
कोविड काल में इंटरनेट से शुरू हुआ कट्टरपंथ का सफर, भोपाल का युवक कथित ‘लोन वुल्फ’ हमलों की तैयारी तक पहुंचा; एटीएस जांच में बड़े खुलासे
भोपाल : मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से गिरफ्तार किए गए 35 वर्षीय मोहम्मद फराज से जुड़ी जांच में कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। मध्य प्रदेश एंटी टेररिस्ट स्क्वाड (एमपी एटीएस) का दावा है कि कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के दौरान इंटरनेट पर कट्टरपंथी सामग्री तलाशने से शुरू हुई उसकी गतिविधियां धीरे-धीरे उसे कथित तौर पर ऐसे नेटवर्क का हिस्सा बना गईं, जिसका उद्देश्य ‘लोन वुल्फ’ हमलावर तैयार करना था।
एटीएस ने 12 जून को पुराने भोपाल के कांग्रेस नगर (काजी कैंप) क्षेत्र से फराज को गिरफ्तार किया था। चार दिन की पूछताछ के बाद विशेष अदालत ने उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। जांच एजेंसियों के अनुसार फराज पिछले कई वर्षों से संदिग्ध ऑनलाइन गतिविधियों में शामिल था और उस पर केंद्रीय खुफिया एजेंसियों की सूचना के आधार पर नजर रखी जा रही थी।
जांच में सामने आया है कि वर्ष 2021 में कोविड महामारी की दूसरी लहर के दौरान फराज ने इंटरनेट पर जिहाद और कट्टरपंथी विचारधारा से जुड़ी सामग्री पढ़ना शुरू किया था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के देवबंद स्थित एक मदरसे में शिक्षा प्राप्त कर चुके फराज की रुचि धीरे-धीरे ऐसे साहित्य और वीडियोज़ में बढ़ती गई। एटीएस सूत्रों के अनुसार कुछ समय बाद उसका संपर्क एक विदेशी हैंडलर से हुआ, जिसके पाकिस्तान से संचालित होने की आशंका जताई जा रही है। यहीं से उसके कथित कट्टरपंथीकरण की प्रोसेस और तेज हो गई।
जांच एजेंसियों ने फराज के मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल उपकरणों से बड़ी मात्रा में खतरनाक और हिंसक सामग्री बरामद की है। इनमें कथित तौर पर अरबी भाषा का जिहादी साहित्य, सैकड़ों वीडियो, आतंकवादी संगठनों से संबंधित प्रचार सामग्री, मारे गए आतंकियों का महिमामंडन करने वाले वीडियो, विभिन्न देशों में आतंकी प्रशिक्षण के दृश्य और कट्टरपंथी वक्ताओं के भाषण शामिल हैं। अधिकारियों का कहना है कि इन सामग्रियों का उपयोग विचारधारा को प्रभावित करने और नए लोगों को जोड़ने के लिए किया जाता था।
एटीएस के अनुसार फराज यह मानने लगा था कि उसके समुदाय के साथ अन्याय हो रहा है और इसी सोच के कारण वह कट्टरपंथी विचारधारा जिहाद की ओर अधिक आकर्षित हुआ। जांच में यह भी सामने आया है कि वह कथित तौर पर अफगानिस्तान जाने की तैयारी कर रहा था। इसके लिए उसने पासपोर्ट भी बनवा लिया था। एजेंसियों का दावा है कि वह विदेशी हैंडलरों की मदद से अफगानिस्तान पहुंचने और वहां से पश्चिम एशिया के अन्य क्षेत्रों में जाकर सक्रिय होने की योजना बना रहा था।
जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि फराज एक कलोज्ड ऑन लाइन समूह का सदस्य था, जो व्हाट्सएप और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर संचालित होता था। इस समूह की गतिविधियों का संचालन कथित तौर पर विदेशी हैंडलर और बिहार के मधुबनी निवासी 65 वर्षीय इजहार-उल-हक द्वारा किया जाता था। इजहार-उल-हक को हाल ही में बिहार से गिरफ्तार किया गया है। जांचकर्ताओं का मानना है कि वह समूह का प्रमुख या ‘अमीर’ (हेड ) था और कथित तौर पर सदस्यों को वैचारिक रूप से तैयार करने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
सूत्रों के मुताबिक समूह के सदस्य अपनी वास्तविक पहचान छिपाने के लिए मृत पाकिस्तानी आतंकियों के नामों का उपयोग करते थे। जांच में सामने आया है कि फराज कथित तौर पर ‘खालिद सैफुल्लाह’ नाम से सक्रिय था। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इस प्रकार की पहचान का उपयोग सदस्यों के बीच गोपनीयता बनाए रखने और कट्टरपंथी नेटवर्क से जुड़ाव दर्शाने के लिए किया जाता था।
एटीएस का दावा है कि फराज केवल स्वयं तक सीमित नहीं था, बल्कि अन्य लोगों को भी इस नेटवर्क में शामिल करने का प्रयास कर रहा था। इसी क्रम में उसने अपने मदरसे में पढ़े पुराने मित्र और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के ननौता निवासी 38 वर्षीय नईम अब्दुल्ला कुरैशी को भी कथित तौर पर इस समूह से जोड़ा था। नईम को भी गिरफ्तार किया गया है और अदालत ने उसकी एटीएस रिमांड 19 जून तक बढ़ा दी है।
इस मामले में राजस्थान के अलवर निवासी 35 वर्षीय मोहम्मद शाकिर मेव को भी गिरफ्तार किया गया है। जांच एजेंसियों के अनुसार वह भी कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित था और कथित तौर पर देश में कहीं भी ‘लोन वुल्फ’ हमला करने की मानसिकता रखता था। फिलहाल वह 20 जून तक एटीएस हिरासत में है।
जांच एजेंसियों का मानना है कि इजहार-उल-हक से पूछताछ के बाद इस पूरे नेटवर्क के बारे में और महत्वपूर्ण जानकारी सामने आ सकती है। सुरक्षा अधिकारियों को उम्मीद है कि इससे देश के विभिन्न राज्यों में सक्रिय अन्य सदस्यों, विदेशी संपर्कों तथा इसी प्रकार के संभावित मॉड्यूलों की जानकारी मिल सकेगी। फिलहाल एटीएस और केंद्रीय एजेंसियां मामले की गहन जांच में जुटी हुई हैं और डिजिटल साक्ष्यों की भी विस्तृत पड़ताल की जा रही है।




