
कविता : आज अभी इस पल….
डॉ. पूनम प्रजापति
आज अभी इस पल….
दृढ़ निश्चय मन में होना चाहिए,
नहीं है कोई भी आत्म-संकल्प से बड़ा,
अन्य से नहीं स्वयं से अनुशासित होना चाहिए।
आज अभी इस पल ….
ठोकर खाकर गिरना अपेक्षित है,
लेकिन गिरकर फिर संभालना जिंदगी का दस्तूर है,
निराशा आशंका से उठकर कर्मनिष्ठ होना चाहिए।
आज अभी इस पल….

फूल सिखाते कब खिलकर मुस्कुराना है,
धूप-छांव बारिश में, तपकर-जलकर-भीगकर,
फिर बदलती ऋतुओं की भांति उद्भाषित होना चाहिए।
आज अभी इस पल….
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राह के अवरोधों को पार करना चाहिए,
अगर ज़िंदा है तो अपनी जीत पक्की कर,
ज़िद से ज्यादा खुद पर हौंसला बुलंद होना चाहिए।
आज अभी इस पल….
विश्व में प्रशंसनीय होना चाहिए,
झूठ की बुनियाद बड़ी कमज़ोर, करती सब तबाह,
सफलता के प्रवाह में सच्चाई का मार्ग होना चाहिए।
आज अभी इस पल….
विनीत अनुरोध था कि हताशा से दूर रहें,
प्रथम हाथ बढ़ा स्व की सहायता करनी चाहिए,
इच्छाओं के भेष में दुःख निष्कासित होना चाहिए।
आज अभी इस पल….
संपूर्ण जीवन व्यतीत हो जाता है,
आपसी कड़वाहट, अहंकार, रिश्तों की तान में,
बस इतनी-सी ही बात है, परस्पर फिक्र होनी चाहिए।
आज अभी इस पल….
तय ही है जब जीवन की सीमा रेखा,
थोड़ा इधर, थोड़ा उधर, सारी जिंदगी तो यही रहना नहीं,
संग अच्छे कार्यों का काफिला भी अनिवार्य होना चाहिए।
आज अभी इस पल…
डॉ. पूनम प्रजापति-अहमदाबाद में प्राध्यापक हैं .





