
रविवारीय गपशप : जब प्रभारी सचिव को कुर्सी पर बैठे देख पसीने पसीने हुए SDM
अब तो ये प्रथा लगभग समाप्त है , पर बरसों पहले प्रभारी सचिव की व्यवस्था बड़े माकूल तरीके से लागू हुआ करती थी । हर जिले में एक सचिव स्तर के आईएएस अधिकारी को नियुक्त किया जाता था , जो प्रदेश और जिले के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी हुआ करते थे । प्रदेश स्तर पर जिले के लम्बित प्रस्तावों से लेकर , वित्तीय जरूरतों के महत्वपूर्ण मामलों में उनकी राय बड़ी महत्वपूर्ण हुआ करती थी । यहाँ तक कि जिला स्तर पर पदासीन बड़े अधिकारियों के बारे में भी उनका फ़ीडबैक लिया जाता था । प्रभारी सचिव जिलों में आकर बैठकें करते , शासन की योजनाओं का क्रियान्वयन देखते और जनप्रतिनिधियों के साथ बैठ कर कामों में आ रहे अवरोधों की जानकारी भी लेते । बाद में भी समय-समय पर ये व्यवस्था लागू करने का प्रयास किया गया , पर मुझे लगता है , प्रभारी सचिवों को वैसे अधिकार और महत्व न देने से ये प्रणाली सफल ना हो पायी ।
आज की कहानी पुरानी है , जब ये व्यवस्था बड़ी सफल हुआ करती थी । वर्ष 1993 की बात है , तब मैं सागर जिले की बंडा तहसील में अनुविभागीय अधिकारी हुआ करता था । प्रभारी सचिवों की जिलास्तरीय बैठक में हम अनुविभाग के अधिकारी भी शासकीय योजनाओं के अपने प्रगति पत्रकों सहित उपस्थित रहा करते थे । सागर मुख्यालय पर मेरे मित्र प्रकाश चंद्र प्रसाद एसडीएम हुआ करते थे । उन दिनों सागर बड़ा अनुविभाग था , और अपने ख़ूबसूरत जलप्रपात के लिए प्रसिद्ध राहतगढ़ तब सागर अनुविभाग का ही हिस्सा था । सागर के प्रभारी सचिव नियुक्त हुए श्री रविन्द्र शर्मा साहब , जो प्रदेश शासन में प्रमुख सचिव थे और वे पहले दौरे पर आने वाले थे । सागर अनुविभाग भोपाल से आने सीमा पर स्थित पहला अनुविभाग पड़ता था तो प्रसाद साहब उस दिन सभी व्यवस्थायें देखने दौरे पर निकले थे । मस्तानी तबीयत के मालिक प्रसाद व्यवस्थाएँ देखते-देखते राहतगढ़ वाटर फॉल पहुँचे तो उन्होंने देखा , एक कार वाटर फॉल के पास आकर रुकी और उसमें से एक सज्जन निकले , उन्होंने अपने कपड़े उतार बोनट पर रखे और देखते देखते , किनारे आकर प्रपात के निर्मल बहते जल में छलाँग लगा दी । उन दिनों राहत गढ़ वॉटरफॉल में अक्सर नहाने के दौरान दुर्घटनाएँ हो जाया करती थीं , बचाव के लिए कोई स्थायी गोताखोर भी नहीं थे , तो प्रशासन ने किनारे पर एक बोर्ड भी लगा रखा था कि जलप्रपात में नहाना मना है । प्रसाद साहब को ये देख कर बड़ा गुस्सा आया , वे कार के पास पहुँचे तो कार का ड्राइवर भी कार छोड़कर कहीं चला गया था । प्रसाद साहब ने सबक सिखाने की नीयत से बोनट पर रखे कपड़े उठाये, और दूर खड़ी अपनी जीप में जाकर बैठ गए । स्नान कर रहे सज्जन जब थोड़ी देर बाद तरोताज़ा होकर निकले तो उन्होंने पाया कि उनके कपड़े कार में उस जगह मौजूद नहीं हैं , जहाँ छोड़ गए थे , आसपास देखा तो प्रसाद साहब दिख गए , जो जीप पर कपड़े लिए बैठे थे । वे सज्जन अपने कपड़े लेने प्रसाद साहब के पास आए , प्रसाद साहब ने उनको बड़ी झाड़ लगायी , कहने लगे “ आप पढ़े लिखे हैं , आपने साइड में लगा बोर्ड नहीं देखा यहाँ नहाना मना है , कोई दुर्घटना हो जाती तो आपको कोई बचाने वाला भी नहीं था । उन सज्जन ने बड़ीं नम्रता से ‘सॉरी’ कहा तब एसडीएम प्रसाद जी ने कपड़े वापस किये । इसके बाद प्रसाद साहब अपना दौरा पूरा करने आगे निकल गए । दूसरे दिन प्रभारी सचिव के बैठक में , हम मिले तो मैंने देखा प्रसाद साहब पसीने से नहाए हुए हैं । मैंने पूछा क्या बात है , क्या तबीयत ख़राब है , तो प्रसाद साहब ने धीमे स्वर में घटना बताते हुए कहा कि जिन सज्जन के कपड़े उठा कर वे डाँट रहे थे , वही आज प्रभारी सचिव के रूप में बैठक लेने हमारे सामने बैठे थे । मेरा भी कलेजा मुँह को हो आया कि आज तो प्रसाद की मुसीबत पक्की है , पर प्रभारी सचिव बड़े दिल के थे , उन्होंने उस घटना के बारे में किसी से कुछ कहा भी नहीं और बैठक के बाद प्रसाद की सलामती के जश्न में हमने उनसे पार्टी खाई ।





