसके अंडे समुद्र ने ही चुराए हैं। वह समुद्र से बोली तुम्हारे अलावा यहां और कोई नहीं है इसलिए तुम्हें जरूर पता है कि मेरे अंडे कहां है। तुमने ही मेरे अंडे चुराए हैं मुझे मेरे अंडे वापस करो,
टिटहरी की यह बात सुनकर समुद्र को हंसी आई और वह अहंकार में बोला मुझे नहीं पता तुम्हारे अंडे कहां है ढूंढ सकती हो तो ढूंढ लो।
यह सुनकर टिटहरी गुस्से में बोली मेरे अंडे वापस करो नहीं तो मैं पूरे समुद्र का पानी सुखा दूंगी यह सुनकर समुद्र टिटहरी पर हंसने लगा। टिटहरी गुस्से में एक टक समुद्र को देखने लगी समुद्र की लहरें आती और जाती परंतु टिटहरी उसे घूरती रही। टिटहरी बोली समुद्र तुम ऐसे नहीं मानोगे अब मैं तुम्हारा सारा पानी सुखा कर ही रहूंगी। कहकर टिटहरी अपनी नन्ही सी चोंच में समुद्र से पानी लेती और किनारे पर डालती।

टिटहरी

इस तरह करते करते उसे सुबह से शाम हो गई।टिटहरी ऐसे दृढ़ निश्चय के साथ अपने कार्य में लगी रही  सभी पशु पक्षी हैरान थे सबको उसकी चिंता होने लगी। तब सभी पक्षी मिलकर पक्षियों के राजा गरुड़ देव के पास पहुंचे और उनसे बोले महाराज यह नन्ही सी टिटहरी अपनी जिद पर अड़ी है और इतनी विशाल समुद्र का पानी सुखाने का प्रयास कर रही है।

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यह सुनकर गरुड़ देव समुद्र तट पर टिटहरी के पास पहुंचे और बोले टिटहरी क्या हम तुम्हारी कुछ मदद कर दे हमारी चोंच कुछ बड़ी है। टिटहरी गुस्से में बोली यह मेरा काम है मुझे करने दो ।गरुड़ देव भगवान श्री हरि विष्णु के पास गए और उनसे मदद की विनती करने लगे। और बोले प्रभु आप सृष्टि के रचयिता हैं। अब आप ही कुछ चमत्कार कर सकते हैं यह नन्हीं टिटहरी ज़िद में आकर समुद्र का पानी सुखाने की ठान बैठी है जो कि संभव नहीं है।

भगवान विष्णु ने देखा कि टिटहरी निरंतर अपने कार्य में लगी है उसके दृढ़ निश्चय को देखकर प्रसन्न होकर भगवान श्री हरि विष्णु ने समुद्र देव से पीछे हटकर टिटहरी को उसके अंडे लौटाने को कहा। भगवान् विष्णु की आज्ञा अनुसार समुद्र पीछे हटा और टिटहरी ने उसमें से अपने अंडे निकाल लिए, और वह खुशी से बोली देखा मैंने कर दिखाया। इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता, यदि दृढ़ निश्चय कर लें तो असंभव कार्य भी ईश्वर की मदद से पूर्ण होता है।

टिटहरी

मित्रों टिटहरी को लेकर कई रोचक किस्से है जैसे वह टाँगे ऊपर करके सोती है ,अगर आसमान गिरे तो वह टांगों पर आसमान को रोक लेगी। यह नन्हा पक्षी साहित्य में कई किस्सो के साथ शामिल है। लेकिन क्या आप जानते है ? जिन अण्डों के लिए टिटहरी समुद्र से पंगा ले बैठी थी उन अण्डों को रखने के लिए उसका घोसला कैसा होता है?
आइये आज हम टिटहरी के घर चलते है। ये  मध्यम आकार के जलचर पक्षी होते हैं, जिन्हें सामान्य भाषा में टिटोडी(titodi) भी कहा जाता है। टिटहरी जलीय, खेतों की जमीन के खुले व सुखे वातावरण, ताजे पानी की दल-दल, झीलों के किनारों और रेतीले पथरीले नदी तटो में भी पाई जाती है।

टिटहरी बाहरी आक्रमणों के प्रति अत्यंत सजग रहने वाली चिड़िया होती है। जो खतरा महसूस होते ही तीव्र ध्वनि के साथ शोर मचाती है। टिटहरी की आवाज तेज और वेधक होती हैं।टिटहरी अपनी चोंच और अंडों के कारण चर्चित  है जिनका सिर गोल, गर्दन व चोंच छोटी और पैर लंबे होते हैं। यह प्राय: जलाशयों के समीप रहती है। इसे कुररी भी कहते हैं।

