….तो हम डांस भी कर लेंगे !

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….तो हम डांस भी कर लेंगे !

अन्ना दुराई

राजनीति अब बहुत बदल चुकी है। एक समय रहा जब आम जनता अपने नेता के प्रति निःस्वार्थ भाव से जुड़ी रहती। मन में नेताओं के प्रति इज्जत का भाव होता। वह उनका पूरा मान सम्मान करती। जेब के पैसे से हार फूल खरीदकर अपने प्रिय नेता का स्वागत करती लेकिन अब वक्त बदल गया है। स्वागत कराने के लिए मालाएं भी आगे भेजना पड़ती है। नेता काम की बजाय नाम से अपनी छवि चमकाने के लिए लाखों करोड़ों रुपए खर्च करते हैं। सिर्फ स्वार्थ ही स्वार्थ दिखता है। मतलब की दुनिया है। जो जुड़े हैं, उनके अपने स्वार्थ नजर आते हैं।

 

चुनाव से पहले चरण पकड़ने वाले नेता चुनाव होते ही आम जनता के सिर पर सवार हो जाते हैं। जनसेवा के नाम पर चुने गए नेता स्वसेवा में लग जाते हैं। जनता के टाइम पास में इन्हें महारत हासिल सी हो गई है। कभी इसने इसको कुछ कह दिया तो विवाद। कभी उसने उसको कुछ कह दिया तो हंगामा। कभी यह कह दिया तो बखेड़ा, कभी ये नहीं कहा तो छिंटाकशी। ये आम जनता को व्यस्त रखने में इतने माहिर हो गए हैं कि जनहित के असल मुद्दे तो चर्चा तक में नहीं आ पाते। पक्ष हो या विपक्ष, होना यह चाहिए कि जनता से जुड़े मुद्दे ज्यादा से ज्यादा उठें और वे समाधान तक भी पहुंचे।

 

वाकई आज की राजनीति यदि ऐसी है। इस निचले हद तक जा पहुंची है जहां आम आदमी को कदम कदम पर बरगलाने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाए जाते हों, षड़यंत्र रचे जाते हों तो समय आ गया है, नेताओं और नेताओं की नेतागीरी दूर करने के लिए अब जनता को ही कमर कसना होगी।

 

एक आम आदमी के रूप में देखें तो समझ नहीं पाते, क्या चल रहा है यह सब। ये युद्ध क्यों लड़े जाते हैं। ये नेता क्यों आपस में लड़ते रहते हैं। जब उनके हर कदम के पीछे धन की लालसा दिखाई देती है तो यह जानकर भी हम कुछ करने की स्थिति में क्यों नहीं रहते। सबको पता है, भय और आतंक के नाम पर अपना माल बेचा जाता है। बतौर उदाहरण देखें, अमेरिका और ईरान की शांति वार्ता पाकिस्तान में विफल हो जाती है तो भारत की जनता को इसमें खुशी सी दिखाई जाती है। वे यह नहीं सोच पाती कि यदि युद्ध वापस छिड़ गया तो इसके कितने घातक परिणाम उसे भुगतने पड़ेंगे।

 

कहने से तात्पर्य यह है कि आज जो भी हो रहा है, या हम जो भी होता देख रहे हैं, उसमें आम जनता का कुछ भला नहीं होने वाला। भला किसका होना है ये आप और हम समझते हैं और समझना भी चाहिए। एक आम नागरिक की बहुत छोटी छोटी समस्याओं पर यदि ध्यान देना शुरू हो जाए तो वह इसके लिए गीत गाने तो क्या डांस भी कर लेगा। जो आम जनजीवन से जुड़ी बड़ी बातें हैं, उन्हें छोटा बताकर नजरअंदाज करने की कलाकारी वाली नेतागीरी को आईना दिखाना होगा। इसी में राष्ट्र हित, प्रदेश हित और शहर हित भी कहीं अधिक बढ़कर परिलक्षित होगा।