Wednesday, July 24, 2019
माॅब लिंचिंग के डरावने पहलू और ‘निराशावाद’ की नई व्याख्या

माॅब लिंचिंग के डरावने पहलू और ‘निराशावाद’ की नई व्याख्या

मीडियावाला.इन।

 दो घटनाक्रम काबिले गौर हैं। पहला तो ‘देशद्रोही सीरीज ‘की अगली कड़ी का खुलासा हो गया है। यानी कि आप अर्थव्यवस्था की उड़ान की व्यावहारिकता पर भी कोई सवाल उठा रहे हैं तो आप ‘पेशेवर निराशावादी’ हैं। शक्की हैं। दूसरा झारखंड में पिछले महीने तरबेज अंसारी की भीड़ द्वारा निर्मम हत्या के बाद देश में माॅब लिंचिंग का मुद्दा फिर गर्मा गया है। मध्यप्रदेश में एक मुस्लिम आला अफसर ने हताशा के स्वर में कहा है कि क्यों न मुझे अपना नाम बदल लेना चाहिए, क्योंकि  न जाने कब माॅब लिंचिंग का शिकार हो जाऊं। हालांकि इस अफसर के ट्वीट को राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस ने पब्लिसिटी स्टंट तो भाजपा ने ‘निराशावाद’ करार दिया तो कुछ ने इसे ‘काल्पनिक भय’ माना। भाजपा के विवादित सांसद साक्षी महाराज ने पलटवार किया कि मीडिया को तरबेज अंसारी तो दिखता है, सैंकड़ों हिंदू मार दिए गए, यह नहीं दिखता। दुर्भाग्य से राजनीतिक बयानों के इस बियाबान में माॅब‍ लिंचिंग की त्रासदी की गंभीरता और खतरे कोई समझने  तैयार नहीं है। भीड़ के इस ‘अंधे न्याय’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से कानून बनाने को कहा था, लेकिन उसने कन्नी काट ली। अलबत्ता मध्यप्रदेश सरकार जरूर इस पर कानून बनाने जा रही है, जिसे विधानसभा में जल्द पारित कराया  जाने वाला है। 
इस गंभीर मसले के दो पहलू हैं। पहला तो भीड़ द्वारा खुलेआम बेशर्मी से किसी व्यक्ति की दोषी साबित होने के पहले ही निर्मम हत्या। दूसरा, हाल के वर्षों में गोरक्षा कानून की आड़ में बड़ी संख्‍या में मुस्लिम और दलितों की माॅब लिंचिंग। माॅब लिंचिंग जैसी सामाजिक बुराई कोई मोदी सरकार आने के बाद से ही शुरू हुई हो, ऐसा नहीं है। पूर्व केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथसिंह ने तो 1984 के सिख दंगों को भी बड़े पैमाने पर माॅब लिंचिंग बताकर मामले को अलग मोड़ देने की कोशिश की थी। इसी तरह कुछ लोग कश्मीर से ‍पंडित परिवारों  का पलायन भी परोक्ष रूप से माॅब लिंचिंग ही मानते हैं। अभी भी माॅब लिंचिंग केवल एक समुदाय‍ ‍िवशेष को लेकर ही हो रहा है, ऐसा नहीं है, यद्यपि इसका शिकार होने वाले ज्यादा लोग  खास समुदाय से हैं, यह सही है। 2014 से पहले होने वाली माॅब लिंचिंग की घटनाअो में अमूमन भीड़ की विवेकहीन हिंसा तो होती थी, लेकिन उसे जायज ठहराने का कोई राजनीतिक मैकेनिज्म नहीं था, जो अब दिखाई पड़ता है। दरअसल माॅब लिंचिंग की घटनाएं केवल शक के आधार पर अंजाम दी जाती हैं। यहां आरोपी को अपना पक्ष रखने का अवसर ही नहीं दिया जाता, फिर चाहे वह गो तस्करी हो, चोरी हो, बलात्कार हो या फिर कोई और कारण हो। अर्थात भीड़ ही जज और जल्लाद होती है। 
झारखंड में जिस तरबेज की भीड़ ने हत्या की, उस पर बाइक चोरी का शक था। यह भी कहा गया ‍कि मरने से पहले उससे जबरन जय श्रीराम बुलवाया गया। लेकिन पश्चिम बंगाल में जो ताजा माॅब लिंचिंग की घटना हुई, उसमें एक व्यक्ति को ‘जय श्रीराम’ बोलने पर ही कथित रूप से भीड़ ने मार डाला। उधर राजस्थान में जिस पहलू खान की गो तस्करी के मामले में भीड़ ने हत्या की थी, पुलिस ने उसके परिवार को ही आरोपी बना दिया। हालांकि गोतस्करी और उसके शक में पहलू खान की माॅब लिंचिंग अलग-अलग मामले हैं। उपलब्ध आंकड़ों को देखें तो साल 2014 से लेकर साल 2018 तक गोरक्षा के नाम पर हुए 87 मामलों में 50 फीसदी शिकार मुसलमान हुए, जबकि 20 प्रतिशत मामलों में शिकार लोगों की धर्म या जाति अज्ञात रही। 11 फीसदी दलितों को ऐसी हिंसा का सामना करना पड़ा। गोरक्षकों ने हिंदुओं को भी नहीं छोड़ा। 9 फीसदी मामलों में उन्हें भी शिकार बनाया गया। जबकि आदिवासी और सिख भी 1 फीसदी मामलों में शिकार हुए।
हो सकता है कि देश में बढ़ती माॅब लिंचिंग के कारण मप्र में अधिकारी  नियाज खान को लगा हो कि उन्हें इससे बचने  के लिए अपना नाम और हुलिया बदल लेना चाहिए। खान ने तो उन फिल्मी हीरो को भी नाम बदलने की सलाह दे डाली, जिनके नाम मुस्लिम हैं। नियाज खान का डर वाजिब हो सकता है, लेकिन समस्या का जो निदान उन्होंने सुझाया है, वह शायद ही  व्यावहारिक हो। उन्होंने जो कहा, वह अर्द्ध सत्य है। क्योंकि अ‍ामिर खान और शाहरूख की फिल्मे भले उनके उम्र दराज होने के कारण पिटने लगी हों, लेकिन सलमान खान और नवाजुद्दीन की फिल्मे तो खूब चल रही हैं। और फिर नाम बदलने से क्या होगा? माॅब लिंचिंग तो हिंदुअों की भी हो रही है। वो क्या करें? 
यहां मुददा केवल माॅब‍ लिंचिंग का शिकार मुसलमान या दलितों का ही नहीं है, समूची मानसिकता का है और इस मानसिकता को हवा देकर सियासी हित साधने का है। मोदी सरकार इस पर कानून शायद इसलिए नहीं बनाना चाहती, क्योंकि उसे परोक्ष रूप से इसका फायदा मिलता है। हालांकि कुछ लोगों का यह भी कहना है कि कानून बनाने से भी ज्यादा कुछ हासिल नहीं होगा, क्योंकि भीड़ के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई भी हवा में लठ घुमाने जैसी है। हालांकि वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजयसिंह का कहना है कि माॅब लिंचिंग भाजपा  और संघ की ‘दे दनादन’ संस्कृति का ही परिणाम है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि दरअसल देश में मॉब लिंचिंग का एक कारण यह भी है ‍कि लोगों को समय पर न्याय नहीं मिलता, इसलिए लोगों में गुस्सा है। 
दूसरा मुद्दा सरकार के खिलाफ बोलने अथवा उसकी नीयत या क्षमताअों पर सवाल उठाने को लेकर है। प्रधानमंत्री भारत को  50 खरब डाॅलर की अर्थव्यवस्था बनाना चाहते हैं तो यह उनकी ऊंची महत्वाकांक्षा का प्रतीक है। ऐसा हो, यह कौन नहीं चाहेगा। लेकिन यह काम जनता की भागीदारी के बगैर नहीं हो सकता। लेकिन अगर इस आंकड़े के हकीकत में बदलने पर किसी को शंका है तो वह ‘निराशावादी’ कैसे हुआ? हिंदू धर्म में भी वेदों को न मानने वालों को नास्तिक तो कहा गया है, लेकिन निराशावादी नहीं कहा गया। 
यहां मूल सवाल मानसिकता का है। समाज की असभ्यता का है। लोगों की भीड़ अराजक और हिंसक झुंड में क्यों बदल जाती है और ऐसा करने में उसे कौन सी संतुष्टि होती है? जामिया मिलिया दिल्ली के समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो.निशात कैसर  इसे ‘रिवर्स विक्टिमहुड’ कहते हैं। यानी जो हिंसा कर रहे हैं, वहीं खुद को ‘विक्टिम’ बताते हैं। इसके लिए इतिहास का सहारा लेते हैं और वर्तमान के कुकृत्यों को जस्टिफाइ करने की कोशिश करते हैं।" हो सकता है कि इसके कुछ तात्कालिक राजनीतिक लाभ मिलते हों, लेकिन डर इस बात का है कि यदि माॅब लिंचिंग को सख्‍ती से नहीं रोका गया तो एक दिन पूरा देश ही भीड़ तंत्र में तब्दील हो जाएगा। तब क्या होगा? 

