Saturday, December 15, 2018
राफेल पर कुछ धीरज धरे कांग्रेस

राफेल पर कुछ धीरज धरे कांग्रेस

सुदूर किसी समुद्री इलाके में सैलानी के तौर पर जाइए। एक न एक जगह आपको समुद्र के बीचों-बीच ले जाकर किसी दुर्लभतम जलीय जीव को दिखाने का वादा किया जाता है। इसकी भारी कीमत ली जाती है। चतुरसुजान कर्मचारी बोट पर बैठता है। ज्यों ही आपकी नजर समुद्र के दाहिने हिस्से को देखती है, वह कर्मचारी बायीं ओर इशारा कर ‘वो रही!’ चीखता है। यह मूर्ख बनाओ अभियान पूरे समय चलता है। अंत में आपको बताया जाता है कि जीव तो दिखा था, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसे हर मौके पर आपकी आंख कहीं ओर देख रही थी। अंतत: आप पाते हैं कि जीव तो दिखा नहीं, इस चीख-चिल्लाहट की वजह से आप समुद्र की सैर का मजा लेने से भी वंचित रह गए। 

राफेल मामले में कांग्रेस भी चीख-चीखकर ‘वो रही!’ कह रही है। इस विवाद की नौका पर सवार देश की आम जनता साफ देख रही है कि मोदी सरकार की ओर तेजी से सुनामी बढ़ रही है। मामला नमो नामक विशालकाय बेड़े के गर्क होने वाला साबित हो सकता है। लेकिन उसकी भी समस्या कांग्रेस के उक्त चतुरसुजान कर्मचारी जैसे आचरण को लेकर है। वह अक्सर बेवजह शोर मचा रही है। कल की ही बात लीजिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस सौदे को लेकर तमाम जानकारी सरकार से तलब की। राहुल गांधी ने तुरंत कोर्ट को भी लपेटे में ले लिया। प्रकारांतर से कहा कि यह सब मोदी की सहूलियत के लिए किया जा रहा है। किसी प्रतिष्ठित संस्था पर कांग्रेस के इस तरह से सार्वजनिक आक्षेप का यह पहला मौका नहीं है। यह पार्टी पूर्व में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर भी इसी तरह अंगुली उठा चुकी है। मामला हर बार शोर मचाने जैसा होता है। कई प्रहसन इतने फूहड़ कि एक फिल्म का शीर्षक ‘चोर मचाए शोर’ याद आ जाता है। 

होना यह चाहिए था कि सुप्रीम कोर्ट के कदम के बाद कांग्रेस धैर्यपूर्वक शांत बैठती। इस देश की न्याय व्यवस्था पर यकीन रखने वाले इस बात से इत्तेफाक रखेंगे कि कोर्ट दूध का दूध और पानी का पानी कर ही देगी। कोर्ट यदि कोई प्रतिकूल टिप्पणी करे, सरकार को फटकारे या धिक्कारे तो फिर कांग्रेस को पूरी ताकत से कहना चाहिए कि वह जो कहती आई है, सच वही निकला। वह ऐसा नहीं कर रही। उलटा, उसका आचरण देखकर तो यह लग रहा है कि यदि इस तरह की बात नहीं हुई तो पार्टी तो सुप्रीम कोर्ट के अपमान की रही-सही कसर भी पूरी कर देगी।

यह अलग से बताना ही होगा कि उक्त व्यवस्था मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने दी है। अपने किसी पूर्ववर्ती की तुलना में गोगोई का मोदी सरकार के लिए रुख अच्छा-खासा टेढ़ा है। इसलिए वह बाल की खाल निकालने की हद तक इस मामले में बारीक रवैया अपना सकते हैं। किंतु इस तथ्य को नजरंदाज कर कांग्रेस समानांतर अदालत चलाने जैसी प्रवृत्ति का भौंडा प्रदर्शन कर रही है। दरअसल, वह नहीं चाहती कि किसी भी सूरत में राफेल पर जंग का सिरा किसी और हाथ में जाए। फिर वह हाथ सुप्रीम कोर्ट का ही क्यों न हो। इसलिए शोर मचाते हुए पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि इस मसले पर सरकार को घेरने की शुरूआत उसने ही की थी। जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट से अपने मनोकूल घटनाक्रम के सामने आने पर उसका पूरा श्रेय लेने की कोशिश के तहत ऐसा किया जा रहा है। 

दरअसल, कांग्रेस आम जनता की आंख को किसी तथ्य पर टिकने ही नहीं देना चाह रही। आवाम की आंख बायीं और दिख रहे तथ्य पर जाती है तो कांग्रेस दाहिनी ओर इशारा कर ‘वह रही!’ चीख उठती है। ऐसे में यह आशंका खारिज नहीं की जा सकती कि अंत में यदि राफेल पर उसके आरोप साबित नहीं हुए तो वह जनता को यही बताएगी कि घोटाला तो था, लेकिन पार्टी की तमाम कोशिशों के बावजूद देश उसे देख/समझ ही  नहीं सका। कांग्रेस का यह चिल्लाना अब चीत्कार में तब्दील होने लगा है। हालत यूं ही रही तो यह प्रलाप का स्वरूप ले सकता है। विधवा प्रलाप एक बहुचर्चित शब्द है और कांग्रेस बहुचर्चित पार्टी। इस संयोग के बीच राजनीति के भवसागर में डूबे राफेल का सच नामक जीव को दिखाने का दावा काफी रोचक मोड़ पर आ गया है।

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प्रकाश भटनागर

पिछले तीस सालों से मुख्यधारा की पत्रकारिता में सक्रिय। भोपाल के कई बड़े-छोटे कहे जाने वालों अखबारों में काम किया। वर्तमान में एलएन स्टार भोपाल के संपादक। राजनीतिक टिप्पणियों और विश्लेषण के लिए अपने मित्रों में सराहे जाते हैं।