Bjp Become Big Boss: जनसंघ-श्यामप्रसाद से भाजपा-मोदी तक

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Bjp Become Big Boss: जनसंघ-श्यामप्रसाद से भाजपा-मोदी तक

रमण रावल

आखिरकार ऐसी क्या बात है कि प्रदेश-दर-प्रदेश देश के बड़े भू-भाग पर भगवा ध्वज लहराने लगा है ? यह कोई रातोरात हुआ चमत्कार नहीं , न ही किसी तात्कालिक घटना की तीव्र प्रतिक्रिया कि जनता सड़क पर उतरी और अहिंसक क्रांति कर दी। यह चरणबद्ध तरीके से हुआ । पहले यह केंद्र में सत्ता हस्तांतरण से प्रारंभ हुआ,फिर देश के अलग-अलग हिस्सों में फैला । ठीक उस तरह से जैसे नहर में जब पानी छोड़ा जाता है या किसी नदी में बाढ़ आती है तो आप देख सकते हैं कि सैलाब लहराता हुआ चला आ रहा है, जो धीरे-धीरे तटबंध तोड़कर फैलता जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी का जन्म,शैशवकाल,युवावस्था बेहद प्राकृतिक तरीके से आई। यही उसकी सुगठित सफलता का कारण है। बंगाल विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक विजय पाकर उसने संदेश दिया है कि राजनीति में स्थायी सफलता के लिये स्वाभाविक प्रवाह से रास्ता तय करना हमेशा सुदृढ़ और प्रभावी होता है। भाजपा की इस राजनीतिक यात्रा को दुनिया में अनूठा स्थान प्राप्त है और आने वाले समय में देश-दुनिया के प्रबंधन संस्थानों में इस पर गहन शोध हो सकते हैं।

Bjp In Bengal

     भाजपा की तुलना किसी भी दल से नहीं की जा सकती । इसीलिये आलोचक,विश्लेषक भी हमेशा यही कहते हैं । आइये,इन्हीं पहलुओं पर गौर करते हैं। देखिये, कांग्रेस का गठन अंग्रेजों ने अपने स्वार्थ से किया था कि गुलाम भारत के ऐसे वर्ग को मंच दिया जाये, जो राजनीतिक दृष्टि रखते हैं और चर्चा के माध्यम से गोरी हुकूमत का विरोध करते हैं या स्वतंत्रता की बात करते हैं। ये लोग यदि कांग्रेस के छाते के नीचे एकत्र होंगे तो इन्हें नियंत्रित करना आसान होगा। हुआ भी यही ।इस रणनीतिक चालाकी का लाभ अंग्रेजों को तो मिला ही, जो भारतीय राजनीतिक सोच रखते थे,उन्हें भी कालांतर में देश पर लंबे समय तक शासन करने का स्वाभाविक लाभ मिल गया । इसलिये हमने देखा कि भारतीय राजनेताओं ने भी अंग्रेजी सोच के साथ शासन किया, जिसमें प्रमुख तत्व था, बांटो और राज करो। इसका अंत 2014 में हुआ, जब भारतीय जनता पार्टी के बैनर तले देश की जनता ने कांग्रेस के राजनीतिक महल के दरवाजे बंद कर दिये। अब कांग्रेस कहीं किसी अधखुले झरोखे से अंदर-बाहर होती रहती है। बहरहाल।

     अब देखिये कि कैसे भाजपा इस राजमहल में दाखिल हुई और कैसे सिंहासन हासिल किया ? भारतीय जनसंघ का गठन 21 अक्टूबर 1951 को हुआ और श्यामाप्रसाद मुखर्जी इसके संस्थापक अध्यक्ष बने। संयोग देखिये कि उनके गृह रा्ज्य बंगाल में सत्ता पाने में इसे 75 वर्ष लग गये। इसका विलय जनता पार्टी में 1977 में हो गया और जब मतभेदों के चलते विभाजन हुआ तो जनसंघ के समूह ने 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी का गठन कर लिया। इस तरह भाजपा को केंद्र की अपने बूते सत्ता पाने में 34 वर्ष(2014) और बंगाल में भगवा लहराने में 46 वर्ष लगे। भाजपा सारे दलों से और देश के पहले राजनीतिक दल कांग्रेस से क्यों और कैसे अलग है ?

BJP and RSS

अब यह कोई छुपी बात नहीं कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने हिंदुओं को संगठित करने व देशवासियों में राष्ट्र प्रेम जगाने जैसे अपने दूरगामी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये राजनीतिक दल की आवश्यकता महसूस करते हुए जनसंघ की स्थापना कराई और दीपक चुनाव चिन्ह रखा, जो अब कमल का फूल बन चुका है। भाजपा की सबसे पृथक पहचान होने का प्रमुख पहलू है,इसका संगठनात्मक ढांचा, जो कार्यकर्ता आधारित है। यह कारण है कि इसका एक भी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री ऐसा नहीं है, जिसका बेटा-बेटी, भाई,बहन कभी उत्तराधिकारी बना हो। इसके उलट ज्यादातर के परिजन कब हाशिये पर स्वमेव चले गये, पता भी न चला। शेष बातें सर्वविदित इतिहास है कि कैसे जनसंघ या भाजपा के समर्पित नेता-कार्यकर्ताओं ने जीवन तक का बलिदान देकर इसे सींचा।

