इंदौर लेखिका संघ की परिचर्चा : यदि बेटी सुसराल में परेशान की जा रही है तो मायके की भूमिका क्या होना चाहिए?

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प्रसंगवश-

इंदौर लेखिका संघ की परिचर्चा : यदि बेटी सुसराल में परेशान की जा रही है तो मायके की भूमिका क्या होना चाहिए?

भोपाल में मॉडल और पूर्व मिस पुणे ट्विशा शर्मा की मौत का मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है. शादी के महज 5 महीने बाद फंदे से लटकी मिली ट्विशा शर्मा की मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. परिवार जहां इसे दहेज प्रताड़ना और मानसिक उत्पीड़न से जुड़ा मामला बता रहा है, यह प्रसंग आज त्विषा शर्मा का है कल किसी और लड़की का .दहेज़ ,लड़की का चरित्र कारण बहुत सारे हो सकते हैं लड़की की जान जाने के ,मायके वाले दहेज़ प्रताड़ना की बात करते है तो ससुराल वाले कभी बिमारी ,कभी चरित्र को मुद्दा बनाकर बाख निकलते है . जीने लायक उम्र की बेटियाँ बेमौत मार दी जाती है ,सवाल बहुत से है पर एक सवाल यह भी है कि कई  बार बेटियों को  मायकेवाले भी तो साथ नहीं देते ? इंदौर लेखिका संघ द्वारा इस विषय पर एक परिचर्चा आयोजित की गई और बड़ी संख्या में इस विषय पर महिलाओं ने विचार व्यक्त किये .आइये देखते हैं क्या सोचती है शहर की प्रबुद्ध महिलाएं –  

1.…त्विषा की माँ…उनका रुदन मन चीर रहा है -श्रुति अग्रवाल

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पितृसत्ता से ग्रसित पुरुषों से ज़्यादा भयावह पितृसत्ता ओढ़ी महिलाएँ होती हैं । ये अपने साथ साथ पूरी पीढ़ी को ले डूबती हैं । मेरी दादी जी कहती थीं हर मुहावरा- कहावत…लंबे अनुभव पर आधारित होती हैं । जीवन का सार होता है । पिछले कुछ दिनों से महसूस हो रहा है : महिला की दुश्मन महिला होती है , इस मुहावरे का जन्म कई मासूम महिलाओं की मृत देह पर हुआ होगा । एक माँ की क्रूरता- एक माँ की लाचारी के बाद दिमाग़ उलझ सा गया है …त्विषा की माँ…उनका रुदन मन चीर रहा है । अभी बस पाँच महीने पहले ही तो बेटी को लाल – गुलाबी- पीले जोड़े में संजा- संवरा- ख़ुश- चंचल देखा था …उन्हीं ने बिटिया की ठंडी-नीली-काली हुई मृत देह को कैसे देखा होगा?बेटियों के लिए जन्म के समय से सोना और दहेज जोड़ने की जगह उनके कैरियर का सोचिए । उन्हें संपत्ति में बराबर का हिस्सा दीजिये । साथ ही याद रखिए आप बेटी को ससुराल से वापस ला सकते हैं , श्मशान से नहीं । इसलिए यह बकवास बोलना भी बंद कीजिए कि डोली में ससुराल जा रही , अर्थी में बाहर निकलना ।

2.सबसे पहले स्त्री के सामाजीकरण को ही बदला जाना चाहिए-डॉ. स्वाति तिवारी

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सबसे पहले स्त्री की ही मानसिकता को बदला जाना चाहिए ,माँ ,सास ,नन्द ,बहने सब घटना के घट जाने के बाद का विलाप करती दिखती हैं ,लेकिन क्या घर की स्थिति से सास ,ननद या लड़की के माँ ,बहने वाकिफ नहीं होंगी ?क्या वो सखी सहेलियां जो शादी के बाद खोद खोद कर पूछ ताछ करती हैं क्या उन्हें दुखद वैवाहिक जीवन की कोई झलक सहेली की उदास आवाज ,चेहरे या भावों में दिखाई नहीं दी होगीं .कहते है स्त्री के पास सिक्स्सेंस होता है ,तो फिर यह उपेक्षा कैसे हो जाती है .क्यों नहीं माँ या अन्य स्त्रिया जाकर स्थिति का जायजा लेती हैं . कई बार सिर्फ किराए को ,पैसे खर्च होने को या लड़की वापस आजाने पर विवाह के खर्च को लेकर भी रुके रहते है सहने दो एक दिन आदत हो जायगी ,सबको एडजेस्ट करना पड़ता हैं ,हमने तो घूँघट में दो -दो किलो आटे की रोटियां चूल्हे पर सेंकी है .इस तरह के वाक्य कहे जाते हैं ,हमने तो ब्याह दी अप खुद अपना घर संभालो .और बाद में विलापकरती हैं .सबसे पहले स्त्री के सामाजीकरण को ही बदला जाना चाहिए . सामाजीकरण की एक सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह जीवन-पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है। व्यक्ति की परिस्थिति व सामाजिक भूमिकाएँ बदलती रहती हैं और उनके अनुरूप व्यवहार के लिए उसे आचरण तथा व्यवहार के नये प्रतिमान सीखने पड़ते है.मायके को सबसे पहले अपनी बेटी के जीवन को सुरक्षित करना चाहिए . उस पर विश्वास करना चाहिए .और समाधान के लिए बेटी के साथ खड़े होना होगा .

