मध्य प्रदेश विधानसभा में भ्रामक जवाबों से सरकार की साख पर प्रश्नचिह्न,मंत्री और विभागीय जवाबदेही पर सवाल- पारदर्शिता पर आंच

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मध्य प्रदेश विधानसभा में भ्रामक जवाबों से सरकार की साख पर प्रश्नचिह्न,मंत्री और विभागीय जवाबदेही पर सवाल- पारदर्शिता पर आंच

वरिष्ठ पत्रकार के. के. झा की विशेष रिपोर्ट 

इंदौर। विधानसभा में दिया गया हर उत्तर लोकतांत्रिक जवाबदेही का प्रमाण होता है। यदि मंत्री सदन में गलत, अपुष्ट या भ्रामक जानकारी देते हैं, तो इसका सीधा असर सरकार की पारदर्शिता और प्रतिष्ठा पर पड़ता है।

इंदौर में विधायक महेंद्र हार्डिया ने महालक्ष्मी नगर, तुलसी नगर, साईं कृपा, राधिका पैलेस, वीणा नगर, मानसरोवर और योजना 94 सहित अन्य क्षेत्रों में हो रहे अवैध निर्माणों को लेकर विधानसभा में सवाल उठाया था। लेकिन उनके प्रश्नों के जो उत्तर विधानसभा में नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय द्वारा जो जवाब प्रस्तुत किए वो तथ्यात्मक रूप से गलत पाया गया गए।

भ्रामक जवाब उजागर होने के बाद इंदौर निगम आयुक्त ने अधीक्षक और एक क्लर्क पर कार्रवाई की, जबकि शासन ने निगम के डिप्टी कमिश्नर शैलेश अवस्थी को निलंबित कर दिया। विधायक हार्डिया ने स्पष्ट कहा है कि यदि अवैध निर्माणों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो वे धरना देने से भी पीछे नहीं हटेंगे। क्षेत्र की पार्षद संगीता महेश जोशी भी लगातार इस मुद्दे पर शिकायत दर्ज कराती रही हैं।

 

*पहले भी उठते रहे हैं सवाल*

यह कोई पहला मामला नहीं है जब विधानसभा में जवाबों की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठे हों।

दिसंबर 2025 में कांग्रेस विधायकों ने आरोप लगाया कि उनके लिखित सवालों की मूल भाषा और भावना बदली जा रही है, जिससे जवाब अप्रासंगिक हो जाते हैं और सदन में तीखा विवाद हुआ।

पिछले सत्रों में विपक्ष ने दावा किया कि 2500 से अधिक सवालों के जवाब केवल सामान्य “आश्वासन” बनकर रह गए, जिन्हें उन्होंने “आश्वासन की सरकार” करार दिया।

विधानसभा सचिवालय की रिपोर्ट में जल संसाधन विभाग के 113 से अधिक सवालों के उत्तर वर्षों तक लंबित रहने की बात सामने आई।

मार्च 2022 में असंतोषजनक जवाबों के विरोध में कांग्रेस विधायकों ने सदन से बहिर्गमन तक किया था।

ये घटनाएं बताती हैं कि जवाबदेही और तथ्यात्मक तैयारी का मुद्दा समय-समय पर विवाद का कारण बनता रहा है।

 

*लोकतंत्र की कसौटी*

सदन में दिया गया हर उत्तर संबंधित मंत्री की संवैधानिक जिम्मेदारी होता है, चाहे वह विभागीय अधिकारियों से प्राप्त जानकारी पर आधारित क्यों न हो। यदि तथ्य सत्यापित न हों, तो विपक्ष को सरकार पर “सदन को गुमराह करने” का आरोप लगाने का अवसर मिलता है और जनता के बीच सरकार की साख प्रभावित होती है।

अवैध निर्माण प्रकरण केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि यह संकेत है कि विधानसभा में तथ्यात्मक सतर्कता और पारदर्शिता को और सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि सदन में प्रस्तुत हर उत्तर पूर्ण, प्रमाणित और सत्य हो।