शिक्षा के क्षेत्र में अराजकता की जिम्मेदारी किसकी ?

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शिक्षा के क्षेत्र में अराजकता की जिम्मेदारी किसकी ?

आलोक मेहता

शिक्षा मंत्रालय के अधीन विभिन्न विषयों पर सुप्रीम कोर्ट सहित शैक्षणिक सामाजिक क्षेत्र में नाराजगी बढ़ती जा रही है | इसीलिए हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिम्मेदारियों को तय करने और प्रतिबद्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए | प्रधानमंत्री की चिंता का कारण शिक्षा क्षेत्र को लेकर बढ़ती सार्वजनिक आलोचना और शिक्षा मंत्रालय पर एनसीईआरटी विवाद में सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई के पश्चात राष्ट्रपति द्वारा सीधे एजेंसी को कार्रवाई करने का निर्देश दिया जाना भी है | गंभीर मुद्दा यह है कि शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान अथवा कुछ अन्य संघ भाजपा समर्थक बिना असलियत जाने सारी समस्याओं और गड़बड़ियों के लिए` प्रधान मंत्री कार्यालय को बहुत हद तक उत्तरदाई बताने की कोशिश करते हैं | जबकि प्रधान मंत्री और उनके सहयोगी नीति निर्धारण और महत्वपूर्ण निर्णयों पर विस्तार से चर्चा करते हैं | यह भी सुनिश्चित करते हैं कि किसी गड़बड़ी को समय रहते रोका जा सके | जैसे नई शिक्षा नीति और शिक्षा के विस्तार के कार्यक्रमों पर उनका पूरा ध्यान रहा | लेकिन सामान्य कामकाज , नियुक्तियों , पाठ्यक्रमों , पुस्तकों इत्यादि का पूरा दायित्व मंत्री और मंत्रालय का रहता है |

उच्च शिक्षा का तंत्र देश की सामाजिक-आर्थिक प्रगति की रीढ़ की हड्डी है। केंद्रीय विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा और शोध को बढ़ावा देते हैं। लेकिन फ़रवरी 2026 में यह तंत्र एक गहन संकट से जूझ रहा है — प्रशासनिक नेतृत्व, शिक्षण पद, नीति विवाद और शिक्षा मंत्रालय की जवाबदेही पर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।एक तरफ केंद्रीय विश्वविद्यालयों में खाली पड़े 25% से अधिक पदों को भरना है |में लगभग 54 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, जिनके (Vice-Chancellor) सीधे देश के राष्ट्रपति के द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। 2024-25 में एक रिपोर्ट के अनुसार, देश के 56 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से लगभग 14 में स्थायी कुलपति की कुर्सी रिक्त थी। फरवरी 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय शिक्षा मंत्रालय केंद्रीय विश्वविद्यालयों में बड़े पैमाने पर रिक्तियों और नए नियमों व पाठ्यपुस्तकों से जुड़े विवादों का सामना कर रहा है।फरवरी 2026 तक 45-46 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 5,000 से 6,000+ से अधिक फैकल्टी पद (प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर) खाली होने की रिपोर्ट है।कुल स्वीकृत लगभग 18,951 शिक्षण पदों में से, लगभग 4,889 से 5,182 पद खाली चल रहे हैं।जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी कुलपतियों और कुलसचिवों की रिक्तियों को चार महीने के भीतर भरा जाए।सरकार ने 2022 से अब तक केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों आई आई टी आई आई एम में “मिशन मोड” में 17,000 से अधिक फैकल्टी पद भरे हैं, लेकिन सेवानिवृत्ति और छात्रों की बढ़ती संख्या के कारण रिक्तियां अभी भी बनी हुई हैं।

वहीं दूसरी ओर नए ‘इक्विटी नियमों’ और एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तकों’ को लेकर कानूनी चुनौतियों और सार्वजनिक विरोध का सामना करना पड़ रहा है।सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा 8 की पाठ्यपुस्तक के एक हिस्से पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसमें “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” पर एक अध्याय था। कोर्ट ने माफी को ठुकराते हुए एनसीईआरटी निदेशक और शिक्षा सचिव को अवमानना नोटिस जारी किया है।

 

