आँख मूँद नियति को मानूँ या बेदीन कहाऊँ…

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आँख मूँद नियति को मानूँ या बेदीन कहाऊँ…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

आज के लेख की शुरुआत हम एक कविता से करते हैं। कविता का शीर्षक है ‘जी चाहता है’। कवि हैं करतार सिंह दुग्गल। करतार सिंह दुग्गल की बात आज इसलिए क्योंकि आज उनका जन्मदिन है। पहले कविता पढ़ते हैं।

‘जी चाहे वह तट देखूँ

जहाँ यार रहते हैं

उस कुटिया उस महल को देखूँ

साजन जहाँ बसते हैं

बैठते-उठते, खाते-पीते

कब सोए, कब जागे

जब उसका मन कर आए

किस-किस से बतियाए।

 

जहाँ बैठकर हुकुम चलाएँ

घूमे, चूमे, सँवारे

जहाँ तैरते डूब रहे सब

जहाँ से पार उतारे

जहाँ उसी के हल चलते हैं

चरख़े जहाँ पर घूमें

गण गंधर्व जहाँ गाते है

नाच नचाए धूम।

 

कौन है उसका खाता रखता

लेखा-जोखा करता?

कब सुनता फ़रियाद किसी की?

कान कहाँ धरता है?

कब भेजे, क्या भेज बुलाए?

क्या संयोग बनाए?

सहक रहा क्यों फूल लग रहा

बिन खिले क्यों झरता?

 

बात यह समझ न आए

यही बात मैं बूझ सकूँ तो

बैठ उसके चरणों में

यह पहेली सुलझाऊँ।

कब से खिचड़ी रीझ रही है

यह तो बात न कोई

आँख मूँद नियति को मानूँ

या बेदीन कहाऊँ।

( बेदीन का अर्थ है धर्म को ना मानने वाला)

विश्व पुस्तक मेले के आरम्भकर्ता करतार सिंह दुग्गल थे। वह जब नेशनल बुक ट्रस्ट के संचालक बने तब उन्होंने ‘विश्व पुस्तक मेले’ का आगाज किया जो आज तक जारी है। भारत का सबसे बड़ा पुस्तकालय आन्दोलन, राजा राममोहन रॉय फाउंडेशन, भी दुग्गल साहब के हाथों कायम हुआ।

करतार सिंह दुग्गल (जन्म- 1 मार्च, 1917; मृत्यु- 26 जनवरी, 2012) पंजाबी, हिंदी और उर्दू भाषाओं में लिखने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार थे जिन्होंने पंजाबी, उर्दू, हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषा में लघु कथाएँ, उपन्यास, नाटकों की रचनाएँ की। इनकी रचनाओं का भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है। करतार सिंह दुग्गल को सन 1988 में भारत सरकार द्वारा साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

करतार सिंह दुग्गल का जन्म 1 मार्च, 1917 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान), अविभाजित पंजाब में हुआ था। उन्होंने लाहौर के फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज से अंग्रेज़ी में एम.ए. किया था।उन्होंने 1942 से 1966 तक आकाशवाणी में केंद्र निदेशक समेत विभिन्न पदों पर काम किया तथा इस दौरान उन्होंने आकाशवाणी के लिये पंजाबी समेत दूसरी भाषाओं में कई नाटक और कहानियाँ लिखीं। इनकी पत्नी का नाम ‘आयशा’ है तथा इनका एक पुत्र भी है। 1966-73 में करतार सिंह दुग्गल नेशनल बुक ट्रस्ट के निदेशक पद पर थे और 1973 से 1976 तक सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में बतौर सलाहकार उन्होंने अपनी सेवाएं दीं।

करतार सिंह दुग्गल ने सैकड़ों कहानियाँ और कविताएँ लिखीं तथा उनकी कहानियों के कुल 24 संग्रह प्रकाशित हुये। इसी तरह कविताओं के भी 2 संग्रह प्रकाशित हुये। इसके अलावा उन्होंने 10 उपन्यास और 7 नाटक भी साहित्य संसार को सौंपे। इनकी कई कहानियों के भारतीय-विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुए और सैकड़ों संग्रह प्रकाशित हुए। करतार सिंह के दो कविता संग्रह और एक आत्मकथा भी पाठकों तक पहुँची। उनकी पुस्तकें कई विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम का हिस्सा बनीं। हाल मुरीदों का, ऊपर की मंजिल, इंसानियत, मिट्टी मुसलमान की, चील और चट्टान, तुषार कण, सरबत्त दा भला इनकी लोकप्रिय रचनाएँ हैं।

करतार सिंह के साहित्य को जानने वाले लोग इन्हें एक माहिर फनकार के तौर पर याद करते हैं। दिल्ली, पंजाबी साहित्य अकादमी के सचिव रवैल सिंह करतार सिंह दुग्गल को पंजाबी लेखकों में पहली पंक्ति का सिपाही मानते हैं। रवैल सिंह दुग्गल को गुरु ग्रंथ साहब के नए काव्य संस्करण के लिए भी याद करते हैं।

करतार सिंह दुग्गल को सन 1988 में भारत सरकार द्वारा ‘साहित्य एवं शिक्षा’ के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। करतार सिंह साहित्य अकादमी सम्मान सहित कई सम्मानों से नवाजे गए।उन्होंने उपन्यास, कहानियाँ, और नाटक लिख कर अपने लिए साहित्य की दुनिया में जगह बनाई।करतार सिंह दुग्गल का निधन 26 जनवरी, 2012 को दिल्ली में हुआ था।

हिंदी में उनकी लोकप्रियता का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि जब साल 1965 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, तो आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने टिप्पणी की थी कि ‘मुझे यह जानकर ताज्जुब हो रहा है कि…(इन्हें) पंजाबी का पुरस्कार मिला है मैं तो अब तक उन्हें हिंदी का लेखक ही समझता रहा हूं।’ इसकी वजह थी, पंजाबी में छपने के तुरंत बाद उनकी कृतियां हिंदी में आ जातीं। भारतीय साहित्य में सरदार करतार सिंह दुग्गल का नाम उन गिने-चुने शीर्षस्थ साहित्यकारों में शामिल था, जिन्होंने प्रचुरता में लिखा और बेहद लोकप्रिय हुए।

 

 

लेखक के बारे में –

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।

वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के

लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।