पतन निहित परपीड़न रीत
राधा-रुक्मणी और पूतना; सीता-उर्मिला और शूर्पनाखा जैसी स्त्रियों का हर युग साक्षी रहा है। जहाँ वात्सल्य के साथ वैर की भावना का भी निवास रहा है। अंतर बस इतना है, उस युग में दुष्कृत्य का कारण भौतिकतावाद नहीं था। आज असंतुष्टि की भावना ने व्यक्ति को मानवता के निचले स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया है। जिससे पुरुष नारी दोनों ही अछूते नहीं रहे।
बरसों से जब स्त्रियों के साथ अनाचार होता रहा, हम उन्हें हिम्मत दिलाते रहे, साहस की परिभाषा स्मरण करवाते रहे। यदि अधिकारों का स्मरण करवाया होता तो ऐसी घटनाएं कम होती। आज महिलाएं बगावत पर उतरी सी लगती हैं। वह कृत्य जब पुरूष करके बरी हो गया तो हम पर फंदा क्यों? शायद यही विचारधारा हो उनकी? और असंतुलन तो हर जगह व्याप्त है, हम ट्विशा की दुर्घटना को नजरअंदाज नहीं सकते, जहाँ स्वतंत्र होने का सिला मौत होता है।
दरअसल मुद्दा स्त्री पुरुष का ना होकर एक ऐसी मानसिकता का है, जहाँ इंसान व इंसानियत से अधिक बेजान चीज़ों को तवज्जोह दी जाती है। खुद में मगरूरता और परिवारवाद को नकारते विचार इसकी जड़ है। स्त्री, मन से मजबूत व पुरुष, तन से बलिष्ठ होते हैं। लेकिन मन की मजबूत स्त्री जब परपीड़क हो प्रेम की भाषा भूल जाए, तब परिवर्तन बेशक पतन की ओर ले जा रहा है।
डॉ निशी मंजवानी
भारत में नारी को सदैव प्रेम, ममता, त्याग और करुणा की मूर्ति माना गया है। माँ, बहन, पत्नी, बहू और बेटी के रूप में वह परिवार और समाज को एक स्नेह के सूत्र में बाँधने का कार्य करती है। किंतु अभी कुछ दिनों में सोनम और सिया जैसे चर्चित मामलों ने समाज को गहन चिंतन के लिए विवश कर दिया है। जिन महिलाओं से प्रेम, संवेदनशीलता, वात्सल्य और मानवीय मूल्यों की अपेक्षा की जाती है, उन्हीं के नाम जब अपराध, क्रूरता या स्वार्थपूर्ण कृत्यों से जुड़ते हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि– क्या नारी की मानसिकता बदल रही है?
वास्तव में इसके पीछे केवल व्यक्तिगत कारण नहीं, बल्कि आज का भौतिकवादी, प्रतिस्पर्धी और स्वार्थप्रधान वातावरण भी जिम्मेदार है, जहाँ रिश्तों से अधिक महत्व व्यक्तिगत इच्छाओं , स्वार्थ और महत्वाकांक्षाओं को दिया जाने लगा है। सोनम और सिया के प्रकरण नारी समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि वे उन अपवादात्मक घटनाओं का उदाहरण हैं जो समाज में बढ़ते नैतिक पतन और मूल्य-संकट को उजागर करती हैं। कुछ घटनाओं के आधार पर संपूर्ण नारी जाति का मूल्यांकन करना उचित नहीं होगा, क्योंकि आज भी असंख्य महिलाएँ अपने त्याग, प्रेम, कर्तव्यनिष्ठा और संस्कारों से परिवार, समाज और राष्ट्र को सशक्त बना रही हैं। इसलिए इसे नारी जाति का पतन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के उस नकारात्मक पक्ष के रूप में देखना चाहिए, जहाँ नैतिक शिक्षा, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों का क्षरण हो रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि परिवार, शिक्षा और समाज मिलकर इन मूल्यों को पुनः सुदृढ़ करें, ताकि नारी और पुरुष दोनों अपने श्रेष्ठ मानवीय स्वरूप को बनाए रखते हुए स्वस्थ और संस्कारित समाज के निर्माण मेंअपना योगदान दे सकें।
संध्या पाण्डेय
वर्तमान समय में सिया, सोनम जैसे और भी अनगिनत मामलें दिखाई दे रहें हैं ,जिससे समाज में चिंता का माहौल पैदा हो गया हैं । यही सारी घटनाएँ पहलें भी होती थी कभी सती प्रथा, दहेज प्रथा,घरेलू हिंसा,अंधविश्वास जो पुरुषों द्वारा महिलाओं पर किया जाता था। इसका मूल कारण अगर हम देखें तो अशिक्षा थी ,हमनें बेटियों को पढ़ाया लिखाया, प्यार स्नेह भी दिया। जो पूर्व की पीढ़ियों में बेटी होनें की वजह से कहीं ना कहीं माता पिता के प्यार स्नेह से बेटियाँ वंचित रहीं थी।पर आज इस बात पर भी विशेष ध्यान दिया गया है।