  3.बेटी के लिए मायके के दरवाज़े खुले रहने चाहिए -विम्मी मनोज

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“मायके से डोली उठती है और ससुराल से अर्थी” — यह कथन एक ऐसे दौर की सोच को दर्शाता है, जहाँ विवाह के बाद बेटी का जीवन पूरी तरह ससुराल तक सीमित मान लिया जाता था। उस समय परिस्थितियाँ भिन्न थीं; सामाजिक संरचना भी अलग थी। उद्देश्य यह था कि बेटी नए परिवेश में सामंजस्य स्थापित करे और अपने वैवाहिक जीवन को धैर्य व समझदारी से निभाए। किन्तु आधुनिक युग में बेटी केवल किसी एक घर की सदस्य नहीं होती, बल्कि वह दोनों परिवारों के स्नेह, सम्मान और सहयोग की अधिकारी है। मोबाइल और संचार के अन्य माध्यमों ने दूरियों को कम कर दिया है, इसलिए अब वह आवश्यकता पड़ने पर अपने माता-पिता से सलाह और भावनात्मक संबल प्राप्त कर सकती है।निश्चित ही, ससुराल के हर छोटे-बड़े विषय में मायके का अनावश्यक हस्तक्षेप उचित नहीं, परंतु यदि बेटी किसी मानसिक, भावनात्मक या सम्मान से जुड़ी परेशानी से गुजर रही हो, तो उसे केवल “समझौता” कहकर अनदेखा कर देना भी उचित नहीं। बेटी के लिए मायके के दरवाज़े खुले रहने चाहिए — छोटी-छोटी बातों पर रूठकर लौट आने के लिए नहीं, बल्कि उसके सम्मान, सुरक्षा और आत्मसम्मान के साथ जीने के अधिकार के लिए। माता-पिता अपनी बेटी के स्वभाव और सहनशीलता को सबसे बेहतर जानते हैं, इसलिए उन्हें परिस्थितियों का विवेकपूर्ण आकलन करना चाहिए। साथ ही, बेटियों को केवल शिक्षित ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से दृढ़, आत्मनिर्भर और जीवन की वास्तविक परिस्थितियों का सामना करने योग्य बनाना भी आवश्यक है। मानवीय संवेदनाओं और वर्तमान सामाजिक वास्तविकताओं के अनुरूप परम्पराओं को नया स्वरूप देना आज की आवश्यकता हैं।-

