“राईं दामोदर गंगा असनान करो”; भगवान विष्णु ने इस माह को अपना स्वरूप प्रदान किया, इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास कहा गया

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“राईं दामोदर गंगा असनान करो”; भगवान विष्णु ने इस माह को अपना स्वरूप प्रदान किया, इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास कहा गया

    डॉ .सुमन चौरे 

हाथऽ फूल चोखा का दाणा खोळा मऽ जुवार माता की खोळ लेकर सब कथा सुनने बैठे। कथा सुरु-‘- अधिक मास को मैह्नो आयो — सास अपनी बहू से बोली — लाड़ी ववू कल से अधिक मास लग रहा है मैं गंगा स्नान को जाऊंगी , तू मेरे लिये ससानान दान पुन्न पूजा का सामान रख देना। णमैं रात के तीसरे पहर अपने गांव की लुगाइयों के साथ जाऊंगी। बहू ने कहा -सासुजी मखऽभी लई चलो तो भला”” सासु बोली तू स्नान को चलेगी तो घर का काम कौन करेगा? तेरी कोई उम्मर थोड़ी है, गंगा स्नान की?
बीच में सब नें हुंकारा दिया — हाव ओ मांय हाव ।सासु सच्ची तो कयऽ घर को काम कूणऽ करगा

बहू बिचारी श्याणी — हाव हो सासु जी तुम अधिक मास नहा॓ओ मैं तैयारी कर देती हूं। बहू प्रति दिन रात को एक टोकनी में पूजा का सामान और थैली में सासुजी के कपड़े रख देती। सासु भर अंधारा कंदिल लेकर घर से निकलती कि इधर बहू कुँआ से पानी खींचती और कहती – ” म्हारो मनऽ चंगो होयऽ तो गंगा माता म्हारी गंगाळ ( पानी का तांबे का बड़ा पात्र) मऽ आओ आओ — आओ। भोले मन से गंगा का आवाहन कर स्नान कर तुळसी में जल चढ़ाकर कहती “राईं दामोदर गंगा असनान करो”
हुंकारा देती महिलायें कोईं कहती -‘ हाव ओ मांय हावऽ ववू तो अजाणई , गंगाळ मऽ कईं गंगा कवजऽ काई ।” कोईं कहती हावऽ ओ मायऽ ववू तो भोळा मन की।
आसो करतऽ करतऽ अधिक मास को आखरी दिन आई गयो। ववू तो दरोज की भांति अपना स्नान पूजन कर घर का काम निपटाकर सासु जी के पैर छूकर भोजन की थाली परोसती। आज सासुजी अनमन्या था। बहू ने पूछा सासू जी अधिक मास का स्नान दान तो अच्छा हुआ , मेंरी सेवा में कुछ कमी रही जो फिकर में हो? सासु बोली-लाड़ी बाई म गंगा जी में ब ने डुबकी लगाते मेरी नथ नाक से निकल कर जल में बह गई। सबनें ढूंडा पर नहीं मिली।” बहू ने सास को धीरज बंधवाते कहा– सासुजी तुम अधिक मास स्नान के दो जोड़े जीमने को कह आओ। ” सास बोली – ” लाड़ी बाई एक तो मेरी नथ खो गई और तुम दो जोड़े जीमाने की बात कर रही हो ?” बहू ने कहा सासुजी एक जो ड़ो म्हारो भी हाऊं भी गंगा नहाई।” सासूजी को बहू ने बताया ” सास बहू की बात का आनादर कर बोली ” तू सच्ची में गंगा नहाई ? तेरी गंगा में सत है तौ मेंरी नथ ला दे”? ?
हुंकारा– हाव ओ मांय हाव सासु नऽ सच्ची तो कयो, ” तू गंगा नाहाई त॔ऽ म्हारी नथ मांगी लऽ गंगा
जी सी।”
बहू नें खुशी से कहा ” हावऽ सासुजी” । बहू ने कुआं से तीन बाल्टी जल खींचा । गंगाल को भर लिया। जल को प्रणाम कर कहा– गंगा माता आओ-आओ आओ । माता तुम्हारी नऽ म्हारी परीक्षा छे माता । मेरी सासुजी कह रही हैं
” धरम करतऽ करमऽ फूट्या ” गंगा माता अपजस मत लेवो। मैरै सासुजी की नथ निकाल दो अपने जल से”
महिलायें हुंकारा भर रही हैं , हाव ओ मांय हाव , , — असी गंगाळ मऽ नथ आवज ऽ काई , ?
देखते देखते गंगाल के जल में तेजी से उछाल आया और बहू की प्रार्थना पर उसके हाथ में नथ आ गई।
हुंकारा तेज हो गये , – हाव ओ मायऽ, हाव श्रद्धा भक्ति होय तो इनी सासु की ववू जसी।” और उधर बिना बुलावे के राई दामोदर जोड़ा जीमने आ गये। हाथ में धरे चांवल फूल सब तुलसी जी को चढ़ाते महिलाये कहती जा रहीं थी – जैसे गंगा माता , रांई – दामोदर ववू पर तुष्टमान हुये सब पर होय” । एखऽ जऽ कैजऽ “, मनऽ चंगा तो कठौती मऽ गंगा।”
चीड़ी -चीड़ी बाई वन ऽ मऽ जाजे काचा पाका वन फळ लावजे,
तुखऽ थाराफळ को पुन्न , हमखऽ हमारा वरतऽ को पुन्न।”