जमीन-मकानों की फर्जी रजिस्ट्री में उप पंजीयकों पर FIR और गिरफ्तारी: PS की आपत्ति, DGP को लिखा पत्र 

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जमीन-मकानों की फर्जी रजिस्ट्री में उप पंजीयकों पर FIR और गिरफ्तारी: PS की आपत्ति, DGP को लिखा पत्र 

भोपाल: मध्यप्रदेश में जमीन और मकानों की फर्जी रजिस्ट्री के मामले में पुलिस द्वारा उप पंजीयकों को सीधे आरोपी बनाकर FIR दर्ज करने और उनकी गिरफ़तारी किए जाने पर वाणिज्य कर विभाग के प्रमुख सचिव अमित राठौर ने आपत्ति जताई है। उन्होंने डीजीपी कैलाश मकवाना को पत्र लिखकर कहा कि जब तक उप पंजीयक की भूमिका दुर्भावनापूर्वक होने के ठोस साक्ष्य न हो तब तक उनके खिलाफ FIR आर दर्ज करने या गिरफ्तारी जैसी कार्रवाई नहीं की जाना चाहिए।

पीएस ने डीजीपी को लिखे पत्र में इस मामले में अधीनस्थ अधिकारियों के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश जारी करने अनुरोध किया है। प्रमुख सचिव ने डीजीपी को लिखे पत्र में कहा है कि बिना पर्याप्त आधार के की जाने वाली ऐसी पुलिस कार्रवाई से शासन- प्रशासन की छवि प्रभावित होती है और कर्मचारियों, अधिकारियों का मनोबल भी गिरता है।

पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर की गई रजिस्ट्री से संबंधित व्यक्ति को सम्पत्ति का वैद्य मालिकाना हक प्राप्त नहीं होता। इसके विपरीत ऐसी रजिस्ट्री पुलिस के लिए वास्तविक अपराधी तक पहुंचने का एक महत्वपूर्ण साक्ष्य बनती है। मध्यप्रदेश रजिस्ट्रीकरण नियम 1939 के नियम 36 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति कपटपूर्ण तरीके से या गलत जानकारी देकर भी दस्तावेज प्रस्तुत करता है तो निर्धारित प्रक्रियाओं के पूर्ण होंने पर उप पंजीयक पंजीयन करने के लिए बाध्य होता है।

उल्लेखनीय है कि फर्जी रजिस्ट्री के मामलों में प्रदेशभर में बड़ी संख्या में उप पंजीयकों के खिलाफ प्रकरण दर्ज हुए है। पंजीयन अधिनियम की धारा 34 और 35 के अनुसार उप पंजीयक का दायित्व केवल दस्तावेज निष्पादित करने वाले व्यक्ति की दो गवाहों के माध्यम से पहचान सुनिश्चित करना और उसकी सहमति प्राप्त करना है। वहीं संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 55 के तहत सम्पत्ति के मालिकाना हक की जांच करने की जिम्मेदारी खरीददार की होती है। यदि कोई व्यक्ति धोखाधड़ी कर सम्पत्ति विक्रय करता है तो खरीददार संबंधित व्यक्ति के खिलाफ न्यायालय की शरण ले सकता है हालाकि उप पंजीयक के पास सिविल कोर्ट की तरह सम्पत्ति के वास्तविक स्वामित्व की जांच करने के अधिकार नहीं होते।

हाईकोर्ट ने भी वर्ष 2001 में आरपी यादव बनाम मध्यप्रदेश शासन प्रकरण में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया था कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो उप पंजीयक को यह जांच करने का दायित्व सौपता है कि विक्रेता वास्तव में सम्पत्ति का वैध स्वामी है या नहीं। यदि दस्तावेज से संबंधित सभी प्रक्रिया और औपचारिकता पूरी कर ली गई हो और स्टांप डयूटी का भुगतान कर दिया हो तो भी उप पंजीयक रजिस्ट्री से इंकार नहीं कर सकता। यदि बाद में यह साबित भी हो जाए कि विक्रेता का संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं था तो ऐसी रजिस्ट्री के आधार पर सम्पत्ति का वैध हस्तांतरण नहीं माना जाएगा।