इंदौर लेखिका संघ ने दिवंगत शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र को कुछ इस तरह दी भावपूर्ण श्रद्धांजलि

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इंदौर लेखिका संघ ने दिवंगत शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र को कुछ इस तरह दी भावपूर्ण श्रद्धांजलि

इंदौर :देश के जाने-माने शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। 91 वर्ष की आयु में उन्होंने भोपाल के ईदगाह हिल्स स्थित अपने निवास पर गुरुवार दोपहर करीब 12 बजे अंतिम सांस ली। देश के सुप्रसिद्ध शायर  के साहित्यिक योगदान को याद करते हुए इंदौर लेखिका संघ ने उनके  शेर की पंक्ति “कुछ तो मजबूरियां रही होंगी” को आज अपनी लेखन कार्यशाला का विषय बनाते हुए इस पंक्ति को केंद्र में रख कर रचनाकर्म किया .

कोई कांटा चुभा नहीं होता, दिल अगर फूल सा नहीं होता.
कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई बेवफ़ा नहीं होता.
इस अवसर पर उनके कई शेर भी लोगों ने बार बार दोहराए .लेखिका संघ की संस्थापक डॉ. स्वाति तिवारी ने संस्था की और से भावपूर्ण श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि बद्र साहब की सादगी, विचारों और शेरो शायरी को भुलाना आसान नहीं होगा .डॉ. बशीर बद्र जैसी हस्ती का जाना भारतीय साहित्य के आसमान में एक सितारे के खो जाने जैसा है।उत्तर प्रदेश के अयोध्या में जन्मे, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़े और मेरठ में लंबे समय तक नौकरी करने वाले बशीर साहब बाद में मध्य प्रदेश के भोपाल में बस गए और यही के होकर रह गए।
डॉ.निशी मंजवानी  ने अपने विचार रखते हुए बताया  बशीर साहब वास्तव में एक राष्ट्रवादी शायर थे.एक आयोजन में उन्होंने कहा था, “उर्दू तो संस्कृत की ही देन है, सबसे पुरानी भाषा संस्कृत ही है।” सिर्फ शेरो शायरी ही नहीं वेदों से लेकर गीता तक का उनका ज्ञान अद्भुत था।

कुसुम सोगानी ने बताया 15 फरवरी 1935 को जन्मे डॉ. बशीर बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पीएचडी की और बाद में मेरठ कॉलेज में उर्दू विभागाध्यक्ष के रूप में सेवाएं दीं। इनका पूरा नाम सैयद मोहम्मद बशीर है। साहित्य और नाटकअकादमी में किए गये योगदानों के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा 1999 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
आज वे हमारे बीच नहीं है .लेकिन उनका काम ,उनके शेर और उनका कहा हमेशा याद रहेगा .हम उनके  लेखन से भी कुछ सीख सकते हैं।

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रचनात्मक लेखन कार्यशाला के लिए विषय का चयन डॉ. निशी मंज्वानी ने किया। लेखन कार्यशाला में बड़ी संख्या में सदस्यों ने उनकी पंक्ति को आगे बढाते हुए शेरो शायरी एवं काव्य विधा में लेखन कर उन्हें अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किये ..सतत पांच घंटे चली इस कार्यशाला में बीच बीच में डॉ .बशीर बद्र के मशहूर शेरो शायरी को दोहराया गया ,उनके कुछ ख़ास शेर जैसे –

1.कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।

2.उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए!

3.कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता

4.हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा

5.लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

कार्यशाला में आज के रचना कर्म के कुछ चुनिन्दा  पंक्तियाँ यहाँ प्रस्तुत हैं , सुषमा शुक्ला ने लिखा –

कोई तो मजबूरी होगी, आँखों में बरसात,
बिन कारण पतझड़ नहीं, सूखें मन के पात।

कोई तो मजबूरी होगी, जो बदले व्यवहार,
वरना अपने छोड़ते नहीं, यूँ रिश्तों का प्यार

वन्दिता श्रीवास्तव ने कम शब्दों में मन की बात लिखी 

कोई तो मजबूरी होगी

सांध्य काल
पीपल तले,
मंदिर मे
मै राह तकती
तुम न आये

डॉ.रश्मि जोशी ने बहुत ही उम्दा शेर लिखे

यूं ही नहीं सूरज ने अगन बढ़ाई होगी,
धरती में तपन कहीं से तो आई होगी ,
उम्मीदों की शाख पर
यकीं की कलियाँ मुरझाई होंगी ,
कुछ तो मजबूरियां रही होंगी,
चादरें रहमतों की इंसा के सर से,
कुदरत ने यूं ही नहीं हटाई होंगी।

मुक्ता पन्त पाण्डेय ने कहा

आते-आते भी तुम नहीं आए,
कुछ तो रौनाइयाँ रहीं होंगी।
दिल की बातें दिल में ही दबाईं,
कभी तनहाइयाँ रही होंगी।
उर के सुकून को क्या तोलें,
कभी बिबाइयाँ भी सही होंगी

माधुरी निगम –तुम आये मौन ना बोलने की क़सम ,
कुछ तो मजबूरियाँ रही होगी ।वो तुम्हारा दुनिया को बहलाने का नायाब भरम ,
कुछ तो मजबूरियाँ रही होगी ।

विभा बिलाला जैन लिखती हैं -रोज़ शाम को सूरज को जाना होता
रोज़ सुबह में चन्दा को जाना होता है दोनों की ही कुछ तो मजबूरियां रही होंगी

इस अवसर पर सुषमा शुक्ला ,कुसुम सौगानी ,प्रभा तिवारी ,निशी मंजवानी  ,वन्दिता श्रीवास्तव ,विभा बिलाला जैन ,मुक्ता पन्त पाण्डेय ,डॉ. प्रतीक्षा शर्मा ,डॉ.मीनल  डोंगरे ,सपना उपाध्याय ,संध्या पांडे ,पियूषा शुक्ला ,मनोरमा  जोशी ,माधुरी निगम ,निर्मला मुंदडा ,अपर्णा खरे ,डॉ.रश्मि जोशी,रानू टूवानी  इत्यादि ने अपनी लेखनी से उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किये

बशीर बद्र का इस दुनिया से रुखसत होना सिर्फ एक महान फनकार का जाना नहीं है, बल्कि उर्दू गजल के स्वर्ण युग का पूरी तरह से खामोश हो जाना है। कार्यशाला का समापन शाम पांच बजे उनके ओरिजनल वीडियो  के साथ भाव पूर्ण   नमन करते हुए  हुआ।

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