आज आदर्श की पर्याय पन्नाधाय के प्रति प्रेम और सम्मान प्रकट करते हैं…

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आज आदर्श की पर्याय पन्नाधाय के प्रति प्रेम और सम्मान प्रकट करते हैं…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस

स्त्रियों का सम्मान देने के लिए अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर नियत एक दिन है। इसे प्रतिवर्ष, 8 मार्च को विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के प्रति सम्मान, प्रशंसा और प्रेम प्रकट करते हुए, महिलाओं के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धियों एवं कठिनाइयों की सापेक्षता के उपलक्ष्य में उत्सव के तौर पर मनाया जाता है। यह संयोग ही है कि 8 मार्च को भारत में आदर्श की पर्याय पन्नाधाय की जयंती भी है। और आज के दिन इससे बेहतर और कुछ भी नहीं हो सकता कि हम पन्नाधाय को याद करते हुए उनके प्रति प्रेम और सम्मान प्रकट करें। और हम तो इस बात के भी पक्षधर हैं कि भारत में महिला दिवस को पन्नाधाय के नाम पर उत्सव के तौर पर मनाया जाए। बलिदान की ऐसी बानगी न पहले कभी किसी ने देखी और मुश्किल है कि बाद में भी कभी देखी जा सके।

8 मार्च 2026 को पन्नाधाय की 515वीं जयंती है। पन्नाधाय ने मेवाड़ के कुंवर राणा उदय सिंह को बचाने के लिए अपने पुत्र चंदन का सहर्ष बलिदान दिया। इसी बलिदान के कारण राणा उदय सिंह के पुत्र महाराणा प्रताप सिंह को इतिहास में हल्दी घाटी के शेर के रूप में जाना जाता है। अगर राणा उदय सिंह न बचते तो मुगल साम्राज्य को आईना दिखाने वाले महाराणा प्रताप का नाम भी इस दुनिया में नहीं होता। और राजपूताना का इतिहास भी

गौरव के महानतम क्षण को छूने से वंचित रह जाता। पन्नाधाय को सर्वोत्कृष्ट बलिदान के लिए जाना जाता है जिन्होंने अपने एकमात्र पुत्र का बलिदान देकर मेवाड़ राज्य के कुलदीपक उदयसिंह की रक्षा की थी।

पन्ना धाय, राणा सांगा के पुत्र राणा उदयसिंह की धाय माँ थी। वह एक खींची चौहान राजपूत थी, इसी कारण उसे पन्ना खींचन के नाम से भी जाना गया है। राणा साँगा के पुत्र उदयसिंह को माँ के स्थान पर दूध पिलाने के कारण पन्ना ‘धाय माँ’ कहलाई थी। रानी कर्णावती ने बहादुरशाह द्वारा चित्तौड़ पर हमले में हुए जौहर में अपना बलिदान दे दिया था और उदयसिंह के लालन पालन का भार पन्ना को सौंप दिया था।

दासी पुत्र बनवीर चित्तौड़ का शासक बनना चाहता था। बनवीर एक रात महाराणा विक्रमादित्य की हत्या करके उदयसिंह को मारने के लिए उसके महल की ओर चल पड़ा। एक बारी (पत्तल आदि बनाने वाले) ने पन्ना खींची को इसकी सूचना दी। पन्ना राजवंश और अपने कर्तव्यों के प्रति सजग थी व उस पर उदयसिंह की रक्षा का भार था। उसने उदयसिंह को एक बांस की टोकरी में सुलाकर उसे पत्तलों से ढककर एक बारी जाति की महिला के साथ चित्तौड़ से बाहर भेज दिया। बनवीर को धोखा देने के उद्देश्य से अपने पुत्र को जो कि उदयसिंह की ही आयु का था, उदयसिंह के पलंग पर सुला दिया। बनवीर रक्तरंजित तलवार लिए उदयसिंह के कक्ष में आया और उसके बारे में पूछा। पन्ना ने उदयसिंह के पलंग की ओर संकेत किया जिस पर उसका पुत्र सोया था। बनवीर ने पन्ना के पुत्र को उदयसिंह समझकर मार डाला।पन्ना अपनी आँखों के सामने अपने पुत्र के वध को अविचलित रूप से देखती रही। बनवीर को पता न लगे इसलिए वह आंसू भी नहीं बहा पाई। बनवीर के जाने के बाद अपने मृत पुत्र की लाश को चूमकर राजकुमार उदयसिंह को सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए निकल पड़ी।

पन्ना और उसके विश्वासपात्र सेवक उदयसिंह को लेकर मुश्किलों का सामना करते हुए कुम्भलगढ़ पहुँचे। कुम्भलगढ़ का किलेदार आशा देपुरा था, जो राणा सांगा के समय से ही इस किले का किलेदार था। आशा की माता ने आशा को प्रेरित किया और आशा ने उदयसिंह को अपने साथ रखा। उस समय उदयसिंह की आयु 15 वर्ष की थी। मेवाड़ी उमरावों ने उदयसिंह को 1536 में महाराणा घोषित कर दिया और उदयसिंह के नाम से पट्टे-परवाने निकलने आरंभ हो गए थे। उदयसिंह ने 1540 में चित्तौड़ पर अधिकार किया।

मेवाड़ के इतिहास में जिस गौरव के साथ प्रात: स्मरणीय महाराणा प्रताप को याद किया जाता है, उसी गौरव के साथ पन्ना धाय का नाम भी लिया जाता है, जिसने कर्त्तव्य को सर्वोपरि मानते हुए अपने पुत्र चन्दन का बलिदान दे दिया था। इतिहास में पन्ना धाय का नाम कर्त्तव्यपरायणता के लिये प्रसिद्ध है। विश्व इतिहास में पन्ना के त्याग जैसा दूसरा दृष्टांत उपलब्ध नहीं है।

अविस्मरणीय बलिदान, त्याग, साहस, स्वाभिमान एवं स्वामिभक्ति के लिए पन्नाधाय का नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। कई जाने माने लेखकों ने पन्ना पर आधारित कविताएँ और नाटक लिखे है। भारत रत्न गोविंद वल्लभ पंत द्वारा लिखित नाटक राजमुकुट में पन्ना के बलिदान का बहुत अच्छा चित्रण किया गया। डाक्टर राजकुमार वर्मा ने पन्ना पर आधारित एकांकी दीपदान लिखी है, जो कि कई पाठ्यक्रमों में सम्मिलित है। वीरांगना पन्ना नाम से 1934 में हर्षदराय सकेरलाल मेहता द्वारा एक मूक फिल्म बनाई गई। पन्ना दाई नाम से 1945 में फिल्म बनी। इस फिल्म के मुख्य पात्र दुर्गा खोटे, चंद्र मोहन, मीनाक्षी थे।

तो अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं के अधिकार और कर्तव्यों का सम्मान करते हुए हम त्यागी, बलिदानी और आदर्श की पर्याय पन्नाधाय को याद कर खुद को भी गौरव से भरा हुआ महसूस करते हैं। इस संसार में पन्ना धाय का नाम हमेशा सम्मान से लिया जाएगा। अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर हम सभी आदर्श की पर्याय पन्नाधाय के प्रति प्रेम और सम्मान प्रकट करते हैं…।

 

 

लेखक के बारे में –

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।

वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।