
एक युग को समेटे है ‘कोरोना योद्धा की संघर्ष कथा’…
कौशल किशोर चतुर्वेदी
सच है विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है।
शूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते।
बिघ्नों को गले लगाते हैं,
कांटों में राह बनाते हैं।
महाकवि रामधारी सिंह दिनकर ने सत्य ही कहा है कि विपत्ति शूरवीरों को विचलित नहीं कर पाती, इसीलिए कोरोना में हमने सभी तरह की विपत्तियाँ, बीमारियां आदि का सामना किया, पर मनुष्य की जिजीविषा के सामने सब नतमस्तक हो जाते हैं। हमने हार नहीं मानी और हम अपनी इच्छाशक्ति के कारण कोरोना जैसी महामारी पर विजय प्राप्त कर सके।
डॉ. अभय अरविंद बेडेकर द्वारा लिखित ‘कोरोना योद्धा की संघर्ष कथा’ में एक पूरे युग को त्याग, समर्पण, कर्त्तव्यनिष्ठा, सकारात्मकता और एक योद्धा की दृष्टि से बहुत ही करीब से जिया जा सकता है। इस पुस्तक के जरिए हम अलग-अलग तरह के योद्धाओं को करीब से देखते हैं। इनमें कोरोना के मरीज बनकर जीवन संघर्ष की कथा लिखने वाले योद्धा हैं। इसमें कोरोना से मरीजों को बचाने के लिए और उनके इलाज में कोई कमी न रह जाए, इसके लिए अपने परिवारों की चिंता न करते हुए रणभूमि में तैनात रहे प्रशासनिक, पुलिस और स्वास्थ्य अमले सहित स्वैच्छिक सेवा संगठनों से जुड़े वह लाखों योद्धा शामिल हैं जो कोरोना की दोनों लहरों में हर पल सेवा में लगे रहे। इनमें सरकार और विपक्ष में शामिल वह सभी राजनेता भी कोरोना योद्धा के रूप में शामिल रहे, जिन्होंने जनसेवा में सबकी परवाह करने के लिए कभी मैदान नहीं छोड़ा। तो मीडिया के साथी भी कोरोना योद्धा बनकर खबरों के मोर्चे पर डटे रहे और हर मुसीबत में पीड़ितों के साथ खड़े रहे।
और अनगिनत, वह साथी भी
कोरोना योद्धा बनकर अपना सर्वस्व समर्पण करते रहे जो जन सामान्य के रूप में देखे जा सकते हैं। कोरोना काल की भयावहता को सभी ने बहुत ही करीब से महसूस किया है। लेकिन प्रशासन ही वही रीढ़ थी जिस पर वह भार था कि सबको खतरे से बाहर लाने के लिए खुद को पूरी तरह से झोंकना है। डॉ. अभय अरविंद बेडेकर
ने प्रशासनिक अधिकारी के रूप में ऐसे ही संघर्ष को न केवल पूरी तरह से जिया है, बल्कि अनुभव के कड़वे घूँट पीकर हर पीड़ित के जीवन में मिठास घोलने की हर संभव कोशिश की है और सफलता भी पाई। उनकी आँखों से ही उस पूरे कोरोना युग को ‘कोरोना योद्धा की संघर्ष कथा’ के रूप में जब हम पढ़ते हैं, तब आँखें नम हुए बिना नहीं रहतीं। मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में कोरोना से निपटने के लिए जिन्होंने अपने सुरक्षा घेरे को तोड़ते हुए, न केवल वहाँ आमद दी बल्कि पूर्ण विजय मिलने तक ‘ऑक्सीजन मैन’ के रूप में सभी के लिए ऑक्सीजन की व्यवस्था करते हुए खुद तब तक चैन की सांस नहीं ली, जब तक कोरोना से पूरी तरह मुक्ति नहीं मिल गई। और जब कोरोना ने उनके परिवार को भी अपने घेरे में लिया, तब भी वह ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के भाव को जीते हुए सबकी सेवा में लगे रहे। कोरोना काल में संघर्ष से समस्या मुक्ति तक के अपने अनुभवों को शब्दों में समेटकर ‘कोरोना योद्धा की संघर्ष कथा’ के रूप में बेडेकर ने जो