केंद्र में 2014 के सत्ता परिवर्तन को देश के नये युग के तौर पर जाना जायेगा। यह इसके नेतृत्व की निष्ठा,सोच,कर्मठता और सतत परिश्रम का नतीजा है,जो इतिहास में स्वर्णाक्षर मंडित रहेगी। भाजपा और संघ का नेतृत्व चाहता तो आत्मुग्घ होकर सत्ता के गलियारों में भ्रमण कर सकता था, लेकिन चरैवति-चरैवति के ध्येय वाक्य को चरितार्थ करते हुए उन्होंने इसे पहली कक्षा में प्रवेश माना और सीढ़ी-दर-सीढ़ी ऊपर चढ़ते गये। पहले ध्यान केंद्रित किया उन राज्यों पर जहां संघ की शाखायें और भाजपा का कार्य विस्तार हो चुका था। उन राज्यों में जन कल्याण के मुद्दों पर काम करते हुए फतह हासिल की,उन्हें मजबूत दुर्ग बनाया,फिर दूसरे राज्यों की ओर कूच किया। इसलिये तात्कालिक उत्तेजना,हड़बड़ी और गफलत का अंदेशा नहीं रहा। फिर सुदूर पूर्वोत्तर,पश्चिमी राज्यों की राजनीतिक वीणा के तारों को सुरबद्ध किया। उसके बाद दक्षिण भारत के दुरूह-दुर्गम राज्यों की ओर प्रस्थान किया।

pm modi bjp parliamentary borad meeting

इस अभियान में भाजपा नेतृत्व ने कोई भ्रम नहीं पाला और दो-पांच साल में यहां सरकारें बनाने पर जोर नहीं दिया, बल्कि जनता के बीच पैठ बनाने पर ध्यान लगाया।

केरल,तमिलनाडु,तेलंगाना,कर्नाटक,आंध्र,बंगाल आदि में सुदूर गांवों और अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने की अपनी चिर-परिचित पद्धति को जारी रखा। बंगाल के नतीजे इसका प्रमाण है। कर्नाटक में उसके पास सत्ता आती-जाती रहती है। आंध्र में टीडीपी के सहयोग से वह सत्ता में रहती है। तमिलनाडु,तेलंगाना में अगले दस साल में कमल खिल सकता है,भले ही स्थानीय दलों के सहयोग से । सिर्फ केरल ऐसा राज्य है, जहां भाजपा अपनी उपस्थिति कितनी ही मजबूत दर्ज करा ले, लेकिन सत्ता में आना असंभव-सा ही है। उसका प्रमुख कारण है,वहां ईसाई व मुस्लिम बहुलता होना। चूंकि ये दोनों ही समुदाय कट्‌टर धार्मिकता से ओत-प्रोत हैं,इसलिये वे भाजपा के पक्ष में नहीं जा सकते। इसके बाद भी यह मानना भूल होगी कि वहां भाजपा खेत जोतना बंद कर देगी। जिसने बंजर भूमि को हरियाला बना दिया, वह एक छोटे-से भूखंड की कठोर,बंजर भूमि से मुंह फेर ले, यह नहीं हो सकता।

जनसंघ और भाजपा की चमत्कारिक उपलब्धियां इस मायने में और भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं,जब हम देखते हैं कि देश-दुनिया के वामपंथी,पेट्रो डॉलर,ईसाई मिशनरीज,यूरोप व अमेरिका की राजनीतिक सत्तायें हमेशा विरोध में खड़ी रही। साथ ही भारत के मुसलमानों के दिल-दिमाग़ में भी संघ,जनसंघ,भाजपा को लेकर ज़हर भरते रहे।

इन संदर्भों में 2027,2028 में होने विधानसभा चुनाव व 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव बेहद प्रभावी रहेंगे। 2029 के बाद के 20 वर्ष देश के रॉकेट युग की ओर उड़ान भरने का दौर होगा। भाजपा के 2047 में विकसित भारत बनाने के वादे-इरादे पर अवश्य गौर कर लें। इसलिये 2029 के बाद से देश के राजनीतिक नेतृत्व की दक्षता व कार्य दक्षता पर सारा दोरामदार रहेगा। इसके साथ ही सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस नये भारत के निर्माण और भारत के दौर के प्रमुख शिल्पी के तौर पर भाजपा और संघ तो नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व को याद रखेंगे ही। यदि जनसंघ के प्रादुर्भाव व प्रभाव के लिये श्यामाप्रसाद मुखर्जी-दीनदयाल उपाध्याय के साथ ही अटलबिहारी वाजपेजी-लालकृष्ण आडवाणी का योगदान अविस्मरणीय है तो भाजपा के उत्थान और सर्वव्यापी हो जाने के लिये नरेंद्र मोदी-अमित शाह की भूमिका शिखर पर विराजित रहेगी। इस पूरे प्रहसन में हमें सर संघ चालक मोहन भागवत को कृष्ण के तौर पर देखना चाहिये।