
Twisha Sharma Death: जीने तो ढंग से दिया नहीं, तसल्ली से मरने तो दो मुझे…
प्रवीण दुबे
नमस्कार,
मैं त्विशा शर्मा.. जब तक दुनिया में थी, तब थोड़ा कम परिचय था मेरा लेकिन 12 मई को इस दुनिया से जाने के बाद देश भर में परिचय की मोहताज़ नहीं हूं.. जिस भी टेलीविजन की स्क्रीन पर आ रही हूं,उसे भरपूर टीआरपी दे रही हूं.. जिस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आ रही हूं उसे PV और UV भर भर कर दे रही हूं… मगर ये सब मरने के बाद मर मर कर दे रही हूं.. क्या जीवन था मेरा, क्या क्या मैंने किया, क्या क्या कर सकती थी.. कितनी क़ाबिल थी, कितनी नकारा थी.. ये सब कुछ आप मेरे बिना एक शब्द बोले जान चुके हैं.. मैं मरी या मार दी गई ख़ैर ये तो मैं बेहतर जानती हूं और ये भी जानती हूं कि इसके पक्ष और विपक्ष में ढेरों लोग खड़े हैं जो फ़ानी दुनियावी न्याय मुझे दिला कर ही दम लेंगे.. मगर मैं आपसे रूहानी दुनिया का न्याय मांग रही हूं.. दस दिन होने को आए मेरे जिस्म को ठंडे हुए, तबसे लगातार मेरे शव को ठंडा कर करके रखा जा रहा है.. देश की धरती का मानव अधिकार कहता है कि तीन दिन अधिकतम रखने के बाद अंतिम संस्कार हो जाना चाहिए..आसमान के ऊपर के नियमों की किताब गरुण पुराण कहती है कि मुझे लेने आए यमदूत ज्यादा इंतज़ार नहीं कर सकते मेरी आत्मा को साथ ले जाने के लिए.. मगर मैं एक बक्शे में बंद हूं… क्यों… क्योंकि न्याय मांगने और कथित तौर पर न देने की ज़िद में दोनों पक्ष ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है… क्या प्रारब्ध लिखा कर आई थी मैं जो मेरा शव अंतिम संस्कार को तरस रहा है… जीने तो ढंग से दिया नहीं, तसल्ली से मरने तो दो मुझे… मेरी आत्मा भी भूखी प्यासी है, उसे पिंडदान के जरिए भोजन और घट बांधकर पीने का पानी तो दो.. जीवित रहने के दौरान की क्रूरता तो मैं झेल गई लेकिन मरने के बाद के संस्कार तो मेरे करो… मैं ज़िंदा रहने वाले कष्टों से ज़्यादा कष्ट में अब हूं..भगवान के लिए मुझे मुक्त करो अब… अपने क्षुद्र स्वार्थों का टूल दोनों पक्ष मत बनाओ… मुझे पता है आपका जीवन अभी बहुत है… लड़ते रहना अंतिम सांस तक दोनों पक्ष… मगर भगवान के लिए अब तो मुझे मुक्त करो… मुक्त करो… जाने दो अंतहीन यात्रा पर.. मैं दोनों पक्षों के हाथ जोड़ती हूं…
– अभागी लड़की
वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण दुबे की वाल से
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