हिंदुस्तान में इसलिए होते हैं पेपर लीक

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हिंदुस्तान में इसलिए होते हैं पेपर लीक

वेद माथुर की विशेष रिपोर्ट

भारत में पेपर लीक अब कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित उद्योग अथवा संगठित अपराध बन चुका है। राजस्थान सब इंस्पेक्टर परीक्षा से लेकर नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं तक, हर कुछ महीनों में नया कांड सामने आता है। लाखों-करोड़ों युवाओं का भविष्य बर्बाद होता है, लेकिन दोषी लगभग हमेशा बच निकलते हैं। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?

इसके पीछे अपराधियों, भ्रष्ट अधिकारियों और सिस्टम की मिलीभगत का गहरा तंत्र काम कर रहा है।

1. अपराध करने वाले लोगों के मन में पूरा है विश्वास कि सिस्टम उनका कुछ नहीं कर सकता।

राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) के सदस्यों से लेकर कुमार विश्वास की पत्नी तक को पूरा यकीन है कि इस देश का सिस्टम उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। पकड़े गए तो क्या? मिनटों में जमानत, फिर तारीख पर तारीख, गवाह hostile हो जाते हैं और अंत में आरोपी बेदाग रिहा।

कानूनी प्रक्रिया इतनी लंबी और कमजोर है कि बड़े अपराधी उसे हंसते हुए पार कर जाते हैं। छोटे-मोटे अपराधी थाने में थर्ड डिग्री झेलते हैं, कई बार कस्टडी मौत भी हो जाती है, लेकिन बड़े मगरमच्छों पर कोई हाथ नहीं डाल पाता।

2. नैतिक जिम्मेदारी कौन लेगा?

इस बार के पेपर लीक की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री को इस्तीफा दे देना चाहिए। अगर मंत्रियों को अपनी अनदेखी या लापरवाही की कीमत चुकानी पड़े, तो शायद वे खुद अलर्ट रहें और पूरे सिस्टम को जगह-जगह सतर्क रखें। लेकिन जब तक ऊपर से जवाबदेही तय नहीं होगी, नीचे के स्तर पर लीक जारी रहेंगे।

3. अपराधियों का भरोसा: 

कानून सिर्फ कमजोरों के लिए है।

पेपर लीक करने वाले अपराधी — चाहे नासिक की सिक्योरिटी प्रिंटिंग प्रेस से जुड़े लोग हों, कोचिंग सेंटर के मालिक हों या एमबीबीएस के इच्छुक छात्र — सबको भारत की कानून व्यवस्था पर पूरा भरोसा है। उन्हें पता है कि:छोटी चोरी करने वाले पर तो पूरा सिस्टम सक्रिय हो जाता है।

लेकिन मोटे-मोटे अपराधी, बड़े कोचिंग माफिया या सिस्टम के अंदरूनी लोग छूट जाते हैं।

4.चारों तरफ भ्रष्टाचार का तांडव है — पटवारी, तहसीलदार, दरोगा, पार्षद, विधायक, सांसद, मंत्री, बड़े अफसर — सब मौका लगते ही खुलकर कमा रहे हैं। बड़े लोगों के खिलाफ अभियोजन की अनुमति तक नहीं मिलती। जब सारा सिस्टम भ्रष्टाचार की बहती नदी में डूबा हुआ है, तो पेपर लीक करने वाले क्यों न हाथ धो लें?

5. कोई जवाबदेही नहीं:

नीट का पेपर लीक हो या लोक सेवा आयोग का — अंत में किसी की जवाबदेही नहीं तय होती। जांच होती है, रिपोर्ट आती है, कुछ सस्पेंड होते हैं, फिर सब शांत। युवा आंदोलन करते हैं, मीडिया कुछ दिन चिल्लाता है, और फिर सब भूल जाता है। अगला लीक होने तक।

6. सख्त सजा कहाँ है?

दुबई और कई मुस्लिम देशों में पेपर लीक जैसी घटनाएं नहीं होतीं, क्योंकि वहां सख्त सजाएं हैं — जैसे हाथ काटने का प्रावधान। अपराधी को तुरंत और कड़ी सजा मिलती है, जिससे डर बना रहता है। जबकि भारत में अपराधियों के हाथ और मजबूत होते जा रहे हैं। गरीब आदमी कानून से डरता है, क्योंकि उसके पास संसाधन नहीं। लेकिन जिसके पास कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी जैसे दिग्गज वकील हैं, वह कानून को भी हरा देता है।

सिस्टम सुधारे, वरना युवा हार जाएंगे!

पेपर लीक केवल परीक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि पूरे देश के मेरिट सिस्टम, युवाओं के भविष्य और सामाजिक न्याय का प्रश्न है। जब तक सजा निश्चित, त्वरित और कड़ी नहीं होगी, जब तक बड़े लोगों पर भी कार्रवाई नहीं होगी, जब तक मंत्री स्तर तक जवाबदेही तय नहीं होगी — तब तक पेपर लीक रुकने वाले नहीं हैं।युवाओं का गुस्सा जायज है। वे मेहनत करते हैं, रात-दिन पढ़ते हैं, लेकिन कुछ लोगों की लालच भरी साजिश उनके सपनों को चूर-चूर कर देती है। अब वक्त आ गया है कि सिस्टम खुद को सुधारे, वरना युवा इस सिस्टम से ही मोह भंग कर लेंगे।