 

 

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अजय बोकिल

जन्म तिथि : 17/07/1958, इंदौर

शिक्षा : एमएस्सी (वनस्पतिशास्त्र), एम.ए. (हिंदी साहित्य)

पता : ई 18/ 45 बंगले,  नार्थ टी टी नगर भोपाल

मो. 9893699939

अनुभव :

पत्रकारिता का 33 वर्ष का अनुभव। शुरूआत प्रभात किरण’ इंदौर में सह संपादक से। इसके बाद नईदुनिया/नवदुनिया में सह संपादक से एसोसिएट संपादक तक। फिर संपादक प्रदेश टुडे पत्रिका। सम्प्रति : वरिष्ठ संपादक ‘सुबह सवेरे।‘

लेखन : 

लोकप्रिय स्तम्भ लेखन, यथा हस्तक्षेप ( सा. राज्य  की नईदुनिया) बतोलेबाज व टेस्ट काॅर्नर ( नवदुनिया) राइट क्लिक सुबह सवेरे।

शोध कार्य : 

पं. माखनलाल  चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि में श्री अरविंद पीठ पर शोध अध्येता के  रूप में कार्य। शोध ग्रंथ ‘श्री अरविंद की संचार अवधारणा’ प्रकाशित।

प्रकाशन : 

कहानी संग्रह ‘पास पडोस’ प्रकाशित। कई रिपोर्ताज व आलेख प्रकाशित। मातृ भाषा मराठी में भी लेखन। दूरदर्शन आकाशवाणी तथा विधानसभा के लिए समीक्षा लेखन।  

पुरस्कार : 

स्व: जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी उत्कृष्ट युवा पुरस्कार, मप्र मराठी साहित्य संघ द्वारा जीवन गौरव पुरस्कार, मप्र मराठी अकादमी द्वारा मराठी प्रतिभा सम्मान व कई और सम्मान।

विदेश यात्रा : 

समकाालीन हिंदी साहित्य सम्मेलन कोलंबो (श्रीलंका)  में सहभागिता। नेपाल व भूटान का भ्रमण।