WhatsApp Image 2025 08 07 At 9.31.47 PM
Home कॉलम

चढ़ावा चोरी: आस्था को बचाने ‘डिजीटल अर्पणम्’ अपनाएं !

8

चढ़ावा चोरी: आस्था को बचाने ‘डिजीटल अर्पणम्’ अपनाएं !

अजय बोकिल

करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केन्द्र अयोध्या के श्रीराम मंदिर में सवा साल से ज्यादा समय से चढ़ावा चोरी का जो बेखौफ खेल चल रहा था, उससे लगता है कि रामभक्तों से ज्यादा चढ़ावा चोरों को भगवान राम पर भरोसा था ‍कि आस्था की जेब से निकले चढ़ावे की जी चाहे जितनी रकम डकारते जाओ, कहीं कुछ नहीं बिगड़ेगा। क्योंकि मंदिर भी राम का, भक्त भी राम के, चढ़ावा भी राम का, चढ़ावा चोर राम के और चोर पकड़ने वाले कोतवाल भी राम के। अब सवाल तो यह है कि राम भक्त आखिर करें क्या? क्या चढ़ावा चढ़ाना बंद कर दें, हाथ जोड़कर दर्शन की इतिश्री कर लें या फिर चढ़ावे को बचाने के कुछ सुरक्षित तरीके अपनाएं? जिस तरह इस भव्य मंदिर में भी चोरों का नेटवर्क सामने आया है, उसका सबक तो यही है कि मंदिर में अब श्रद्धालु को नकदी के बजाए जगह डिजीटल अर्पणम् (चढ़ावे) को ही तवज्जो देनी चाहिए। दानपेटियों को अब कूड़ेदान में डाल दिया जाना चाहिए ताकि आस्था और विश्वास की पवित्रता कायम रखी जा सके। यूं भी आजकल लोग चाय-पान तक का पेमेंट भी यूपीआई से करते हैं तो भगवान की सेवा में आस्था के पत्रम् पुष्पम् के लिए यह तरीका ज्यादा सुरक्षित होगा। वैसे भगवान तो खुद दाता है, भक्त उसे भला क्या देगा। चढ़ावे के रूप में जो कुछ दान पुण्य किया जाता है, वह वास्तव में मंदिर के भौतिक रखरखाव और धर्म के प्रबंधन के लिए होता है। 21 वीं सदी में भगवान से भी यही अपेक्षा है कि वो भक्त की दानशीलता का अकाउंट आनलाइन ही मेंटेन करें। डिजीटल दान का बड़ा लाभ यह है कि आपकी अटूट श्रद्धा पंडे पुजारी, नोट गणक अथवा प्रबंधकों की बुरी नजर से बची रहेगी। जो अभी भी डिजीटल फ्रेंडली नहीं हैं, वो दान काउंटर पर ही चढ़ावा देकर रसीद लें ताकि ट्रस्ट और बैंक की जानकारी में भी। भगवान के हिसाब में रहे ताकि आखिर में पाप-पुण्य के आडिट के समय आपको वांछित ‘वेटेज’ मिल सके। हालांकि मानवीय नीयत के आगे यह तरीका भी सौ फीसदी सुरक्षित नहीं है। लेकिन उस दानपेटी में भोले मन से डाली गई नकदी से तो बेहतर ही है, जो गिनती के दायरे में आने से पहले ही अंटी कर ली जाती है। इस पूरे चढ़ावा कांड में आरंभिक जानकारी में पता चला है कि श्री राम मंदिर में रोजाना 5 करोड़ रू. का नकदी और सोने चांदी का चढ़ावा आ रहा था और इसमें से प्रतिदिन औसतन 10 लाख रू. पर चढ़ावा चोरी गैंग हाथ साफ कर रही थी। अब खबर है कि चढ़ावा चोरी कांड उजागर होने के बाद अब नकदी चढ़ावे की राशि घटकर डेढ़ करोड़ रू. प्रतिदिन पर आ गई है। हैरानी की बात यह है कि स्वयं भगवान के दरबार में हो रही ‍खुले आम चोरी को लेकर किसी के माथे पर कोई शिकन या आत्मग्लानि का भाव नहीं था, जिसमें श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट हो या मंदिर प्रबंधन अथवा सुरक्षा कर्मी। आरंभिक जांच में पुलिस ने 2.8 करोड़ की रकम जब्त भी की है।

यह भी विडंबना है कि राम भक्त जिस चढ़ावे को आध्यात्मिक मोक्ष की आकांक्षा से मंदिर में चढ़ाते रहे हैं, वही पैसा चढ़ावा चोरों की भौतिक समृद्धि और अय्याशी का कारण बन रहा है।

श्री राम मंदिर निर्माण में गड़बडि़यों की शिकायतें तो 37 साल पहले राम शिला पूजन अभियान से आने लगी थीं कि सोने की कई शिलाएं गायब हैं। इसमें कुछ व्यापारियों द्वारा दी गई हीरेजडि़त शिलाएं भी शामिल है। लेकिन तब इसे अफवाह या विघ्न संतोषियों की चाल मानकर दबा दिया गया था। फिर श्रीराम मंदिर जमीन अधिग्रहण मामले में भी भारी हेराफेरी की शिकायतें आईं। लेकिन उसे भी अनसुना कर ‍िदया गया। यूं अब भारी हल्ला मचने के बाद यूपी सरकार ने तीन अफसरों की एसआईटी बनाकर जांच शुरू कर दी है। लेकिन इस मामले में अभी तक कोई प्राथमिकी किसी के खिलाफ दर्ज नहीं है। की जाएगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। यहां तक कि तीन रामभक्तों ने पुलिस में लिखित शिकायत भी दी है, लेकिन उस पर भी पुलिस ने अभी तक कोई संज्ञान नहीं लिया है। लिया जाएगा भी नहीं, कहा जा नहीं जा सकता। अलबत्ता एसआईटी की जांच के दौरान चढ़ावा चोरी के व्यापक नेटवर्क और ऊपरी वरदहस्त की जानकारियां जरूर सामने आ रही हैं। सवाल उठता है ‍कि क्या सारी व्यवस्था ही अंधी है?