विवाह एक जरूरी सामाजिक संस्कार है, जो सारी दुनिया में प्रचलित है।
इस तरह की घटनाएँ बेहद शर्मसार करने वाली हैं,इन घटनाओं पर चर्चा होना अत्यंत आवश्यक हैं, लेकिन जब कोई पुरुष इस तरह की घटना को अंजाम देता है तो उस पर भी उतनी ही गंभीरता के साथ ,समाज को जागरूक होना चाहिए। और सामाजिक स्तर पर चर्चा का विषय होना चाहिए जैसे आज हम सब कर रहें हैं ।क्योंकि अपराध सिर्फ अपराध होता है, जान किसी की भी जाए जान ही जाती है। एक घर का चिराग रौशन होने की बजाय बिना किसी कारण से असमय ही मौत का शिकार हो जाता है।
आज सुख सुविधाए देनें के साथ साथ कहीं ना कहीं हम संस्कार देनें में चुकें हैं।
हर बात में पुरुषों की बराबरी अच्छी बात है लेकिन बराबरी कहां नहीं होना चाहिये, ये हमें बताना पड़ेगा। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि कोई स्त्री अत्याचार सहें ।इसका मतलब बस इतना है कि वह स्वयं का जीवन अपने हिसाब से जीनें के लिए स्वतंत्र है लेकिन किसी और के जीवन से खेलनें का कोई अधिकार नहीं है ।अपराध हर हाल में अपराध होता है और वो जेंडर बेस्ड कम या ज़्यादा नहीं हो सकता है।
हमारें पारिवारिक ढाँचे पर भी हमें गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है ।माता पिता अपनें बच्चों से बहुत अधिक ठोक बजा कर विवाह जैसे जीवन दिशा बदलनें वाले विषय पर गंभीरता से चर्चा करके ही किसी निर्णय पर पहुँचे। स्कूलों में भी शिक्षा के स्तर पर उचित बदलाव करके बच्चों को शिक्षित किया जाना चाहिए।
परिपक्व बच्चों को हमेशा उतनी आज़ादी होना चाहिये कि वो अपनें परिवार से अपनें भविष्य के बारे में खुल कर बात कर सकें ,और माता पिता को भी उसकी बात को समझना होगा।
क्योंकि किसी और का जीवन भी आपके बच्चों के जितना ही कीमती और महत्वपूर्ण जीवन है। यूँ ही कोई किसी की बलि नहीं चढा सकता।
नीलम सिंह सूर्यवंशी
हमारे पूर्वज कहते थे बेटियाँ दो कुलो में उजाला करती है पीहर में और ससुराल में ।
आधुनिक परिवेश में कुछ महिलाओं ने शिक्षित और आधुनिक होने का ग़लत मूल्यांकन कर लिया है स्वतंत्रता का ग़लत आकलन कर लिया है ।महत्वाकांक्षी होना अच्छी बात है किंतु अत्यंत महत्वाकांक्षी होना खतरनाक है ।
मेरे विचार से माता पिता को बचपन से ही बच्चों से खुलकर बात करनी चाहिए ,प्रतिदिन उनसे उनकी दिनचर्या के बारे में पूछे उनसे मित्रवत व्यवहार करे ताकि वे खुलकर आपसे अपने मन की बात कर सके ।
बचपन से बच्चों में मानवीय गुणों के विकास पर जोर दे ।उन्हें प्रेम ,दया ,सहिष्णुता ,परस्पर सहयोग का मूल्य बताए ।अच्छे और बुरे कार्य और उनके परिणामों के बारे में बताए ।
पुरुष हो या स्त्री अच्छे गुणों का समावेश दोनों के लिए जरूरी है क्यों की एक अच्छे समाज की संरचना के लिए दोनों ही एक समान जिम्मेदार है ।
कुछ स्त्रीयों के अपराध स्वरूप पूरी स्त्री जाति को कलंकित और जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते ।
हाँ किंतु कुछ स्त्रीयों के कारण पतन के रास्ते तो खुल ही गए है ।
अब समय है की संभल जाए नहीं तो भविष्य अंधकारमय हो सकता है ।
सपना उपाध्याय
