
Uncontrolled Corruption:’भयमुक्त’ प्रशासन के पीछे कारण क्या है?
रंजन श्रीवास्तव
भयमुक्त समाज एक अच्छी अवधारणा है. “भयमुक्त” प्रशासन भी समाज के लिए अच्छा है, यदि भयमुक्त होने का अर्थ इस संदर्भ में हो कि प्रशासनिक अधिकारी अपने कर्तव्यों का जिम्मेदारी पूर्वक निर्वहन बिना किसी डर और भय के करें. परंतु यदि प्रशासन में बैठे लोग गलत काम करते हुए भी सरकार से निडर हो जाएं, तो यह एक गंभीर स्थिति है.
तो क्या राज्य के प्रशासन का एक वर्ग, जिसमें पुलिस भी शामिल है, इस बात से बेखौफ हो गया है कि उनके ऊपर निगाह रखने वाला शासन भी है, मुख्यमंत्री हैं, संबंधित मंत्री हैं, मुख्य सचिव हैं, पुलिस महानिदेशक हैं और उनके नीचे भी एक पूरा प्रशासनिक अमला है जो गलत काम करने पर दंड दे सकता है.
यदि पिछले कुछ महीनों की घटनाओं पर गौर किया जाए, तो ऐसा लगता है कि बहुत से अधिकारियों में जवाबदेही की कोई भावना नहीं है और उन्हें अपने गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार या भ्रष्टाचार करने पर कोई चिंता ही नहीं है—न तो जनता की और न ही अपने वरिष्ठ अधिकारियों की. संवेदनशीलता का कई स्तरों पर अभाव दिखता है.
सीधी जिले में जनप्रतिनिधियों की कलेक्टर के खिलाफ लगातार शिकायतों के बाद, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को वहां औचक निरीक्षण करना पड़ा, जिसके बाद उन्होंने वहां के कलेक्टर को तत्काल प्रभाव से हटा दिया. मुख्यमंत्री को शिकायत मिली थी कि कलेक्टर अपने कार्यालय कभी-कभार ही जाते हैं और जनता के प्रति उनका रवैया उचित नहीं है. मुख्यमंत्री ने अपने औचक निरीक्षण के बाद पाया कि शिकायतें सही थीं. इसलिए उन्होंने कलेक्टर को न सिर्फ जिले से हटा दिया बल्कि इसकी सूचना उन्होंने स्वयं ट्वीट के माध्यम से दी.
दूसरा वाक्या गुना जिले का है. गुना का मामला सामने ही नहीं आ पाता यदि पीड़ित व्यापारी का परिचित एक आईपीएस अधिकारी नहीं होता. संबंधित पुलिस चौकी और थाने ने व्यापारी की कार से 1 करोड़ रुपये का कथित हवाला धन बरामद किया. उन्होंने 20 लाख रुपये अपने पास रखे और 80 लाख रुपये व्यापारी को देकर उसे छोड़ दिया.
पीड़ित व्यापारी ने यह बात अपने परिचित गुजरात के ही एक आईपीएस अधिकारी को बताई. उस आईपीएस अधिकारी ने गुना एसपी से बात की. इसके बाद 20 लाख रुपये व्यापारी को लौटा दिए गए. गुना एसपी महोदय ने न तो इसकी सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दी और न ही थाने और चौकी के पुलिसकर्मियों पर कोई कार्रवाई की.
पर एसपी से लेकर थाने और चौकी तक के पुलिस अधिकारी और कर्मचारी यह बात भूल गए कि पीड़ित व्यापारी का पता कोई सामान्य नहीं था. वह गुजरात का था. यह पुलिस को भी पता है कि डबल इंजन सरकार के पहले इंजन की सरकार दिल्ली में है और इस सरकार के मुखिया और उनके लेफ्टिनेंट दोनों गुजरात से ही आते हैं.
वैसे भी भ्रष्टाचार के मामले में मध्य प्रदेश कई राज्यों को पीछे छोड़कर भ्रष्टाचार के नए रिकॉर्ड स्थापित कर रहा है.
मामले की भनक लगते ही मध्य प्रदेश में शासन और प्रशासन के ऊपरी स्तर पर जबरदस्त हलचल हुई. मुख्यमंत्री ने यहां नाराजगी जताई. एसपी को हटाने के आदेश दिए गए. 20 लाख रुपये वसूलने वाले चार पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया है. प्रदेश के गृह मंत्री स्वयं मुख्यमंत्री ही हैं, पर लगता है पुलिस वालों को इस बात की भी चिंता नहीं थी.
वैसे मध्य प्रदेश में प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के ये सिर्फ दो मामले नहीं हैं. इस वर्ष विधानसभा के बजट सत्र में सरकार द्वारा एक प्रश्न के दिए गए उत्तर के अनुसार, वर्ष 2022-23 से इस प्रश्न के पूछे जाने तक लोकायुक्त को विभिन्न विभागों के कर्मचारियों और अधिकारियों के विरुद्ध 1884 शिकायतें मिलीं. इसके बाद 1063 मामलों में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई. 1592 मामलों में जांच की गई. 393 मामलों में जांच पूरी हुई. 134 मामलों में अब तक अभियोजन स्वीकृति नहीं मिली थी और सिर्फ 7 मामलों में आरोपियों को न्यायालय द्वारा सजा दी गई है, जबकि बहुत से मामलों में अभी भी अदालती फैसले का इंतजार है.
भारत भ्रष्टाचार अनुसंधान रिपोर्ट 2024 के अनुसार, हमारे देश में कोई भी सरकार भ्रष्टाचार को रोकने के लिए प्रतिबद्ध नहीं दिखती क्योंकि भ्रष्टाचार ‘भारतीय नौकरशाहों और राजनेताओं की जीवनरेखा बन चुका है’.
इस रिपोर्ट के अनुसार, “सभी प्रमुख वैश्विक भ्रष्टाचार विरोधी संगठन यह मानते हैं कि भारत में भ्रष्टाचार खतरनाक गति से बढ़ रहा है, जबकि सरकार के पास देश में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कोई योजना और प्रक्रिया नहीं है.”
सन 2000 में मध्य प्रदेश के ही आबकारी विभाग के 3 अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन चलाने का आदेश देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि, “एक सभ्य समाज में भ्रष्टाचार कैंसर जैसी बीमारी है. अगर समय पर इसका पता न चले, तो यह निश्चित रूप से राजनीतिक व्यवस्था को घातक बना देता है, जिसके ‘विनाशकारी परिणाम’ होते हैं.”
सर्वोच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार की तुलना एक “महामारी” से की जो न सिर्फ संक्रामक है, बल्कि अगर इसे समय पर नियंत्रित न किया जाए तो यह जंगल की आग की तरह फैल जाती है. सर्वोच्च न्यायालय ने यहां तक कहा कि भ्रष्टाचार का वायरस “एचआईवी” जैसा है, जिससे एड्स होता है, और जो लाइलाज है.