4.“बेटी का मायका : सहारा, संवेदना और संबल”-डॉ. प्रतीक्षा शर्मा

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आज के समय में जब बेटियाँ शिक्षित, आत्मनिर्भर और जागरूक हो रही हैं, तब भी कई घरों में वे मानसिक, शारीरिक या भावनात्मक प्रताड़ना का शिकार बनती हैं। ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि मायके की भूमिका क्या होनी चाहिए? हाल ही में चर्चित “ट्विशा केस” ने इसी प्रश्न को समाज के सामने गंभीरता से रखा है।
कई बार समाज यह मान लेता है कि विवाह के बाद बेटी का घर केवल ससुराल ही है और मायके वालों को हर परिस्थिति में “समझौता कर लो” कहकर उसे वापस भेज देना चाहिए। यही सोच कई बेटियों को भीतर से तोड़ देती है। यदि बेटी बार-बार अपनी पीड़ा व्यक्त कर रही हो, उसके व्यवहार में भय, अवसाद या असहायता दिखाई दे रही हो, तो मायके का पहला कर्तव्य है कि उसकी बात को गंभीरता से सुने। केवल समाज की बदनामी या रिश्तों के दिखावे के कारण उसकी वेदना को अनदेखा करना अत्यंत घातक हो सकता है।
ट्विशा जैसे मामलों से यह स्पष्ट होता है कि जब बेटी को समय पर भावनात्मक सहारा नहीं मिलता, तब वह स्वयं को अकेला समझने लगती है। मायका केवल जन्म देने वाला घर नहीं होता, वह बेटी का सुरक्षा-कवच भी होता है। माता-पिता को चाहिए कि वे बेटी को यह विश्वास दिलाएँ कि अन्याय सहना उसकी मजबूरी नहीं है और हर परिस्थिति में उसका अपना परिवार उसके साथ खड़ा है। यह समर्थन कई बार किसी बड़ी दुर्घटना को रोक सकता है।
हालाँकि इसका अर्थ यह भी नहीं कि हर छोटी बात पर रिश्ते तोड़ने की सलाह दी जाए। समझदारी इसी में है कि पहले संवाद, समझाइश और पारिवारिक समाधान का प्रयास किया जाए। यदि समस्या सामान्य मतभेद की हो तो धैर्य और परिपक्वता से उसे सुलझाया जा सकता है। लेकिन जहाँ प्रताड़ना लगातार हो, आत्मसम्मान कुचला जा रहा हो या बेटी की सुरक्षा खतरे में हो, वहाँ मायके को दृढ़ता से उसके पक्ष में खड़ा होना चाहिए।
समाज को भी यह समझना होगा कि बेटी का “डोली में जाना और अर्थी में लौटना” जैसी पुरानी सोच अब अमानवीय बन चुकी है। विवाह जीवन का महत्वपूर्ण संबंध है, पर किसी की जान और मानसिक शांति से बड़ा नहीं। एक संवेदनशील मायका बेटी को केवल जन्म नहीं देता, बल्कि कठिन समय में जीने का साहस भी देता है।
अंततः, बेटी के लिए मायका वह स्थान होना चाहिए जहाँ उसे बिना किसी भय, संकोच और निर्णय के सुना जाए। क्योंकि कभी-कभी एक विश्वास भरा वाक्य — “बेटा, हम तुम्हारे साथ हैं” , किसी टूटती हुई जिंदगी को संभाल सकता है।

5.”औरत या तो महत्वकांक्षी हो सकती है या विवाहित”-डॉ निशी मंजवानी

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आज के परिप्रेक्ष्य में यह कथन मुझे उपयुक्त लगता है। अभी हाल ही की घटना को देखते हुए, जहाँ एक महत्वकांक्षी महिला का एकाएक निधन हो जाना, कारण अस्पष्ट होना।एक समय था जब स्त्रियों को अधिक बड़े सपने देखने की अनुमति नहीं थी, क्योंकि यदि वह स्वयं की इच्छाओं के लिए ही जीएगी तो परिवार का ख्याल कौन रखेगा! पुरूष सदा दंभी तथा स्वयं की स्वार्थ पूर्ति हेतु जीता आया है। ऐसे में स्त्री भी यदि केवल अपनी स्वार्थ सिद्धि हेतु सोचेगी तो परिवार का निर्माण कैसे संभव हो पाएगा? परंतु परिवार में सुख और शांति बनाए रखने का दायित्व केवल एक औरत का है?

आज पीड़िता या मृत महिला की माँ क्या सोच रही होगी? क्या उसे ग्लानि होती होगी, कि उसने अपनी बेटी को स्वच्छंद बनाया? या क्रोधित होती होगी ससुराल पक्ष पर कि उन्होंने बेटी को बहू की ज़िम्मेदारी उठाने को बाध्य किया? क्या यह संभव है कि एक बेटी सदा ही बेटी बनकर रहे? क्या परिवार बदल जाने से पद भार भी नहीं बदल जाता? क्या ये उम्मीद कि हमारी बेटी को वैसा ही रखा जाए जैसे वह विवाह पूर्व रहती थी; सही या संभव है?