हमारे सामने आज एक अजीब दौर है, जहाँ सोनम (राजा रघुवंशी केस), सिया (केतन अग्रवाल केस) या मुस्कान (नीला ड्रम केस) जैसी महिलाओं ने अपराधों से समाज को चौंका दिया। पहले जहाँ महिलाओं को पीड़ा का प्रतीक माना जाता था, अब यह बदलाव चिंताजनक है। पैरेंट्स की जिम्मेदारी है कि वे बेटियों को समझाएँ—राजकुमारी होना सिर्फ इच्छाओं का पूरा होना नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों और समाज के हित के लिए खड़े रहना है। यह बदलाव हमारे लिए चेतावनी है—हमें अपनी बेटियों को शक्ति के साथ सहानुभूति भी सिखानी होगी।
यह चिंतन तब और गहरा होता है जब हम “धुरंदर” जैसी फिल्म देखते हैं, जहाँ कटे सिर से फुटबॉल खेलने पर तालियाँ बजती हैं। दूसरी ओर, “कृष्णावतारम” प्रेम के विभिन्न रूप दिखाती है, पर उसे उतनी सराहना नहीं मिलती। यह बताता है कि हम हिंसा का महिमामंडन कर रहे हैं, जबकि प्रेम, सहनशीलता, और सहानुभूति को कमजोर समझ रहे हैं।
अब समय आ गया है कि हम समाज के रूप में आत्ममंथन करें। चाहे लड़का हो या लड़की, हमें सबके भीतर प्रेम, सहानुभूति और सम्मान की भावना जगानी होगी।
आज हम माता-पिता के रूप में सिर्फ बच्चों की पढ़ाई, करियर और कमाई पर ध्यान दे रहे हैं। हम उनके आईक्यू को बढ़ाने में लगे हैं, लेकिन ईक्यू—यानी भावनात्मक बुद्धिमत्ता—को नजरअंदाज़ कर रहे हैं। अब ज़रूरी है कि हम उनकी भावनात्मक परिपक्वता पर भी ध्यान दें। वरना हम जल्द ऐसे समाज में होंगे जहाँ इंसान, भावनाओं से रहित, बस आदेश मानने वाले रोबोट बन जाएँगे।
डॉ मिनल डोंगरे ‘स्याही’
हाल ही में एक घटना ने समाज को झकझोर दिया, जिसमें एक युवती ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने करोड़पति व्यवसायी मंगेतर की हत्या कर दी। ऐसी घटनाएँ अक्सर यह प्रश्न खड़ा करती हैं कि क्या यह नारी की बदलती मानसिकता का परिणाम हैं या नैतिक पतन का संकेत। किंतु इस विषय को केवल स्त्री-पुरुष के दृष्टिकोण से देखना न तो उचित है और न ही न्यायसंगत।
वास्तव में किसी भी आपराधिक कृत्य के पीछे एक विशेष प्रकार की मानसिकता कार्य करती है। यह मानसिकता किसी जेंडर से नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र, संस्कारों, वृत्तियों और व्यक्तित्व की विकृतियों से जुड़ी होती है। ऐसे व्यक्तियों को जीवन की समस्याओं का समाधान भी अक्सर छल, हिंसा, षड्यंत्र या अपराध के माध्यम से ही दिखाई देता है। जैसे इस केस में आसानी से अन्य किसी भी समाधान पर विचार किया किया जा सकता था , जैसे परिवार में बैठकर बात करना, मंगेतर से बात करना , मंगनी तोड़ देना आदि लेकिन आपराधिक प्रवृत्ति के कारण ये जघन्य अपराध किया गया।इसलिए अपराध को स्त्री या पुरुष की प्रवृत्ति न मानकर मानवीय चेतना की विकृति के रूप में समझना अधिक उचित होगा।
अब यदि हम हमारी भारतीय आध्यात्मिक दृष्टि देखें तो योग दर्शन भी इसी सत्य की ओर संकेत करता है। पतंजलि योगसूत्र में वर्णित पाँच क्लेश ;अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ,मानव दुःख तथा अधर्म के मूल कारण माने गए हैं। जब व्यक्ति अविद्या के कारण अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर अहंकार, आसक्ति और स्वार्थ के अधीन हो जाता है, तब उसके निर्णय भी विकृत होने लगते हैं। धीरे-धीरे उसके भीतर संचित संस्कार और वासनाएँ इतनी प्रबल हो सकती हैं कि वह दूसरों के जीवन, भावनाओं और अधिकारों की उपेक्षा करने लगता है। इस दृष्टि से अपराध केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि चेतना के पतन और आत्मबोध से दूरी का भी संकेत है।
अब यदि हम देखें तो आज की प्रतिस्पर्धी जीवनशैली में यह भी देखने को मिलता है कि मनुष्य करुणा, प्रेम, दया, ममता और संवेदनशीलता जैसे मूल मानवीय गुणों से दूर होता जा रहा है।