निचोड़ सामने रखा है उसमें ज्ञानवर्धन भी है, खट्टे-मीठे अनुभवों का संगम भी है, एक योद्धा का सर्वस्व समर्पण भी है और उस पूरे कोरोना युग का दर्पण भी है। इंदौर में अपर कलेक्टर के रूप में 2020 और 2021 में कोरोना की दोनों लहरों में कोरोना योद्धा के रूप में जो अनुभव उन्होंने किए, उन्हें 4 साल बाद अलीराजपुर में कलेक्टर के रूप में पदस्थ रहकर पुस्तक के रूप में पिरोकर उन्होंने समाज को एक अमूल्य उपहार दिया है।
झलक देखें तो ‘कोरोना: अनजान से पहचान’ पहले अध्याय में अज्ञात के जरिए, वह लिखते हैं कि कभी-कभी जब हमारी पहचान किसी अनजान से होती है तो हमें यह पता नहीं होता कि हमारी उससे पहचान होगी, परिचय होगा और संबंध बनेगा। रिश्ता बनेगा, दोस्ती का हो या दुश्मनी का पर रिश्ता बनेगा जरूर। और अंतिम सोलहवें अध्याय में ‘ सामान्य होता जनजीवन, और संभावित खतरे पर नजर’ शीर्षक के साथ लेखक के रूप में, वह भगवान से सबकी रक्षा करने की गुहार लगाते हैं। इनके अलावा पुस्तक में याद रहने वाली चार विचित्र घटनाएं भी जिज्ञासा के साथ-साथ उस काल की विभीषिका से परिचित कराती हैं। इसमें ‘खत्म होती ऑक्सीजन, मरीजों की उखड़ती सांसें और टूटे बोल्ट’, ‘बर्फ का छोटा सा टुकड़ा पहाड़ जैसी मुसीबत’, ‘ ऑक्सीजन बनी चुनौती और सिलेंडर इकट्ठा करने का दौर’ और ‘ब्लैक फंगस की कहानी और बढ़ते मरीज’… घटनाएं हर पाठक को कोरोना युग की भयावहता और कोरोना योद्धा की निडरता, सूझबूझ और विजय यात्रा के करीब ले जाती हैं।

पुस्तक में एक अध्याय डॉ. बेडेकर की पत्नी मीनल ने भी लिखा है। इसका शीर्षक ‘कदमताल’ खुद-ब-खुद पूरी कहानी बयां कर रहा है। अज्ञात के जरिए वह भी लिखती हैं कि मजबूरियां देर रात तक जागती रहती हैं और जिम्मेदारी सुबह जल्दी उठा देती है। उन्होंने अध्याय की शुरुआत में लिखा है, कोरोना के उस भयंकर समय में हममें से प्रत्येक ने जो अनुभव किया, मानवता ने उससे बदतर की कल्पना कभी नहीं की होगी। जीवन तालाब में पानी के बुलबुले की तरह है, एक क्षण में ही इंसान का अस्तित्व ही खत्म। जब पति कोरोना योद्धा बनकर बिना समय गंवाए मैदान में गए तब पत्नी और बेटे मिहिर ने भी उनका साथ दिया तो बुजुर्ग माता-पिता का आशीर्वाद उन्हें हर पल मजबूती देता रहा। घर की चुनौतियों से पत्नी मीनल के सहयोग से ही पति बेडेकर विजय पा सके। हालांकि कुछ अपनों को खोना भी पड़ा। पर हार नहीं मानी और ईश्वर पर भरोसा रखा। इस अध्याय में भी अंत में उन्होंने भगवान से ही प्रार्थना की है कि सबकी रक्षा करना।
इंदौर में कोरोना काल के उस युग में बेहतर प्रबंधन की गवाही भी यह पुस्तक देती है। इसमें तत्कालीन कलेक्टर मनीष सिंह की कार्यशैली
भी सबको उनका मुरीद बनाती है। निश्चित तौर से ‘कोरोना योद्धा की संघर्ष कथा’ महाआपदा में भी दर्शन, सकारात्मकता, कर्तव्यपरायणता, त्याग, समर्पण और कार्यकुशलता के
साथ धैर्य और पराक्रम से साक्षात्कार कराती है। अवश्य ही इसको पढ़कर हम जीवन की सार्थकता और भयावहता के एक पूरे युग का अनुभव कर सकते हैं…।
लेखक के बारे में –
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।
वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।