ऐसे हज़ारों विचार और प्रश्न मस्तिष्क में बवंडर लाते हैं। पर एक बात जो हम बिसार जीवन से चुके हैं, वह है ‘संतुलन’। इस एक गुण की कमी ने संसार का समीकरण बिगाड़ दिया है। आज ज़माना हो गया है कि, हर क्षण की खबर हम अपनों से या अपनी माँ से साझा करते हैं, और चूंकि वह माँ है, वह केवल हमारे ही लिए सोचेगी और हमारे भले के लिए ही कोई सुझाव देगी। लेकिन जब बेटी किसी और परिवार से जुड़ चुकी हैं तो क्या केवल एक ही पक्ष के नज़रिए से किसी मुद्दे पर विचार करना या राय देना सही है!
दूसरा पक्ष यह कि कई बार समाज में प्रतिष्ठा को देखते हुए माता पिता बेटी की परेशानी को नजरअंदाज कर, उसे हालातों से समझौता करने की उम्मीद करते हैं, जिसका परिणाम सदा जीवन का अंत ही मिलता है।
बहरहाल आज की पीढ़ी के लिए यह बात समझना आवश्यक है कि जहां बहुत कुछ पाने की चाहत है, वहां कुछ खोने का साहस होना भी अवश्य होना चाहिए।स्वतंत्रता की सीमा होती है, नहीं तो वह स्वच्छंदता बन जाती है। आज की अधीर पीढ़ी सामंजस्य को महत्त्व ना देते हुए केवल यदि सपनों पर ही केंद्रित रहेगी तो परिवार शब्द महत्वहीन रह जाएगा। ससुराल और मायके को पक्ष विपक्ष के कटघरे में खड़ा करके रिश्तों को न्याय नहीं मिल सकता। यह बात लड़का और लड़की दोनों पर लागू होती है।

6.लव-मैरिज हो या सेटल मैरेज बेटी को हर माता-पिता यह सिख दें कि तुम्हें थोड़ा भी व्यवहार ख़राब लगें तो हमें हर बात बताओं -प्रभा तिवारी

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जब बेटी सुसराल जाती थी तो उसे यही कहा जाता था कि बेटा पियर सुसराल में जमीन आसमान का अन्तर होता है चाहे गरीब हो या अमीर सबके स्वभाव में अन्तर होता है विचारों में, रीति रिवाज में इसलिए हर बात पर रिएक्ट मत करना शुरू में थोड़ा सहन कर लोगी तो खुशी खुशी जीवन व्यतीत कर लोगी और सुसराल वाले का दिल जीत लोगी।
लेकिन आज का समय आज के आधुनिकता का चोला ओढ़े लड़के के माता-पिता, लड़का ऊपरी दिखावा और अंदर वही दकियानूसी,शकिया दिमाग के इंसान परिवार ज्यादा देखने में आ रहा है ऐसे में कभी कभी माता पिता यह जज एक दम नही कर पाते कि अंदर से ये परिवार केसा है क्योंकि हर मां पिता सोचते है अपने पास बहुत लाड़ प्यार से पली है बेटी इसलिए सास,ससूर दामाद की छोटी सी बातों को रियेक्ट कर लेती है और कोई कोई बेटी आज भी यही सोचती हैकि अपनी तकलीफ बताऊंगी तो माता-पिता को तकलीफ होगी।
इधर एक यह सच्चाई भी है कि अगर समधी अच्छे होते है दामाद भी अच्छा होता है तो कोई कोई माता पिता बेटी की जरा सी तकलीफ में भी अनावश्यक रूप से इंटरफेयर करते हैं और वहां बेटी का भविष्य बिगड़ जाता है।
मां आंखें बंद करी है उसकी परेशानी को समझ ही नहीं रही है, क्योंकि दमाद उसके सामने बहुत अच्छा व्यवहार करता है । बेटी की मां बेटी को ही उलाहना दे रही है कि इतना बढ़िया परिवार मिला सज्जन डाक्टर पति मिला और तू उनकी बात मान नही रही है।आजकल वो पहले का जमाना गया जहां दोनों परिवार कमियों को नजरंदाज कर जिंदगी गुजार लेते थे।आज चाहे लव-मैरिज हो या सेटल मैरेज बेटी को हर माता-पिता यह सिख दें कि तुम्हें थोड़ा भी व्यवहार ख़राब लगें तो हमें हर बात बताओं ये मत सोचना कि हमें तकलीफ होंगी और हम समझ ही नही पाएं कि तुम कितनी प्रताड़ित हो रही हो एक दिन तुम्हारी जीवन लीला ही सुसराल वाले समाप्त कर दें उससे पहले तुम बिना संकोच अपने माता-पिता के पास लोट आना या हमें सतर्क कर देना कि आपकी बेटी के साथ क्या हो रहा है जिससे हम तुम्हें खो ना दें।

7.फिर बलि चढ़ गई दो बेटियाँ-“कविता चौहान”

