वास्तव में 15 जून 1947 को बंटवारे की मंजूरी का फैसला भारत के हित में ही था…!

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वास्तव में 15 जून 1947 को बंटवारे की मंजूरी का फैसला भारत के हित में ही था…!

कौशल किशोर चतुर्वेदी

15 जून 1947 का कांग्रेस अधिवेशन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ माना जाता है, क्योंकि इसी में कांग्रेस ने विभाजन की योजना स्वीकार कर सत्ता हस्तांतरण का रास्ता साफ किया था। 15 जून 1947 को दिल्ली में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का महत्वपूर्ण अधिवेशन आयोजित हुआ। इस अधिवेशन में 3 जून 1947 की माउंटबेटन योजना पर विचार किया गया, जिसमें भारत के विभाजन और सत्ता हस्तांतरण का प्रस्ताव था। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और आचार्य जे.बी. कृपलानी ने योजना का समर्थन किया। महात्मा गांधी विभाजन के पक्ष में नहीं थे, लेकिन उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं से परिस्थितियों को देखते हुए निर्णय स्वीकार करने का आग्रह किया।अधिवेशन में बहुमत से भारत विभाजन की योजना को मंजूरी दी गई।

इस निर्णय के बाद भारत और पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र राष्ट्रों के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ। आगे चलकर 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ और पाकिस्तान 14 अगस्त 1947 को अस्तित्व में आया।

हम उन परिस्थितियों पर नजर डालते हैं जिन्होंने इस देश के बंटवारे को अनिवार्य कर दिया था। आज हम यह भी महसूस कर सकते हैं कि अगर देश का बंटवारा नहीं हुआ होता तो पूरा भारत आज पाकिस्तान की तरह बर्बादी की कगार पर होता। कांग्रेस ने 1947 में 14-15 जून को नयी दिल्ली में हुए अपने अधिवेशन में बंटवारे के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। बंटवारे को लेकर अक्सर यह कहा जाता है कि आजादी की आड़ में अंग्रेज भारत को कभी न भरने वाला यह जख्म दे गए। लेकिन आज़ादी के 78 साल बाद अब यह समझा जा सकता है कि अगर उस समय भारत का बंटवारा नहीं होता तब क्या आज ऐसे समृद्धशाली भारत की कल्पना की जा सकती थी। अगर बंटवारे के समर्थक मुस्लिम नेताओं की राय मानी जाती तो राज्यों को असीमित अधिकार देना मंजूर करना पड़ता। और तब स्थितियाँ कितनी विषम होती इस बात का अंदाजा आज किया जा सकता है। और इसीलिए शायद आज यह माना जा सकता है कि बंटवारा होकर दो राष्ट्रों का बनना भारत के हित में ही रहा है। और यह ठीक ही था कि 15 जून 1947 को माउंटबेटन की योजना पारित की गई और विभाजन के निर्णय को अखिल भारतीय कांग्रेस के सदस्यों ने स्वीकार कर लिया।

