भारत के शहर क्यों बन रहे हैं आग के गोले?

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भारत के शहर क्यों बन रहे हैं आग के गोले?

एक अध्ययन के अनुसार, ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी इलाकों में बहुत ज्यादा तापमान बढ़ रहा है। पृथ्वी इस समय अतिरिक्त 1.9 डिग्री गर्म होने की ओर है जो पेरिस समझौते के लक्ष्य से कहीं ज्यादा है।

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल से जुड़े जलवायु वैज्ञानिकों की एक टीम ने शोध-पत्र में उल्लेख किया गया है कि भारत का औसत तापमान पिछले एक दशक (2015–2024) में लगभग 0.9°C बढ़ गया है, जो 20वीं सदी की शुरुआत (1901–1930) की तुलना में अधिक है। इसके अतिरिक्त, पश्चिमी और पूर्वोत्तर भारत में वर्ष के सबसे गर्म दिन का तापमान 1950 के दशक से अब तक 1.5 से 2°C तक बढ़ चुका है।

बढ़ती गर्मी और लगातार पड़ रही हीटवेव के कारण शहर के निवासियों को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रही है, जिसका सबसे अधिक असर श्रमिकों और कमजोर समुदायों पर पड़ रहा है।दुनिया की 100 सबसे गर्म शहरों की सूची में 95 नाम भारत के शहर का है। शहर में लगातार हो रहे निर्माण कार्यों और जंगलों की कटाई के कारण प्राकृतिक ठंडक गायब हो गई है।शहर के तालाबों को बिल्डर भरकर मकान बना कर बेच रहे हैं। शहरों में कंक्रीट और डामर की सड़कें दिन भर गर्मी सोखती हैं और रात में छोड़ती हैं, जिससे शहर गांवों की तुलना में ज्यादा गर्म रहते हैं।वाहनों, उद्योगों और एयर कंडीशनर (एसी) के अत्यधिक उपयोग से भारी मात्रा में कृत्रिम गर्मी निकलती है, जो शहरों के तापमान को बढ़ाती है।

राजधानी भोपाल में ग्रीन कवर घटने की इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फारेस्ट मैनेजमेंट व आईआईएससी बेंगलुरु के रिपोर्ट के अनुसार 2009 में 35 प्रतिशत क्षेत्र में जंगल था। जो 2019 में महज 9 प्रतिशत रह गया। 2030 तक 3 प्रतिशत रह जाने का अनुमान है।

हमलोग पेड़ काटकर हाईवे बनाने और जंगल उजाड़कर खदानें खोलने में लगे हैं, तो नतीजे आज हम भुगत रहे हैं।भारत आज एक “हीट चैंबर” बन चुका है, और इसकी जवाबदेही मौसम पर डालकर जिम्मेदार बच निकलते हैं। वैश्विक जलवायु जोखिम सूचकांक के अनुसार, भारत चरम मौसम घटनाओं और जलवायु परिवर्तन के मामले में पांचवां सबसे अधिक संवेदनशील देश है। एक वैश्विक समीक्षा 2017 में कहा गया है कि यदि वैश्विक तापमान में वृद्धि का वर्तमान रुझान जारी रहता है, तो सदी के अंत तक गर्मी और आर्द्रता के बढ़ते स्तर के कारण छह घंटे या उससे अधिक समय तक सीधे धूप और धूप के संपर्क में रहने वाले लोगों का जीवित रहना असंभव हो सकता है।

सी- 40 विश्व के 96 देशों का एक संगठन है, जो शहरों का जलवायु के संबंध में नेतृत्व करता है। इसके सर्वेक्षण के अनुसार इस समय दुनिया के 350 से ज्यादा शहर अत्यधिक गर्मी से प्रभावित हैं। सन् 2050 तक इनकी संख्या बढ़कर 970 हो जाएगी।

प्रशांत महासागर में विकसित होने वाली जलवायु घटना अल नीनो के कारण वैश्विक तापमान सामान्य से अधिक बढ़ गया है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि भविष्य में बनने वाले अल नीनो वैश्विक तापमान को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा सकता है।

पहले अल नीनो एक प्राकृतिक चक्र था, लेकिन अब मानवजनित जलवायु परिवर्तन इसकी तीव्रता बढ़ा रहा है। समुद्र लगातार गर्म हो रहे हैं और चरम मौसम की घटनाएँ बढ़ रही हैं। हीटवेव बढ़ने का सबसे बड़ा कारण वैश्विक गर्मी है। जब हम कोयला, पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधन जलाते हैं, तो कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें वातावरण में जाती हैं। ये गैसें गर्मी को बाहर जाने से रोकती हैं, जिससे धरती का तापमान बढ़ता है।

भारत में पिछले चार दशकों में लू की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ी है, जिससे कई क्षेत्रों में गर्मी का प्रभाव अधिक हुआ।

मध्यप्रदेश राज्य जलवायु परिवर्तन क्रियान्वयन योजना 2023–28 तैयार की है, जिसमें 97,000 करोड़ रुपये का बजट प्रस्तावित है। लेकिन पर्यावरण विभाग का बजट मात्र 31 करोड़ रुपये है।जबकि सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की रिपोर्ट बताती है कि जनवरी 2022 से 2025 तक मध्यप्रदेश ने 598 दिनों में गंभीर मौसम का सामना किया है और इस दौरान 1,439 लोगों की मौतें हुई है। सरकार जलवायु संकट की गंभीरता को प्राथमिकता नहीं दे रही है। जबकि पूरी दुनिया जलवायु संकट से निपटने के लिए निवेश बढ़ा रही है, तब मध्यप्रदेश सरकार को ठोस कार्ययोजना बनाने का प्रयास करना चाहिए।

जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का नहीं, बल्कि वर्तमान का सबसे बड़ा मानवीय संकट बन चुका है। भारत के शहर तेजी से “हीट चैंबर” में बदल रहे हैं, जहां कंक्रीट, अंधाधुंध निर्माण, जंगलों की कटाई, तालाबों के विनाश और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर विकास मॉडल ने प्राकृतिक संतुलन को गंभीर रूप से बिगाड़ दिया है। इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव गरीबों, श्रमिकों, बुजुर्गों और कमजोर समुदायों पर पड़ रहा है, जिनके पास बढ़ती गर्मी से बचने के संसाधन नहीं हैं।

भोपाल जैसे शहरों में घटता ग्रीन कवर और बढ़ते तापमान इस बात का संकेत हैं कि यदि विकास की वर्तमान दिशा नहीं बदली गई, तो आने वाले वर्षों में जीवन और आजीविका दोनों पर गंभीर खतरा पैदा होगा। सरकारें जलवायु संकट को केवल मौसम की असामान्य घटना बताकर अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकतीं। जब वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि आने वाले दशकों में अत्यधिक गर्मी मानव जीवन के लिए असहनीय हो सकती है, तब केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है; उनके लिए ठोस बजट, राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनभागीदारी आवश्यक है। आज जरूरत है कि विकास की परिभाषा को बदला जाए,पेड़ों, जलाशयों, जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों को बचाए बिना कोई भी विकास टिकाऊ नहीं हो सकता।

यदि अभी भी सरकारें, उद्योग और समाज नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसे भारत का सामना करना पड़ेगा, जहां गर्मी केवल असुविधा नहीं बल्कि अस्तित्व का संकट बन जाएगी।

राज कुमार सिन्हा

बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

सादर प्रकाशनार्थ