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बेटियों के लिए बड़े-बड़े स्लोगन लिखने वाले बेटियों पर प्रेम दिखलाने वालों समाज अभी भी नहीं बदला है। बेटियों की जो बुरी दशा वह अभी भी चल रही है कुछ लालची भेड़िये अभी भी बेटियों को दहेज की बलि चढ़ा ही रहे हैं। उनका जीवन खिलवाड़ करके समाप्त कर रहे हैं,लेकिन इसमें समझने वाली बात यह है कि जो माता-पिता बेटियों को पालते है,शिक्षा देते हैं पढ़ाते लिखाते हैं वे उन्हें एडजस्टमेंट की सीख क्यों देते हैं?
और एडजस्टमेंट भी किस सीमा तक ?क्या इसका भी कोई पैमाना निर्धारित है अथवा जान जाने तक करना होगा ?दीपिका नागर,नोएडा,(उ.प्र) की यह बेटी जब ससुराल गई तो उससे 50 लाख नगदी और फॉर्च्यूनर की मांग कर प्रताड़ित किया जाने लगा।वह अपने घर वापस आना चाहती थी ।लेकिन उसकी माँ द्वारा उसे यह कहा गया की एडजस्ट करो । वह खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रही थी, इसलिए उसने माँ से कहा था कि मुझे यहां से ले चलो । उसकी बातों को गंभीरता से लेने की बजाय सीख दे दी गई। परिणाम सबके सामने है। दीपिका के सिर के अंदर यानी मस्तिष्क के मध्य और बाईं ओर खून का थक्का जमा हुआ था. मार-पीट इस कदर बेरहमी से की गई थी कि शरीर के अंदर मौजूद तिल्ली फट चुकी थी और अंदरूनी अंगों में भारी ब्लीडिंग हुई थी. चोटों की तीव्रता इतनी भयानक थी कि शरीर का दिल बिल्कुल खाली पाया गया.अगर दीपिका की बातों को गंभीरता से ले लिया होता तो आज दीपिका जिंदा होती।

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दूसरी घटना भोपाल की ट्वीशा शर्मा की है उसकी सास एक जज थी। अब जज के यहां पर भी बेटियां सुरक्षित नहीं रही
ट्विशा को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और उनके चरित्र पर सवाल उठाए गए।उसके शरीर पर भी चोट के निशान पाये गयेउसकी मौत के बाद भी उसके सास का यह बयान चौंकाने वाला था कि ट्वीशा पौधों में पानी नहीं डालती थी।क्या उसकी मृत्यु मात्र एक छोटी सी घटना थी ? जो घट गई और इतनी सहज थी कि उसे भूला भी दिया जाये।
सवाल यह है कि समाज में पढ़े लिखे और धनी वर्ग भी पैसे के लालच में इतना गिर चुके हैं कि वह किसी की जान लेने में भी शर्म नहीं कर रहे, मानव के नाम भी कलंक है । यह घटनायें मानवता को शर्मसार कर रही है।यहाँ पर यही कहना उचित होगा कि यदि आपकी औकात किसी को रखने की नहीं है तो विवाह मत करो लेकिन किसी की बेटी का जीवन मत छीनो ।

8.परिवार को बेटी द्वारा बताई गई हर बात का गंभीरता से विश्लेषण करना चाहिए-डॉ. रश्मि जोशी

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बेटी का सर्वांगीण विकास और एक सशक्त महिला के रूप में उसका बनना न केवल परिवार की जिम्मेदारी है, बल्कि उसका सम्पूर्ण समाज के उज्ज्वल भविष्य की नींव होती है।उसे ऐसा वातावरण मिलना चाहिए जहाँ वह बिना भय अपनी हर बात कह सके।विशेष रूप से जब परिवार साथ खड़ा होता है, तब कठिन परिस्थितियाँ भी कमजोर पड़ जाती हैं।बेटियों की सुरक्षा, आत्मसम्मान और आत्मविश्वास किसी भी सामाजिक दिखावे से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।

यदि बेटी ससुराल में परेशान की जा रही है, तो सबसे पहले ऐसी स्थिति की तैयारी बचपन से ही होनी चाहिए। क्योंकि मायका बेटी का जन्मस्थान है, उसे ऐसा वातावरण मिले जिसमें वह अपनी परेशानी खुलकर कह सके। वह कहीं भी रहे, पर अपने परिवार से जुड़ी रहे। उसे यह भय न हो कि यदि वह कुछ कहेगी तो परिवार उसे परखेगा या दोष देगा।साथ ही यह भी आवश्यक है कि यदि कभी परिस्थितियाँ विपरीत हों, तो उनसे युक्तिपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयास किया जाए तथा अपने परिवार को सूचित कर सलाह ली जाए। स्वयं की सुरक्षा सर्वोपरि है, किसी भी सामाजिक व्यवस्था से बढ़कर।

