Sunday, April 21, 2019
उन्होंने कहा"जीवित मिट्टी वह होती है जिसका हम बार-बार उपयोग कर सकें :शशिकांत मुंडी को श्रद्धांजलि

उन्होंने कहा"जीवित मिट्टी वह होती है जिसका हम बार-बार उपयोग कर सकें :शशिकांत मुंडी को श्रद्धांजलि

मीडियावाला.इन।टालस्टॉय का कला के लिए कहा गया यह कथन महत्वपूर्ण है ‘रंग, ध्वनी, शब्द, कार्य आदि के द्वारा भावों की वह अभिव्यक्ति जो श्रोता, दर्शक आैर पाठक के मन में वही भाव उत्पन्न कर दे कला है।’मेरे  घर के ड्राइंग रूम में एक  एसी ही कलाकृति रखी है जिसे कमरे में रखी गणेशजी की अनेकानेक मूर्तियों के बावजूद आनेवाले कला पारखी  मेहमान ध्यान मग्न होकर देखते है ,और जानना चाहते रहे है कि यह कलाकृति  किस कलाकार की है ? आपको कहाँ से मिली ?

मैं बड़े गर्व से कहती रही हूँ कि यह देश के ख्यात नाम कलाकार शशिकांत मुंडी जी ने मुझे उनकी एक एक्जीविशन के बाद भेंट की थी .वे मेरे पारिवारिक मित्र है ,उनकी धर्मपत्नी मेरी सहपाठी और अभिन्न मित्र है .मेहमान के चहरे का भाव मुझे यह समझा देता रहा कि कला हमारे भाव-जीवन की सजीव आैर सवाक् या सशब्द अभिव्यक्ति है .आज सुबह एक मनहूस खबर मिली कि कलाजगत में जिन्हें अभी बहुत संभावनाएं दिखाई दे रही थी ,सरकारी नौकरी के तनाव और भागमभाग से वे बस अभी अभी ही सेवा निवृत हुए थे और बहुत कुछ करने की इच्छा लिए थे जिनका श्रेष्टतम अभी और आनेवाला था वे अचानक चुप चाप चले गए .इंदौर सदेव उनका आभारी रहेगा वे  कलाजगत के उस स्मारक को बचानेवाले व्यक्ति है जिन्होंने कला मंदिर की तरह देवलालिकर कला वीथिका को  टूटने और वहां व्यावसायिक भवन बनने से बचाया था .सच यह है कि  कलाकार ही किसी जगह ,किसी मिटटी ,किसी रंग का पारखी होता है वह उसके मोल को पहचानता है और देवलालिकर जी के शिष्य ,उनके नाती दामाद और अनूठे कलाकार शशिकांत मुंडी  कैसे उस जगह की पहचान को मिटने देते ?आज उनके अवसान पर मुझे बार बार मैथिली शरण गुप्त का कथन याद आ रहा है-कि  ‘अभिव्यक्ति की कुशल शकित ही तो कला है।’

कहा जाता है कि संसार में मनुष्य को श्रेष्ठ बनानेवाली जितनी भी विद्याएं हैं उनमें सिर्फ कला ही यह क्षमता रखती है कि वह इन सभी विद्याओं की सार्थकता को सिद्ध कर सके। 
 शशिकांत मुंडी अपने शिष्यों में सर संबोधन से जाने जाते रहे ,उनको एक कार्यशाला में अपने छात्रों को समझाते हुए सुना था वे इंदौर के फाइन आर्ट कॉलेज के प्राचार्य रहे है .मूर्तिकार शशिकांत मुंडी ने छात्र-छात्राओं को बेलन, लकड़ी का करछा, लोहे के सरिए के औजारों बेसिक जानकारी दी। उन्होंने पत्थरों मिट्टी के प्रकार समझाए। उन्होंने कहा  "जीवित मिट्टी वह होती है जिसका हम बार-बार उपयोग कर सकते हैं मृत मिट्टी वह है जिसे आग में पकाने के बाद दोबारा उपयोग नहीं कर सकते। कला साधक को पहले विद्या ग्रहण करना चाहिए। फिर सरस्वती के बारे में सोचना चाहिए। मूर्ति बनाना मेहनत काम काम है।।भारत की एक दीर्घ मूर्तिकला-परम्परा है जिसकी खोज नवपाषाणिक संस्कृतियों में की जा सकती है."
ग्वालियर में 1956 में जन्मे श्री शशिकांत सर ने वहीँ से श्री मदन भटनागर जी के सानिध्य में नॅशनल डिप्लोमा इन फ़ाईन आर्ट किया था .जहाँगीर आर्ट गेलरी में कलाकार एक बार अपने काम को प्रदर्शित कर धन्य हो जाते है वहीँ मुंडी जी की  तीन बार एकल आर्ट प्रदर्शनी हो चुकी थी ,देश भर में उनकी कलाकृतियों की प्रदर्शनी लग चुकी है ,लगभग 20 बार व ग्रुप के साथ उनकी कलाकृति प्रदर्शित  हुई है .कई महत्वपूर्ण सम्मानों से नवाजे गए थे विशेष रूप से कालिदास अवार्ड .मीरा अवार्ड , मध्यप्रदेश का राज्य सम्मान उन्हें मिला था .पर मजाल ही कभी उनके व्यवहार में उनके व्यक्तित्व के इस विशाल पक्ष की झलक भी दिखाई दे जाय ?