मुझे लगता है कि सबसे बड़ी विडंबना यह है कि ऐसे लोगों को पहचानना सरल नहीं होता। वे सामान्य, आकर्षक और विश्वासयोग्य व्यक्तित्व का आवरण ओढ़े रहते हैं। फिर भी कुछ संकेत सावधान कर सकते हैं जैसे दूसरों के दुःख के प्रति उदासीनता, अपने स्वार्थ के लिए रिश्तों का उपयोग करना, बार-बार झूठ बोलना, गलती पर पश्चाताप का अभाव, अत्यधिक नियंत्रणकारी व्यवहार तथा सार्वजनिक और निजी व्यक्तित्व में बड़ा अंतर। व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके शब्दों से नहीं, बल्कि लंबे समय तक दिखाई देने वाले व्यवहार से होती है। विशेष रूप से यह देखना चाहिए कि वह कमजोर और असहाय लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है तथा अपनी गलतियों की जिम्मेदारी स्वीकार करता है या नहीं।
अतः नारी की बदलती मानसिकता को केवल पतन या परिवर्तन की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। वास्तविक प्रश्न स्त्री या पुरुष का नहीं, बल्कि मानव चरित्र, नैतिक मूल्यों और चेतना की गुणवत्ता का है।
डॉ.रश्मि जोशी
माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के साथ समय बिताएँ, उनकी संगत पर ध्यान दें, उन्हें सही-गलत समझाएँ। यह उम्र आकर्षण की होती है, इसलिए बच्चों को सावधान करना आवश्यक है ताकि वे अपराध या गलत राह पर न जाएँ। जब बच्चे भटक जाते हैं और माता-पिता पाबंदी लगाते हैं, तो टकराव और विद्रोह की स्थिति पैदा होती है।।
शिक्षा प्रणाली को मजबूत बनाना होगा। केवल विषयों की शिक्षा ही नहीं, बल्कि नैतिकता, संस्कार और शिष्टाचार का पाठ भी पढ़ाया जाना चाहिए। आज विरले ही परिवार ऐसे मिलते हैं जो बच्चों को संस्कार और नैतिकता सिखाते हैं ।
लिव-इन रिलेशनशिप और समलैंगिक संबंधों को मान्यता देने से भारतीय संस्कृति पर प्रश्नचिह्न लग रहा है। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए। आधुनिकता का चोला ओढ़े युवा हीरो-हीरोइन की नकल करते हैं, वेब सीरीज देखते हैं और माता-पिता से बातें छिपाते हैं। कई बार यह आकर्षण प्रेमी या मंगेतर के लिए मृत्यु का कारण बन जाता है।
प्रभा तिवारी
दुर्भाग्य यह है कि सनसनीखेज घटनाएं समाज की सामूहिक स्मृति पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। लाखों बेटियां जो अपने माता-पिता की सेवा कर रही हैं, हजारों महिलाएं जो परिवार और करियर दोनों की जिम्मेदारियां निभा रही हैं, अनगिनत पत्नियां जो हर सुख-दुख में अपने जीवनसाथी का साथ दे रही हैं। उनकी कहानियां सुर्खियां नहीं बनतीं। समाचारों में वही आता है जो असामान्य और चौंकाने वाला होता है।
इसलिए आवश्यकता भावनात्मक प्रतिक्रिया देने की नहीं, बल्कि समस्या की जड़ को समझने की है। प्रश्न यह नहीं है कि “लड़कियां बिगड़ रही हैं” या “लड़के बिगड़ रहे हैं”। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हमारा समाज नैतिक मूल्यों, सहनशीलता, संवाद और मानवीय संवेदनाओं से दूर होता जा रहा है?
जब बच्चों का पालन-पोषण केवल सफलता और धन कमाने के लक्ष्य से होगा, लेकिन चरित्र निर्माण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब ऐसे संकट पैदा होंगे। जब रिश्तों को निभाने की कला नहीं सिखाई जाएगी, तब टूटन बढ़ेगी। जब अधिकारों की चर्चा होगी लेकिन कर्तव्यों की नहीं, तब असंतुलन पैदा होगा।
अतः नारी की बदलती मानसिकता को पतन कहना जल्दबाजी होगी। यह परिवर्तन का दौर है, जिसमें उपलब्धियां भी हैं और चुनौतियां भी। कुछ अपराधों के आधार पर पूरे स्त्री समाज को कटघरे में खड़ा करना न तो उचित है और न ही बुद्धिमानी। हमें व्यक्ति के अपराध को व्यक्ति तक सीमित रखना चाहिए और समाज की व्यापक समस्याओं को समझने का प्रयास करना चाहिए।
डाॅ.दविंदर कौर होरा