घर में ऐसा वातावरण होना चाहिए कि बेटियाँ स्वयं को घर का बच्चा समझें, केवल बेटा या बेटी, लड़का या लड़की नहीं। इससे यदि घर में भाई-बहन हों, तो सबका समग्र विकास होता है। बड़े होकर वे कहीं भी जाएँ चाहे पढ़ाई के लिए, काम के लिए या ससुराल उनमें आत्मविश्वास प्रबल होना चाहिए। साथ ही परिवार के साथ और विश्वास का भाव भी दृढ़ होना चाहिए।

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अब यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है यदि बेटी ससुराल में हो। क्योंकि एक ओर वह उसका अपना घर भी है, वहीं दूसरी ओर नया स्थान और नए लोग भी हैं। इसलिए उसे बिना किसी पूर्वाग्रह के अपने विवेकपूर्ण दृष्टिकोण को जागृत रखना होगा। प्रारंभिक सामंजस्य उत्साह और सहजता के साथ बनाना होगा, लेकिन यदि कहीं कुछ गलत उसके स्वयं के अस्तित्व पर हावी होने लगे, परिवार परिवार न लगकर असहज स्थान प्रतीत होने लगे, लोगों का व्यवहार प्रेम या ईर्ष्या जैसे मानवीय कारणों से इतर से यदि उसे लक्ष्य बनाकर किया गया प्रतीत होता हो तथा अवांछनीय लगने लगे, तो तुरंत अपने परिवार को सूचित करना चाहिए।परिवार को भी बिना किसी पूर्वाग्रह के उसकी बातों को ध्यान से सुनना, समझना और त्वरित कार्यवाही करनी चाहिए। हो सकता है कि प्रारंभ में कोई स्पष्ट संकेत न दिखाई दे, फिर भी बेटी को आत्मसम्मान, आत्मरक्षा और निर्भीकता जैसे मूलभूत सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करना चाहिए। उसे सजग भी रहना है और सहज भी।

दूसरी ओर परिवार को बेटी द्वारा बताई गई हर बात का गंभीरता से विश्लेषण करना चाहिए, अपने स्तर पर जानकारी प्राप्त करनी चाहिए, उसके घर जाकर स्वयं परिस्थिति का निरीक्षण किया जाए तथा कुछ भी गलत लगने पर तुरंत कार्यवाही की जाए, जैसे ससुराल पक्ष के अस्वीकार्य व्यवहार पर सीधे प्रश्न करना और उनके व्यवहार एवं प्रतिक्रिया को ध्यान से समझना। क्योंकि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी को प्रताड़ित कर रहा है, तो उसकी प्रतिक्रिया सामान्य नहीं होगी।

कई बार ऐसा भी हो सकता है कि महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार उनके पारिवारिक वातावरण का हिस्सा बन चुका हो। ऐसी स्थिति में परिवार को दृढ़ता से अपनी बेटी के साथ खड़े होकर उसका विरोध करना चाहिए।

क्योंकि ससुराल में होने वाले उत्पीड़न की परिणति यदि आत्महत्या जैसे दुखद कदम के रूप में दिखाई देती है, तो इसका अर्थ है कि पीड़ित स्वयं को अकेला, असहाय, निराश और हताश महसूस करने लगा है। ऐसे समय में सबसे अधिक आवश्यक है कि बेटियों को हर परिस्थिति में अपने परिवार का साथ, विश्वास और सुरक्षा अपने साथ महसूस होती रहे।
एक सुव्यवस्थित ,स्नेहिल परिवेश में की गई परवरिश एवं सहायक सामाजिक माहौल, न केवल एक बेटी को किसी भी परिस्थिति में स्वयं को सशक्ता से प्रस्तुत करने में सक्षम बनाएगी, बल्कि ऐसी बेटियाँ स्वयं की रक्षा के साथ साथ एक सुदृढ़, सुव्यवस्थित समाज बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेंगी।

9.गलत व्यवहार को चुपचाप सहना “संस्कार” नहीं होता-डाॅ.दविंदर कौर होरा

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कहा गया है कि “भगवान हर किसी को बेटियां नहीं देता। जिनसे वह बहुत प्रसन्न होता है, उन्हें ही बेटियों की रहमत से नवाजता है।हिन्दु धर्म में बेटियों की पूजा की जाती है। बेटियां दो कुल को तारने वाली मानी जाती हैं।बेटी मायके में सब की लाडली होती है। मां- पिता, भाई की लाडली शादी के बाद बहू .., पत्नी के रूप में ससुराल में जाती है, जहां वह नवकुल का वरण करती है। उसी से आगे कुल बढ़ता है।आज के समय में बेटियों के साथ दुर्व्यवहार, मानसिक उत्पीड़न, दहेज का दबाव, भावनात्मक हिंसा और ससुराल में प्रताड़ना जैसी खबरें चिंताजनक हैं।यह केवल एक परिवार की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज के संस्कार, सोच और जिम्मेदारी का प्रश्न है।

इसमें माता-पिता की भूमिक बेहद अहम है। माता-पिता केवल बेटी को विदा नहीं करते, वे उसे अगले जीवन के लिए तैयार भी करते हैं। कि ” वह नए घर जाकर वहां के लोगों को अपनेकर और स्नेह से अपना बनाएगी। बेटी को सहनशील बनने की घुट्टी पिलाई जाती रही है। लेकिन आज समय बदल गया है तो बेटियों को यह सिखाना जरूरी है कि वह सम्मान की अधिकारी है, बोझ नहीं है । विवाह समझौते का नाम नहीं है। साझेदारी का रिश्ता है। गलत व्यवहार को चुपचाप सहना “संस्कार” नहीं होता।
“सब जगह ऐसा ही होता है”,“घर बचाना तुम्हारी जिम्मेदारी है।”और तो और यदि पति शराब पीता है या पीटता है, तब भी गलती लड़की की ही बताई जाती है।यहीं सबसे बड़ी गलती होती है।

माता – पिता के साथ समाज को भी अब अपनी सोच बदलने की जरूरत है। अत्याचार को “घरेलू मामला” कहकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इसमें पडोसियों, रिश्तेदारों और मित्रों की भूमिका भी अहम है।उन्हें संवेदनशील बनना चाहिए और ऐसे समय पर नजरअंदाज करने की बजाय निष्पक्ष रूप से सही के साथ खड़े रहना चाहिए। पंचायतों, स्कूलों और सामाजिक संस्थाओं को बेटे, – बेटी के फर्क को खत्म करने और अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलानी चाहिए।
लड़कियों की शिक्षा और आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। विवाह को दिखावे और लेन-देन से दूर रखा जाना चाहिए। दहेज प्रथा का चलन बंद होना चाहिए। ताने, अपमान और डर मिलें, तो वही घर उसके लिए सबसे कठिन जगह बन जाता है।समाज की असली प्रगति ऊँची इमारतों से नहीं,बल्कि इस बात से मापी जाएगी कि उसकी बेटियाँ कितनी सुरक्षित, सम्मानित और खुशहाल हैं।

10. जहां बेटी सही हो उसे सहारा दिया जाए हर वक्त के समझौते से बेटियां टूट जाती है- निर्मला मुंदडा

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पुरुष हमेशा से ही दंभी और स्वार्थी रहा है. अपनी इच्छा पूर्ति के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है. परंतु नारी त्याग और बलिदान की मूरत मानी गई है. उसे त्याग और एडजस्ट की शिक्षा दी गई है. और तो और हमारे समाज में आज भी हमेशा नारी को ही दोषी ठहराया जाता है.

यह हमारे समाज का कटु सत्य है. क्योंकि औरत ही औरत की शत्रु होती है. झगडे हमेशा सास बहू के चलते हैं. क्योंकि औरतों की चाहते भी बढ़ गई. लड़कियां अपना परचम लहराना चाहती है और अपनी काबिलियत से उन्होंने अपना परचम फहराया भी है. परंतु यह सफलता कई लोगों को बर्दाश्त नहीं होती है की नारी आगे बढ़े.

कालांतर में नारी पर कड़े पहरे थे नारी स्वतंत्र नहीं परतंत्र थी. उसे किसी भी बात पर सलाह देने का अधिकार नहीं था. जो नियम बना दिए गए थे उसी पर चलना था. परंतु नारी शिक्षा ने उसे गुलामी की जंजीरो से आजादी तो दिलवा दी परंतु नारी आज भी स्वतंत्र नहीं है वह आज भी बेडियो मैं जकड़ी हुई है. हम समझते हैं प्रताड़ना बंद हो गई परंतु पढ़ाई के बाद शायद दुगनी हो गई. बस प्रताड़ना का स्वरूप बदल गया सभ्य कहलन वाले समाज में संस्कार तो बचे ही नहीं. विवाह एक संस्कार है. परंतु जान की कीमत देकर रिश्ता बचाना गवारा नहीं.

आज भी समाज में और ससुराल में लड़कियों को टॉर्चर किया जाता है. एडजेस्ट भी एक सीमा तक ही किया जाता है. आज भी लड़कियों को दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता है. समझदारी से दहेज मांगा जाता है और ना मिले तो मौत के घाट उतार दिया जाता है पढ़ लिखकर भी हम अपनी मानसिकता नहीं बदल पाए. यदि समझदारी से चला जाए तो जहां बेटी गलत तो उसे समझाया जाए. परंतु जहां बेटी सही हो उसे सहारा दिया जाए हर वक्त के समझौते से बेटियां टूट जाती है. और उनका आत्म सम्मान भी. समय रहते समाज को जागना पड़ेगा. और उचित निर्णय भी लेना पड़ेगा. बेटियों की रक्षा का भार भी उठाना पड़ेगा. वरना बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा व्यर्थ हो जाएगा. समय रहते सभी को जागना पड़ेगा. वरना हमारी बेटियों की यूं ही बलि चढ़ती रहेगी .

11.अपनी बच्ची के भविष्य को देखते हुए उसे घर लाकर आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान से जीना सिखाएं-माधुरी सोनी मधुकुंज

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विवाह संस्कार दो परिवारों का जीवन भर निभाया जाने वाला व्यवहार है जिसमें सुख दुख का गणित साझा समझाइश से किया जाता है।अक्सर अपरिपक्व बुनियाद रिश्तों को बोझ लगने लगती हे,जिसमें मायके का ज्यादा दखल बेटी के ससुराल में अच्छा नहीं समझा जाता।
परंतु यदि बेटियों को ससुराल में बेवजह परेशान किया जाता है तो प्रथम प्रयास यही होना चाहिए कि कहीं गलती बेटी की और से तो नहीं?
छोटी छोटी बातों को बेटी को नजरअंदाज करना सिखाएं ज़रूर परंतु रोज रोज़ के ताने उसके आत्मसम्मान को चोट और उसकी जरूरत पूर्ति के दायित्वों हेतु दोनों पक्षों को मिल बैठकर सुलझाया जा सकता है।यदि फिर भी बात बिगड़ी हुई रहे तो हर माता पिता को अपनी बच्ची के भविष्य को देखते हुए उसे घर लाकर आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान से जीना सिखाएं क्योंकि टूटते रिश्तों को सिर्फ माता पिता का ही सहारा होता है और बेटियों के आंसू मां से कभी छिपे नहीं रह सकते।

12.आपने कन्यादान किया है बेटी का परित्याग नहीं किया वो आपकी बेटी है -सपना उपाध्याय

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हमारे समाज की विडंबना ही कह सकते है की बेटियों को बचपन से ही पराया धन है ,पराए घर जाना है की घुट्टी घोलकर पिलाई जाती है,अरे क्यों पराई है बेटी आपने उसे जन्म दिया है वो आपका अंश है तो आजीवन रहेगा शादी करके दूसरे घर जाने से वो पराई कैसे हो गई ?आपने कन्यादान किया है बेटी का परित्याग नहीं किया वो आपकी बेटी है और मरते दम तक आपकी बेटी ही रहेगी।
अभिभावक अपनी बेटियों को समाजस्य करना जरूर सीखाये किंतु अत्याचार सहन करना कतई नहीं।अभिभावक बेटियों से बचपन से ही मित्रव्रत रहे जिससे बेटीया बेहिचक अपने मन की बात माँ पिता को बता सके उसे शादी के बाद भी ये अहसास कराए कि ये घर ये कमरा आज भी तुम्हारा है।
दुर्भाग्यवश यदि बेटी ससुराल में सुखी नहीं है तो माता पिता और परिवार को समाज की सोच “लोग क्या कहेंगे “को ताक पर रख कर अपनी बेटी को प्राथमिकता देनी चाहिए ,क्यों की लोग तो हर परिस्थिति में कुछ ना कुछ तो कहेंगे ही।बेटी की जान से हाथ धो बैठने से तो अच्छा है की हम उसे संबल ,आत्मविश्वास देकर उसका मनोबल बड़ा कर उसे नए सिरे से जिंदगी जीने की हिम्मत दे।