International Women’s Day : स्वयंसिद्धा

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स्वयंसिद्धा

वामांगी पुरुष की हूं
सुनो! सहगामिनी हूं मैं
हूं इक पाया गृहस्थी का
नहीं अनुगामिनी हूं मैं

सृष्टि हूं जगत् की मैं
मैं भगिनी और तनया हूं
फलक के चांद-तारों-सी
सजीली यामिनी हूं मैं

श्रद्धा हूं नहीं केवल
स्वयंसिद्धा प्रमाणित है
पुरुष की कल्पना कविता में
बस एक कामिनी हूं मैं

कभी नारायणी हूं तो
कभी मैं शिव की हूं शक्ति
मैं चंडी बनके हर लेती हूं
हर दुख शामिनी हूं मैं

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-वंदना दुबे,
धार (मध्य प्रदेश)