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Film Review: वनवास- कलयुग की रामायण जैसी वनवास

Film Review: वनवास- कलयुग की रामायण जैसी वनवास

डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी

फेमिली ड्रामा देखकर सिनेमा हॉल से बाहर जा रहे दर्शक अगर इमोशनल हों और उनकी आखें भीगी हुई हों तो इसका अर्थ है कि फिल्म ने उन्हें छुआ है लेकिन सवाल है कि 20 साल पुरानी कहानी देखने दर्शक सिनेमाघर में घुसेगा क्यों?

एक पुत्र-मोह कैकेयी को था, दूसरा डायरेक्टर अनिल शर्मा को है। ग़दर -2 में उन्होंने तारा सिंह के बेटे जीता के रोल में अपने बेटे उत्कर्ष को पेश किया था। यहां भी उन्होंने जीता की प्रेमिका सिमरत कौर को मौका दिया। गदर -2 खूब चली, लेकिन क्रेडिट तो सनी ले गए। अनिल शर्मा को पता है कि उनका बेटा अपने दम पर तो फिल्म खींच नहीं पायेगा, इसलिए उसे नाना पाटेकर के कंधे पर चढ़ाया, लेकिन यहां भी क्रेडिट नाना पाटेकर ले जा रहे हैं।

 

वनवास नई संवेदनाओं और पुराने आदर्शों के साथ प्रस्तुत करती है। यह फिल्म दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने में सफल रहती है। हालांकि कहानी नई नहीं है, लेकिन इसकी प्रस्तुति और कलाकारों के शानदार अभिनय इसे खास बनाते हैं। नटसम्राट फिल्म में लोगों ने नाना पाटेकर माना। इसमें भी नाना पाटेकर ऐसे छाये रहे कि उत्कर्ष शर्मा उनके साये में आ गए।

फिल्म की कहानी दीपक त्यागी (नाना पाटेकर) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एडवांस डिमेंशिया यानी भूल जाने की बीमारी से ग्रसित हैं। उनके तीन लालची बेटे और बहुएं संपत्ति के लालच में उन्हें बनारस के घाट पर छोड़ आते हैं और लोगों को कहानी बताते हैं कि दीपक त्यागी गंगा में तैरते समय डूब गए। त्यागी की मुलाकात घाट पर एक शरारती और दिलचस्प किरदार बीरु (उत्कर्ष शर्मा) से होती है, जो बाद में त्यागी को उसके परिवार से मिलाने के मिशन पर निकलता है।

 

कहानी का पहला भाग थोड़ा धीमा है, लेकिन दूसरे और तीसरे हिस्से में यह भावनात्मक और मनोरंजक मोड़ लेती है। क्लाइमेक्स तक आते-आते फिल्म दर्शकों को कई बार भावुक करती है। पटकथा कुछ जगह खिंची हुई लगती है, लेकिन अनिल शर्मा के निर्देशन ने इसे संतुलित किया है।

 

नाना पाटेकर ने त्यागी के किरदार में गहराई और वास्तविकता भरी है। उनकी आंखों में दर्द और संवादों में मजबूती दर्शकों को बांधे रखती है। उत्कर्ष शर्मा ने अपने किरदार बीरु में जोश और संवेदनशीलता का अच्छा मिश्रण पेश किया है। उनका अभिनय विशेष रूप से उस दृश्य में छू जाता है जहां वह त्यागी को अपनाने की बात करते हैं।सिमरत कौर ने अपने हिस्से को सहजता से निभाया है। राजपाल यादव और अश्विनी कालसेकर ने हास्य और भावनात्मक पहलुओं को जोड़ने में अहम भूमिका निभाई। सहयोगी कलाकारों जैसे खुशबू सुंदर, मुश्ताक खान, और वीरेंद्र सक्सेना ने भी अपनी भूमिकाओं में गहराई लाई है।

 

फिल्म में सिनेमैटोग्राफी (कबीर लाल) काबिले तारीफ है। बनारस के घाट, शिमला के बर्फीले दृश्यों और भावनात्मक क्षणों को शानदार तरीके से कैद किया गया है। हालांकि, संपादन कुछ जगह कमजोर है, जिससे फिल्म की गति पर असर पड़ता है। बैकग्राउंड म्यूजिक कहानी के भावनात्मक पहलुओं को उभारता है, लेकिन गाने उतने यादगार नहीं हैं।

अनिल शर्मा ने बिल्कुल अलग शैली की फिल्म बनाने का साहस दिखाया है। वनवास माता-पिता और बच्चों के रिश्तों में आ रही दरारों को उजागर करती है। फिल्म का संदेश स्पष्ट है – माता-पिता का सम्मान और देखभाल हर बच्चे का फर्ज है।

उत्कर्ष शर्मा ने इस फिल्म में अपनी अभिनय क्षमता को बखूबी दिखाया है। अगर उन्हें आगे भी इसी तरह की दमदार और गहराई वाली भूमिकाएं मिलती हैं, तो वह निश्चित रूप से एक बड़े स्टार बन सकते हैं।

 

वनवास भावनाओं और पारिवारिक मूल्यों को बड़े पर्दे पर खूबसूरती से पेश करती है। बनारस के घाटों और हिमाचल के बर्फीले पहाड़ों के दृश्य दर्शकों के मन में छा जाते हैं। कुछ खामियां हैं, लेकिन कहानी का मजबूत संदेश है। यह फिल्म पूरे परिवार के साथ देखी जा सकती है।

 

*डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी*