गिरगिटिया राजनीति: भ्रष्टाचार मिटाने निकले थे, खुद मुजरा करने बैठ गए!

क्या यह "विभीषण" भी रावण की लंका में आग लगा देगा?

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गिरगिटिया राजनीति: भ्रष्टाचार मिटाने निकले थे, खुद मुजरा करने बैठ गए!

वेद माथुर की विशेष रिपोर्ट 

भारतीय राजनीति के इतिहास में 2011-12 एक उम्मीद की किरण लेकर आया था। अन्ना हज़ारे के आंदोलन के कंधे पर सवार होकर एक शख्स ने देश से भ्रष्टाचार मिटाने की कसम खाई। नाम था—अरविंद केजरीवाल। लेकिन आज, जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो वह ‘उम्मीद’ एक भयावह ‘धोखा’ नजर आती है।तवायफ के सिक्कों की खनक और गिरता ईमानकेजरीवाल और उनकी पार्टी की हालत आज उस नर्तकी जैसी हो गई है, जो दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने आई थी। इस पर एक पुराना शेर बिल्कुल सटीक बैठता है:”आए थे महफिल में तवायफ के सिक्कों की खनक रोकने,

कम्बख्त! सिक्कों की चमक देखी तो खुद ही मुजरा करने लग गए।”

भ्रष्टाचार-मुक्त भारत का सपना बेचने वाले ‘सर जी’ आज खुद घोटालों के आरोपों से घिर चुके हैं। जो बंगला कभी सादगी का प्रतीक था, वह ‘शीशमहल’ बन गया। जो हाथ झाड़ू थामे थे, वे आज शराब नीति, वफादारी के खेल और आंतरिक सत्ता संघर्ष की कालिख से सने नजर आते हैं।अपनों का कत्लेआम: विचारधारा या तानाशाही?केजरीवाल ने व्यवस्थित तरीके से उन साथियों को बाहर का रास्ता दिखाया जिन्होंने उन्हें आईना दिखाने की हिम्मत की।

प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, कुमार विश्वास, आशुतोष—ये नाम गवाह हैं। या तो अपमानित करके निकाला गया या स्थितियां इतनी बनाई गईं कि वे खुद ही चले गए।

असली वजह साफ थी: केजरीवाल को ‘साथी’ नहीं, ‘दरबारी’ चाहिए थे।

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राज्यसभा का ‘लड्डू’ और 50 करोड़ की बोली?पुराने साथियों ने खून-पसीना एक किया, लेकिन राज्यसभा की सीटें उन्हें क्यों नहीं मिलीं? यह ‘लड्डू’ खास वफादारों को बाँटा गया या भारी ‘डोनेशन’ के बदले बेचा गया—ऐसी चर्चाएं लंबे समय से हैं। स्वाति मालीवाल, राघव चड्ढा जैसे नामों को भेजना कई सवाल खड़े करता था। अनुभवी नेताओं की बजाय इनमें क्या खास ‘योग्यता’ थी?

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राघव चड्ढा: ‘खास’ से भी ज्यादा खास?

राघव चड्ढा की कहानी सबसे दिलचस्प रही—विधायक, सांसद, पंजाब सलाहकार समिति अध्यक्ष, राजयसभा डिप्टी लीडर… इतनी तेज तरक्की कम उम्र में! लोग पूछने लगे थे कि क्या ‘सर जी’ उन्हें अपना राजनीतिक वारिस या ‘दामाद’ बना रहे हैं?महाभारत की कथा और आधुनिक ‘शकुनि’राघव चड्ढा को महाभारत के शकुनि की भूमिका में देखा जा सकता था, जिसने धृतराष्ट्र (केजरीवाल) को अपनी चालों में पूरी तरह फंसा लिया। केजरीवाल ने सोचा कि वे दुनिया को मूर्ख बना रहे हैं, लेकिन हकीकत यह थी कि उनके अपने सिपहसालार उन्हें ही चक्रव्यूह में घसीट रहे थे।लेकिन अब सबसे बड़ा ट्विस्ट आ गया है।

24 अप्रैल 2026 को राघव चड्ढा समेत 7 राजयसभा सांसदों (स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, संदीप पाठक, अशोक मित्तल आदि) ने AAP छोड़कर BJP जॉइन कर लिया। उन्होंने साफ कहा—पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से भटक चुकी है, अब यह व्यक्तिगत फायदे के लिए काम कर रही है। दो-तिहाई राजयसभा सांसदों के इस ‘मर्जर’ ने AAP की रीढ़ तोड़ दी। वही ‘शकुनि’ अब खुद मैदान छोड़कर चला गया। वही ‘दरबारी’ जिन्हें आप ‘खास’ कहते थे, आज ‘विद्रोही’ बन गए। irony इससे बड़ी और क्या हो सकती है?

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शराब नीति घोटाला: दलदल या सिर्फ आरोप?शराब नीति (excise policy) का मामला सबसे बड़ा आरोप था। केजरीवाल और मनीष सिसोदिया समेत कई नेताओं पर CBI-ED के केस चले, जेल भी गए। लेकिन फरवरी 2026 में दिल्ली की Rouse Avenue कोर्ट ने सभी 23 आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया। कोर्ट ने कहा—कोई overarching conspiracy साबित नहीं होती, सबूत कमजोर हैं। CBI अब हाईकोर्ट में अपील कर रही है। तो ‘घोटालों के दलदल’ वाली कहानी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

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केजरीवाल ने जनता की आँखों में धूल झोंककर राज करने की कोशिश की, लेकिन ‘काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती’।

जो भ्रष्टाचार मिटाने आए थे, वे खुद उसी सिस्टम का हिस्सा बन गए। अपनों को निकालना, वफादारों को तरजीह देना, और अब अपने ही ‘खास’ लोगों का विद्रोह—यह साबित करता है कि सत्ता हर किसी को बदल देती है।

दिल्ली में 2025 के चुनावों में AAP को करारी हार मिली। पंजाब अब उनका आखिरी गढ़ है, लेकिन वहाँ भी 2027 के चुनाव से पहले यह exodus बड़ा झटका है। जनता जाग चुकी है। ‘सियासी मुजरा’ का अंत नजदीक लगता है।

चलते-चलते:

नई राजनीति और ईमानदारी का दावा करने वाले केजरीवाल ने जिन अरबपतियों/वफादारों को राज्यसभा भेजा, उनकी काबिलियत क्या थी—या सिर्फ सिक्कों की खनक ने काम किया?

केजरीवाल के सारे भ्रष्टाचार में उनका राजदार राघव चढ़ावन के दुश्मनों के खेमे में आ गया है तो आने वाले समय में केजरीवाल की मुश्किलें तो बढ़ने वाली हैं ही।