शक की सुई श्रीराम मंदिर तीर्थ ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के इर्द गिर्द घूम रही है। हालांकि उन्हें बचाने वालों में से एक वरिष्ठ पदाधिकारी नृपेन्द्र मिश्रा का कहना है कि चंपत राय बेदाग हैं। लेकिन एक अदने से रामभक्त के मन में उठने वाले इन सवालों कि अगर चंपत या बेदाग हैं तो मंदिर में चढ़ावा चोरी का खेल इतने दिनों से कैसे चल रहा था, किसके संरक्षण में चल रहा था? चंपत राय को इसकी खबर कैसे नहीं लगी? लगी तो उन्होंने तत्काल इसे रोकने की कार्रवाई क्यों नहीं की?

कहते हैं कि चंपत राय के बिना श्रीराम ‍मंदिर में पत्ता नहीं हिलता तो फिर उन्हें इतने बड़े घपले की हवा कैसे नहीं लगी? अगर उन्हें यह ‘खुला रहस्य’ भी पता नहीं था तो वो महासचिव के पद पर बैठ कर क्या रहे थे? अगर वो गाफिल थे तो यह भी कर्तव्य के प्रति गंभीर लापरवाही और नैतिक अपराध है। हो सकता है कि सपा नेता अखिलेश यादव इस मुद्दे को न उठाते तो इस चढ़ावा चोरी पर पर्दा डला रहता और राम भक्त यूं ही ठगे जाते रहते। पहले भाजपा नेता और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के ट्रस्टियों इसे खारिज किया। लेकिन जब संतों, कुछ पुराने विहिप नेता और भाजपा सांसदों ने ही चढ़ावा चोरी में घपले की बात उठानी शुरू की तो सरकार चेती। चढ़ावे की रकम स्टेट बैंक आफ इंडिया के स्टाफ के सहयोग से की जाती है। लेकिन एसबीआई भी इस मामले में मौन धारण किए रहा। अभी तक कुल कितनी राशि गबन की गई और किस किस की जेब में गई, यह तो निष्पक्ष जांच के बाद ही पता चलेगा।

श्रीराम मंदिर चढ़ावा चोरी का मुद्दा राजनीतिक रंग लेगा या नहीं, कहना मुश्किल है, लेकिन इससे भाजपा के प्रति लोगों के विश्वास में कमी जरूर आएगी। साथ ही मंदिर ट्रस्ट के प्रबंधन और इस मामले में आरएसएस की खामोशी पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि चंपत राय वहीं से आते हैं। संभव है कि संघ ने अंदरूनी तौर पर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की हरी झंडी दे दी हो, लेकिन जो अभी तक सामने आया है, वह बहुत क्षोभजनक और लज्जास्पद है। इसका अंदाजा भाजपा के बाहुबली सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह के उस बयान से लगाया जा सकता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि चढ़ावे में गबन करने वाले ‘बहुत बड़े’ लोग हैं। समय आने पर मैं उनके नाम उजागर करूंगा। इसका अर्थ यही है कि इस खेल में वो लोग भी शामिल हैं, जिनका नाम लेने में ब्रजभूषण शरण सिंह जैसे विवादित सांसद को भी ‘डर’ लगता है।

दरअसल इससे राम मंदिर प्रबंधन से जुड़े लोगों के नैतिक चरित्र की कलई खुल गई है। श्रीराम के जिस मंदिर में भगवान राम के नैतिक आदर्श के अनुरूप ही सारा काम होना चाहिए था, उसी मे सबसे पहले पलीता लगाया गया है। आदि ऋषि वाल्मीकि के ‘रामायण’ और गोस्वामी तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ में रामराज्य की व्याख्या ऐसे कल्याणकारी सुशासन के रूप में की गई है, जिसमें राज्य में लोगों में अपराध और लोभ का अभाव था। राज्य में कोई भी चोर या डकैत नहीं था। प्रजा अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन करती थी और किसी में लोभ या लालच नहीं था। कोई व्यक्ति सपने में भी पाप या अधर्म का आचरण नहीं करता। रामराज का मूलाधार लोगों की नैतिक उत्कृष्टता थी। राममंदिर के चढ़ावा घपले में इसी नैतिकता का निर्लज्ज कत्ल हुआ है। आलम यह है कि अयोध्या में रामलला के दर्शन करने वाला हर आस्थावान हिंदू चढ़ावा चढ़ाने के पहले दो बार सोचेगा कि यह किन हाथों में जाएगा।

अब देखना यह है कि एसआईटी रिपोर्ट आने के बाद क्या और कैसी कार्रवाई होती है। दोषियों को कठोरतम दंड देकर रामभक्तों की भावनाओं के साथ न्याय किया जाएगा या फिर दो चार छुटभैयों को फंसाकर मामला रफा दफा कर दिया जाएगा? यानी ‘हुई है वही जो राम रचि राखा !’