इतिहास पर एक नजर डालें तो पाकिस्तान के निर्माण की वकालत 1906 में ढाका में स्थापित ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने की थी। इसके मुसलमान सदस्यों की राय थी कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुस्लिम सदस्यों को हिंदू सदस्यों के जैसे समान अधिकार प्राप्त नहीं हैं। कांग्रेस उनके साथ भेदभाव करती है। 1930 में मुसलमानों के लिए एक अलग राज्य की मांग करने वाले पहले व्यक्ति अल्लामा इकबाल थे। उनका मानना था कि ‘हिंदू बहुल भारत’ से अलग मुस्लिम देश बनना महत्वपूर्ण है। अल्लामा इकबाल ने मुहम्मद अली जिन्ना और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर एक नए मुस्लिम राज्य के गठन के लिए प्रस्ताव तैयार किया। 1930 तक, मुहम्मद अली जिन्ना, जो लंबे समय से हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए प्रयासरत थे, अचानक भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति के बारे में चिंतित होने लगे। इसके लिए वो कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराने लगे। उन्होंने कांग्रेस पर देश के मुसलमानों के साथ भेदभाव का आरोप लगाया।1940 में लाहौर सम्मेलन में, जिन्ना ने एक अलग मुस्लिम देश की मांग करते हुए एक बयान दिया। उस समय के सभी मुस्लिम राजनीतिक दल, जैसे खाकसार तहरीक और अल्लामा मशरिकी धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन के पक्ष में नहीं थे। अधिकांश कांग्रेसी नेता धर्मनिरपेक्ष थे और देश के विभाजन का भी विरोध करते थे। महात्मा गांधी धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन के खिलाफ थे और उनका मानना था कि हिंदुओं और मुसलमानों को एक देश में शांति से एक साथ रहना चाहिए। गांधी ने मुसलमानों को कांग्रेस में बनाए रखने के लिए भी संघर्ष किया, जिनमें से कई ने 1930 के दशक में पार्टी छोड़ना शुरू कर दिया था। धार्मिक आधार पर अलग देश की मांग के बाद उत्तर भारत और बंगाल के बड़े हिस्से में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भीषण सांप्रदायिक हिंसा हुई थी, जिसके कारण मुसलमान और असुरक्षित महसूस करने लगे थे। एक ऐसा वक्त आ गया जब विभाजन एकमात्र विकल्प की तरह दिखने लगा जो भारत में बड़े पैमाने पर गृहयुद्ध को छिड़ने से रोक सकता था। 1940 तक पाकिस्तान की परिभाषा अस्पष्ट थी और इसकी दो तरह से व्याख्या की जा रही थी। एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में या संघबद्ध भारत के सदस्य के रूप में। 1946 में, एक कैबिनेट मिशन ने एक विकेन्द्रीकृत राज्य का सुझाव देकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता करने की कोशिश की। इस सुझाव में कहा गया कि स्थानीय सरकारों को पर्याप्त शक्ति दी जाएगी। जवाहर लाल नेहरू ने एक विकेंद्रीकृत राज्य के लिए सहमत होने से इनकार कर दिया और जिन्ना ने पाकिस्तान के एक अलग राष्ट्र की अपनी इच्छा को बनाए रखा। इन परिस्थितियों में ही 15 जून 1947 को माउंटबेटन योजना को स्वीकृति देते हुए विभाजन के निर्णय को अखिल भारतीय कांग्रेस के सदस्यों ने स्वीकार कर लिया।

15 जून 1947 को नई दिल्ली में हुए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के ऐतिहासिक अधिवेशन की अध्यक्षता आचार्य जे.बी. कृपलानी ने की थी।विभाजन के इस प्रस्ताव को गोविंद बल्लभ पंत द्वारा पेश किया गया था, जिसका उद्देश्य देश में बढ़ते सांप्रदायिक गतिरोध को समाप्त करना था। प्रस्ताव को भारी बहुमत से पारित किया गया था, लेकिन कांग्रेस के भीतर ही कई प्रमुख नेताओं जैसे पुरुषोत्तम दास टंडन ने इसका कड़ा विरोध भी किया था।प्रस्ताव के पक्ष में 157 वोट पड़े, 29 वोट विरोध में आए और 32 सदस्यों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। स्वीकृति के बाद ही भारत और पाकिस्तान के दो अलग-अलग स्वतंत्र राष्ट्र बनने का अंतिम मार्ग प्रशस्त हुआ था। और अब पाकिस्तान और बांग्लादेश की स्थिति को देखते हुए, यह सहज ही समझा जा सकता है कि 15 जून का कांग्रेस के अधिवेशन में बंटवारे को मंजूरी देने वाला फैसला भारत के हित में ही था…।

 

 

 

 

लेखक के बारे में –

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।

वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।