रविवारीय गपशप : जब टिप देने का मेरा अहम भाव काफूर हुआ! 

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रविवारीय गपशप : जब टिप देने का मेरा अहम भाव काफूर हुआ! 

आनंद शर्मा

जीवन में ज़िन्दगी जीने के सबक कब कहाँ मिल जायें , कुछ कह नहीं सकते । मेरी जब डिप्टी कलेक्टर की नौकरी लगी तब हमारी ट्रेनिंग प्रशासन अकादमी में हुआ करती थी और तब तक उसे नरोन्हा साहब का नाम नहीं मिला था । अकादमी का नियम था कि रविवार को दोपहर का खाना कुछ ख़ास होगा , तब उसे फ़ीस्ट कहते थे , यानी उसमें एक-आध खाने का आइटम बढ़ा हुआ रहता और साथ में कोई मिष्ठान्न भी होता , पर इसका दूसरा पहलू ये था कि रविवार की शाम मेस की छुट्टी होती । अकादमी के आसपास उनदिनों कोई होटल नहीं थे , खाना खाने के लिए न्यू मार्केट तक जाना पड़ता , और होटल का खाना मँहगा भी होता था । रविवार के दिन सब इसी उधेड़बुन में रहते कि रात का खाना कहाँ खाया जाएगा ।

मेरी फुफेरी बहन तब भोपाल के टीटी नगर में रहा करती थीं , और मेरे जीजाजी वल्लभ भवन में ही अंडर सेक्रेटरी हुआ करते थे । रविवार को मैं अक्सर उनके घर चला जाता और रात का खाना वहीं खा लिया करता । एक दिन दीदी ने मुझसे पूछा कि जीजाजी की तनख्वाह नहीं मिली है तो घर खर्च के लिए कुछ रुपये उधार मिल सकेंगे ? मैं तनख़्वाह मिलते ही लौटा दूँगी । मुझे तो एक दिन पहले ही वेतन मिला था सो मैंने जेब में हाथ डाल एक हज़ार रुपये उनके हाथ में रख दिए । इस बात को कई दिन बीत गए , पर रुपये वापस न मिले । उन दिनों एक हज़ार रुपये बहुत होते थे । मुझे कुछ न सूझा तो मैंने बाबूजी को ये बात बताई । बाबूजी बोले , अरे वो पैसे खर्च कर चुकी होगी और इस बात का पता दमादजी को भी ना होगा , पर तुम पैसे ख़ुद वापस न माँगना , वो दे ना पायेगी तो उसके सम्मान को चोट पहुंचेगी और संबंध ख़राब होंगे । नज़दीकी सम्बन्धियों में उधार देने से बचना ही ठीक है , हाँ तुम्हें पैसों की कमी हो तो ज़रूर मुझसे ले लेना ।

इन दिनों मैं अपने बचपन के मित्र राकेश अग्रवाल की बिटिया रक्षिता की शादी में पुष्कर आया हुआ हूँ । भोपाल जयपुर एक्सप्रेस अजमेर सुबह सुबह पहुँच जाती है , और राकेश ने कह रखा था कि अजमेर से पुष्कर तक आने के लिए वो किसी वाहन की व्यवस्था कर देगा । कल सुबह साढ़े छह बजे अजमेर स्टेशन पर उतरने के बाद मैंने फोन लगाया तो ड्राइवर ने मुझे स्टेशन से सामान सहित अपनी कार में बैठा लिया । अजमेर से पुष्कर 15 किलोमीटर है यानी लगभग बीस-पच्चीस मिनट का रास्ता । सुबह सुबह का समय था सो मैंने ड्राइवर से कहा कि भाई रास्ते में कहीं बढ़िया चाय मिलती हो तो कार रोक लेना । ड्राइवर ने सहमति में सर हिलाया और थोड़ी दूर जाकर सड़क के किनारे एक होटल के पास गाड़ी रोक दी । मैंने जेब से सौ रुपय का नोट निकाला और ड्राइवर को देते हुए कहा एक चाय मुझे ला दो और एक आप भी पी लो । कुल्हड़ में लाई गई चाय सचमुच बढ़िया थी । ड्राइवर बचे हुए पैसे मुझे देने लगा तो मैंने कहा इसे आप रखो , आपने बढ़िया चाय पिलाई ये उसकी टिप है । दबी नज़रो से मैंने देख लिया था , पचास के क़रीब रुपये बचे थे ।

गाड़ी पुष्कर की ओर चल पड़ी और थोड़ी देर बाद उसने फिर सड़क के किनारे कार रोकी , जहाँ छह गायें बँधी हुईं थी और दो लोग ढेर सारा चारा लिए बैठे थे । ड्राइवर ने पूछा चारे की एक गड्डी कितने की ? सड़क किनारे बैठे बुजुर्ग ने कहा दस रुपये की एक , उसने फिर मोलभाव की भाषा में पूछा , पचास की छह दोगे ? बुजुर्ग ने हामी भरी सो उसने जेब से वही पचास रुपये निकाले और बुज़ुर्गवार के हाथ में देते हुए बोला एक-एक गद्दी सभी को डाल दो और कार वापस गियर पर डाल आगे बढ़ा दी । मैंने पूछा आपका नाम क्या है , ड्राइवर बोला राकेश मेहरा , मैंने फिर पूछा आपकी ख़ुद की गाड़ी है ? उसने कहा जी नहीं सर हम तो ड्राइवर हैं । मैंने कहा आपका दिल बड़ा है , राकेश मेहरा ने सहज भाव से जवाब दिया सब आपका दिया ही तो था और उस एक पल में , मेरे मन में बैठा टिप देने का अहम् भाव काफूर हो गया और मुझे महसूस हुआ कि दयनातदारी का गुण ईश्वर हैसियत देख कर नहीं देता ।