*UGC इक्विटी रेगुलेशन 2026:* सबसे बड़ा विवाद 13 जनवरी, 2026 को राजपत्रित “यूजीसी (उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी का प्रचार) विनियम, 2026” को लेकर है। एससी/एसटी/ओबीसी छात्रों के खिलाफ भेदभाव रोकने के लिए “इक्विटी समितियों” और “इक्विटी स्क्वॉड” के गठन के इन नियमों का सवर्ण छात्र संगठनों ने कड़ा विरोध किया है, इसे “भेदभावपूर्ण और कठोर” बताया है। सुप्रीम कोर्ट ने NCERT की कक्षा VIII की पाठ्यपुस्तक (“Exploring Society: India and Beyond”) के एक हिस्से पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसमें “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” पर एक अनुभाग था। कोर्ट ने माफी को ठुकराते हुए एनसीईआरटी निदेशक और शिक्षा सचिव को अवमानना नोटिस जारी किया है।सीजीआई सूर्यकांत ने सख्त रुख अपनाया है. उन्होंने सुनवाई के दौरान कहा कि हम बिना शर्त माफी स्वीकार नहीं करेंगे | जांच होगी बुक कैसी छपी ? कोर्ट ने किताब की कॉपी के प्रकाशन और डिजिटल रूप से साझा करने पर रोक लगा दी है | साथ ही कोर्ट ने फिजिकल कॉपी को जब्त करने का आदेश दिया | सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी रूप में कॉपी साझा करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी | मामले की अगली सुनवाई 11 मार्च को होगी |सोशल साइंस की बुक में भ्रष्ट ज्यूडिशियरी सिस्टम और पेंडिंग केस के बारे में बताया गया. आज की सुनवाई में सीजीआई ने कहा कि यह एक साजिश भी हो सकती है. हम बिना शर्त माफी अभी स्वीकार नहीं करेंगे. वरना भविष्य में कोई भी ऐसा करेगा. हम इस संस्थान की गरिमा को नुक़सान नहीं पहुंचने दे सकते | मुख्य न्यायाधीश ये बड़ा कैलकुलेटेड मूव है, जिसमें भारतीय न्यायपालिका को भ्रष्ट बताया गया | पूरा शिक्षक समाज इसे ट्रोल कर रहा है. जस्टिस बागची ने कहा कि डिजिटल युग में एक किताब की हज़ारों प्रतियां बन गई होंगी | यह कैसे किया गया, यह जानना जरूरी है.

शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने किताब के वितरण पर अगला आदेश आने तक रोक लगाने के निर्देश दिए |किताब की बिक्री रोक दी है | शिक्षा मंत्री ने बयान जारी कर कहा कि वह न्यायपालिका का बहुत सम्मान करते हैं और उसे भारतीय संविधान का रक्षक और मौलिक अधिकारों का संरक्षक मानता है | लेकिन कोर्ट इस तरह की औपचारिकता को कैसे स्वीकारेगा ?

अब पूरे मामले की जांच के आदेश का तर्क दिया जा रहा है | लेकिन सारी गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार लोगों का विवरण मंत्रालय में दर्ज है | कोर्ट या प्रधान मंत्री को तत्काल क्यों नहीं बताया जा सकता है ? अन्य पुस्तकों की तरह कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान पुस्तकें किसी एक लेखक की नहीं, बल्कि निदेशक , सलाहकार समिति ,विषय विशेषज्ञ , संपादक ,अकादमिक परिषद की संयुक्त प्रक्रिया से बनती हैं। जानकार सूत्रों के अनुसार पूर्व संस्करणों में अध्यक्ष प्रो. हरी वासुदेवन (इतिहासकार) , मुख्य सलाहकार (विभिन्न संस्करणों में) प्रो. नीलाद्रि भट्टाचार्य (इतिहास) , प्रो. एम. एच. कुरैशी (भूगोल/क्षेत्रीय विकास अध्ययन) ,प्रो. सरदा बालगोपालन (सामाजिक विज्ञान शिक्षा) | टेक्स्टबुक डेवलपमेंट कमेटी सदस्य (पूर्व संस्करणों के क्रेडिट पृष्ठों में उल्लिखित प्रमुख नाम हैं -अनिल सेठी ,अंजलि खुल्लर , अर्चना प्रसाद, जानकी नायर ,प्रभु मोहापात्रा , रामचंद्र गुहा ,संजय शर्मा , तनिका सरकार , तपति गुहा ठाकुरता , स्मिता सहाय भट्टाचार्य , सरोज शर्मा , इंदु शर्मा , के. जया और अपराजिता डे | ये नाम विभिन्न संस्करणों के क्रेडिट पृष्ठों में आए हैं; अध्याय-वार लेखक अलग से निर्दिष्ट नहीं होते। अब यह स्पष्ट नहीं है कि इनमें परिवर्तन हुए या किसी सदस्य ने भाग नहीं लिया | कुछ नामों से उनके वामपंथी क्रांतिकारी विचारों को सब जानते हैं | दिलचस्प बात यह है कि वर्तमान सरकार और नई शिक्षा नीतियों पर भगवाकरण के आरोप लगते रहे हैं , जबकि पाठ्यक्रम भिन्न विचारों वाले लोग लिख रहे हैं |

असल में समस्या यह है कि शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान या कुछ मंत्री अपनी राजनीतिक गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं | उन्हें मंत्रालयों पर अधिक समय देने की जिम्मेदारी महसूस नहीं होती | फिर किताबों , शिक्षकों , पुस्तकों , पुस्तकालयों की चिंता के बजाय केवल समारोहों , सभाओं , डिजिटल प्रचार पर उनका ध्यान रहता है | इसलिए पचासों संस्थानों पर कोई नहीं है | मंत्री अध्यक्ष बैठे हुए हैं | एसा लगता है कि उन्हें केवल प्रधान मंत्री के नाम से सब लाभ पाना है | बहरहाल उम्मेद करनी चाहिए कि इस बार कोर्ट और प्रधान मंत्री के आक्रोश का असर न केवल शिक्षा बल्कि अन्य मंत्रालयों पर भी पड़ेगा | विवाद ने दिखा दिया है कि समीक्षा तंत्र को और मजबूत करने की आवश्यकता है | संवेदनशील विषयों पर अतिरिक्त सावधानी जरूरी है | शिक्षा और लोकतंत्र के बीच संतुलन बनाए रखना संस्थागत जिम्मेदारी है |