
इंदौर लेखिका संघ ने मनाया अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस : ‘साहित्य और समाज में अभिव्यक्ति के स्त्री स्वर ‘
इंदौर लेखिका संघ द्वारा इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर साहित्य और समाज में अभिव्यक्ति के स्त्री स्वर विषय पर कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में लेखिकाओं ने महिलाओं की उपलब्धियों, संघर्षों और समाज में उनके अमूल्य योगदान और जज्बे को अपनी रचनाएँ समर्पित करते हुए अपने विचार रखे . महिलाओं के अधिकारों, समानता, सम्मान और उनके सामाजिक, आर्थिक, और मनोवैज्ञानिक समस्याओं के साथ स्त्री के मन की बात पर केन्द्रित रचनाओं का पाठ किया .कार्यक्रम की अध्यक्षता इंदौर लेखिका संघ की संस्थापक अध्यक्ष डॉ.स्वाति तिवारी ने की.कार्यक्रम की मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध लेखिका नीलम सिंह सूर्यवंशी , एवं विशेष अतिथि के रूप में युवा कवियत्री रानू टुवानी थी. कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ लेखिका सुषमा व्यास राजनिधि ने किया,साथ ही उन्होंने इंदौर लेखिका संघ का परिचय देते हुए संस्था द्वारा महिला लेखन के लिए किये गए प्रयासों और सफल तीस वर्षों की यात्रा पर प्रकाश डाला .कार्यक्रम की शुरुआत लेखिका एवं जानी मानी भजन गायिका प्रभा तिवारी द्वारा प्रस्तुत माँ सरस्वती के वन्दना से हुई .


शिक्षिका सपना उपाध्याय ने विषय में प्रवेश करते हुए बताया कि यूँ तो हर दिवस महिलाओं का ही होता है फिर भी एक खास दिवस उन्हें समर्पित क्यों किया गया यह जानना जरुरी है .अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत साल 1908 में 15000 कामकाजी महिलाओं ने अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में एक विशाल जुलूस निकाल कर की थी. इन महिलाओं ने अपने काम करने के घंटों को कम करने, बेहतर तनख्वाह और वोट डालने जैसे अपने अधिकारों के लिए अपनी लड़ाई शुरू की थी. सबसे पहले अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी के आह्वान पर महिला दिवस को 28 फरवरी 1909 को मनाया गया था. बाद में 1910 में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन में कामकाजी महिलाओं की एक इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस के दौरान अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का सुझाव दिया. इसी के साथ उन्होंने अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी से हट कर महिला दिवस पर पति और बच्चों के द्वारा इस दिवस को मनाने के बाद शाम तक घर ,रसोई और व्यवस्थों के बिखरने का दृश्य प्रस्तुत करते हुए अपना व्यंग पाठ किया.

लेखिका रंजना शर्मा ने अपनी कविता ‘नारी है नारायणी’ का सस्वर पाठ किया. इस कविता में “वेद पुराण ब्रह्मा जी ने सृष्टि की खातिर स्त्री को उतारा….”के माध्यम से स्त्री की महत्ता रखी .चर्चित कवियत्री सुषमा शुक्ला ने ‘कन्या भ्रूण हत्या ‘ शीर्षक की कविता के माध्यम से समाज से सवाल किया कि इस जुल्म की नगरी में क्यों उतार दी गई क्यों जन्म से पहले ही मैं मार दी गई? प्रभा तिवारी ने अपनी कविता नारी बोध के माध्यम से पुरुषो को आव्हान करते हुए कहा नारी हूं पर सृष्टि का मूल हूं,पुरुष किस दम्भ में जी रहा है, हमको अगर नहीं पाओगे,क्या जग में आ पाओगे?
लेखिका शिक्षिका शीला बड़ोदिया ने “हां हम भी औरत हैं” कविता का पाठ किया . मधु सोनी की महाभारत पर केन्द्रित कविता”भीष्म पितामह प्रश्न कर रहे….राजघराने की स्त्रियों से तुम कहो कुलवधू” के माध्यम से महाभारत क्यूँ होती है घरों में जैसे प्रश्नों को उठाया .वरिष्ठ लेखिका विनीता सिंह चौहान की कविता ‘देह से देवी के बीच गुम होती मैं …’से यह बताया कि स्त्री इन सब के बीच अपना अस्तित्व और व्यक्तित्व ही खोने लगती है.
रानू टुवानी ने अपनी कविता ‘जीवन के दो पहिए’ के माध्यम से बताया कि उनकी पीढ़ी तक आते आते समाज में कई बदलाव हुए हैं. अबकी पीढ़ी के पति स्त्री के साथ सहयोग करते है फिर चाहे वह घरके काम ही क्यों ना हों ,वे परमेश्वर की छबि से बाहर आ गये हैं और मित्रवत सहयोग कर रहे हैं .उन्होंने दाम्पत्य की गाडी को खींचने में पति और पत्नी की मिली जुली कौशिशों पर केन्द्रित कविता ‘कुछ तुम चलो ,कुछ हम चलें ‘का पाठ किया . वरिष्ठ रचनाकार सूत्रधार सुषमा व्यास राजनिधि स्त्री जीवन का ताना बाना कविता का पाठ भी किया .
मुख्य अतिथि नीलम सिंह सूर्यवंशी ने एक प्रशासनिक अधिकारी की पत्नी के जीवन को लेकर कहा कि लोग सोचते है वहां सब सुख ,सुविधाएँ होती हैं, जीवन बहुत आसान होता होगा किन्तु बाहर से जो दिखता हैं अन्दर से वह भी कठिन और चूनौतीपूर्ण जीवन होता है ,प्रत्येक कार्य को करते हुए बहुत बार सामाजिक दृष्टि से सोचना होता है.

हमारे करने से समाज में उस कार्य का क्या सन्देश जायगा ?उन्होंने अपने अनुभव साझा किये और लेखिकाओं को संबोधित करते हुए कहा कि स्त्री को अपने दीपक स्वयं ही बनना होगा ,जब तक पहला कदम ख़ुद नहीं बढ़ाओगे तब तक कोई आपको सहयोग नहीं कर सकता।आगे बढ़नें के लिए हिम्मत ख़ुद ही करना पड़ती हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ स्वाति तिवारी ने कहा कि महिलाओं के लेखन को केवल साहित्य के रूप में ही नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज के रूप में भी देखते हैं,तब हम स्त्री स्वर में महिलाओं की अभिव्यक्ति, विशेष रूप से उनकी रचनात्मक रचनाओं के माध्यम से, उनके जीवन के अनकहे,दुखते ,अधियारें क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। और समझ पाते हैं उस मर्म को ,उस दर्द को और देख पाते हैं उसकी सहनशक्ति ,उसका धैर्य .
उन्होंने सभी की रचनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए उनमे छुपे सरोकारों पर प्रकाश डाला .इस अवसर पर उन्होंने अपने आगामी उपन्यास से उसकी भूमिका में लिखी कविता ‘ये भित्तियां बहुत बोलती हैं ‘ का पाठ किया .
कार्यक्रम में हेमलता शुक्ला ,मनीषा खेडेकर ,रूचिबागड़देव इत्यादि ने भी अपनी बात रखी .आभार सुषमा शुक्ला ने व्यक्त किया