      

सहज ,सरल ,अल्पभाषी ,मृदु भाषी मुंडी जी बिरले ही व्यक्तित्व के धनी रहे .याद है मुझे जब मैं उनके पास अपनी नवोदित संस्था इंदौर लेखिका संघ की पहली स्मारिका के कवर पेज के लिए गई थी ,अत्यंत व्यस्तता का समय था वह उनका उदयपुर मेंउनका बना  कोई स्टेचू जाना था वे रात दिन लगे हुए थे,पर जाने कब कैसे उन्होंने  कवर पेज का स्केच बनाकर रख लिया था ,उनकी पत्नी को भी आश्चर्य हुआ  ,उन्होंने लेखिका संघ का मोनो भी डिजाइन किया था ,तब संस्था के पास कुछ नहीं था नया नया उत्साह था पर कला के जोहरी  तो वे थे  ही एक संस्था को उनका यह आशीर्वाद ही था ,आज २२ वर्ष हो गए संस्था चल रही है .पर दुखद यह की मुंडी जी अचानक चले गए यह खबर मुझे विचलित किये हुए है ,स्तब्ध हूँ उस गणेश जी की पंचमुखी अनूठी कलाकृति के सामने खड़ी .उन्हें  याद करते हुएयाद कर रहीं हूँ  ,कितनी बार उनके घर जाते रहे है हम  ,उनके हाथ की बनी खिचड़ी खायी है उनके साथ घंटों बातें की है . मेरी मित्र उनकी धर्मपत्नी सीमा बड़े गर्व से उनकी एक एक कृति मुझे समझाती थी ,उनके काम  को वे सहयोगी के रूप में पूरी तन्मयता से करती रही सहधर्मिणी के रूप में सीमा जो कभी आभा रही है उसका एक अलग रूप देखा है मैंने .उसके जीवन को अपने कलाकार पति के चारों और ही परिक्रमा करते देख मुझे उसमें कोई देवीत्व शक्ति  दिखाई देती रही . मित्र जब कई सालो बाद दुबारा मिलते है तब वे ज्यादा अपने से सुख दुःख के साथी हो जाते है ,एक दुसरे के दृष्टा से ,अच्छे सलाहकार भी और सहयोगी भी  .बस हम  उसी भाव में रहे .। वस्तुत: कला का सृजन, हमारे परिमित व्यक्तित्व की सीमा से दूर, किसी ऐसे असीम जिसमें गति, लय, ताल, व्यंजना आदि सौन्दर्य प्रेरक तत्वों का समावेश हो तथा जहां स्थापित नियमों, मान्यताओं से परे जाकर विशाल अनन्त में होता है। आज एक कलाकार उसी अनंत यात्रा पर चला गया ---एक विशाल केनवास को थामे जहाँ कोई चंद्रमा फिर नया शशिकांत  बनेगा .मेरे घर में आपकी स्मृति  कलाकृति के रूप में सदैव रहेगी . आपके व्यक्तित्व को शब्द देने जैसे शब्द कहाँ है मेरे पास पर इसे ही शब्द श्रधान्जली के रूप में अर्पित कर रही हूँ ,और अपनी प्रिय मित्र और उन बेटियों के लिए प्रार्थना है ,इस अपार दुःख को धैर्य के साथ सहन करने की शक्ति इश्वर उन्हें दे ,सादर भावभरा नमन  

 

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