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नर अपनी मादा को हवाई करतबों से रिझाता है । यह पक्षी अपना अधिकांश समय जमीन पर बिताता है। भारत के सभी प्रदेशों में टिटहरी पाई जाती है। टिटहरी का अंग्रेजी नाम  lapwing है और भारत में पाई जाने वाली टिटहरी का नाम red wattled lapwing हैभारत के सभी प्रदेशों में टिटहरी पाई जाती है । इसका अंग्रजी नाम ‘‘ लेपविंग ’’ है । भारत में इसकी 2-3 प्रजातियां ही पाई जाती है ।
टिटहरी का आकार प्रकार कुछ कुछ बगुले से मिलता जुलता होता है । गर्दन बगुले से छोटी होती है । सिर और गर्दन के ऊपर की तरफ और गले के नीचे का रंग काला होता है इसके पंखों का रंग चमकीला कत्थई तथा सिर गर्दन के दोनों ओर एक सफेद चैड़ी पटटी होती है । टिटहरी की दोनों आंखों के सामने एक गूदेदार रचना पाई जाती है इस रचना को देखकर यह पक्षी दूर से ही पहचान लिया जाता है । टिटहरी की दूसरी प्रजाति में आंखों के पास पाई जाने वाल यह रचना पीले रंग की गूदेदार होती है ।
दक्षिण एशिया में कुल 9 प्रकार के टिटहरीया पाई जाती है और भारत में लाल गल-चर्म वाली टिटहरी बहुतायत में पाई जाती है। पक्षी पेड़ों पर घोंसला बनाते हैं या फिर ऊंचाई पर रहना पसंद करते हैं परंतु टिटहरी एक ऐसा पक्षी है जो हमेशा जमीन पर रहता है। कभी किसी पेड़ पर अथवा बिजली के तार पर नहीं बैठता। दरअसल, इस पक्षी के पंजों में 3 उंगली आगे की तरफ होती है। पीछे कोई उंगली नहीं होती।

जिसके कारण किसी भी पेड़ की टहनी पर यह पक्षी पकड़ (ग्रिप) नहीं बना पाता।  टिटहरी पक्षी की लम्बाई 11-13 इंच एवं पंखों का फैलाव 26-34 इंच होता है इसका शरीरिक भार लगभग 128-330 ग्राम पाया गया है । इसके पंख गोलाकार होते हैं तथा सिर पर एक उभरा भाग होता है जिसे क्रेस्ट कहते हैं ।  इसकी पूंछ छोटी एवं काली होती है जिसकी लम्बाई लगभग 104-128 मि.मी. पाई गई है इनके चोंच की लम्बाई लगभग 31-36 मि.मी. देखी गई है ।

    कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं पर अनुभवी किसानों के अनुसार टिटहरी के लिए कहा जाता है कि इसे कुदरत ने ऐसा करिश्मा दिया है, जो अपने अंडों के जरिए अच्छे मानसून का संकेत देता है। ग्रामीण क्षेत्रों में वैज्ञानिक मानते है कि टिटहरी खेतों में अंडों के माध्यम से बारिश की सटीक भविष्यवाणी करती है। इसके अंडों की संख्या और उनकी स्थिति से पता लगाया जा सकता है कि बारिश कितने माह और किस तरह होगी।

 

टिटहरी पक्षी ने मानसून से पहले खेत की ऊंची मेढ़ पर चार अंडे दिए हैं। इससे देसी मौसम विज्ञानी यानी कि गांव के बुजुर्गों का मानना है कि इस बार बरसात का मौसम पूरे 4 माह तक रहेगा और अच्छे मानसून रहने के आसार हैं। मानसून का अंदाजा लगाने के लिए टिटहरी पक्षी की गतिविधि पर निगाह रखी जाती है। टिटहरी मानसून से पहले अंडे देती है। टिटहरी अगर दो अंडे देती है तो माना जाता है कि मानसून की अवधि 2 माह रहेगी। टिटहरी ने ऊंचे स्थान पर चार अंडे दिए हैं, ऐसे में माना जाता है कि इस बार बरसात का मौसम पूरे 4 माह रहेगा और ये अच्छे मानसून रहने के संकेत हैं। यह मादा अगर छह अंडे देती है तो मानसून में अच्छी पैदावार व बरसात की उम्मीद बन जाती हैं।

खुले घास के मैदान, छोटे-मोटे पत्थरों, सूनी हवेलियों व सूनी छतों पर बसेरा करने वाली टिटहरी का प्रजनन मार्च से अगस्त माह के दौरान होता है। लोक मान्यता है कि यदि टिटहरी ऊंचे स्थान पर अंडे रखती है तो बारिश तेज होती है। यदि टिटहरी निचले स्थान पर अंडे देती है तो उस साल कम बारिश होती हैवहीं टिटहरी के अंडों का मुंह जमीन की ओर होने पर मानसून के दौरान मूसलाधार बारिश, समतल स्थान पर रखे होने पर औसत बारिश और किसी गड्ढे में अंडे दिए जाने पर सूखा पडऩे का अनुमान लगाया

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टिटहरी जमीन पर कंकड़, छोटे-छोटे पत्थर व मिट्टी के टुकड़ों को इकट्ठे कर अपना घोंसला बनाती है। इन पत्थर, कंकड़ों का रंग अंडों के रंगों से मिलता-जुलता होता है, जिससे शिकारी पक्षियों को उसके अंडे आसानी से दिखायी नहीं पड़ते।

अंडों का आकार ओवल होता है जिसकी आकार 33 गुना 47 मि.मी. होती है । ये चिकने एवं पत्थर / मिटटी के रंग के होते हैं एवं इन पर काले धब्बें होते हैं । मादा टिटहरी 4 अण्डें देती है एवं इनसे 28 से 30 दिनों में बच्चे निकल आते हैं । दोनो मादा एवं नर अण्डों की देखभाल एवं सेने का काम करते हैं ।  अंडे को तोड़ने के लिए कई पक्षी उस पर बैठकर या गर्मी कर अंडे को तोड़ते है लेकिन टिटहरी का तरीका इससे थोड़ा अलग है.कहा जाता है कि टिटहरी जब भी जमीन पर अंडे देती है तो वो उसे तोड़ने के लिए पारस पत्थर का उपयोग करती है.    अपने नजदीक आने वाले जानवर , मनुष्य को देखकर शोर मचाना शुरू कर देती  है । टिटहरी दिन रात जाग कर अपने अंडों और बच्चों की देखभाल करती है।