
दानपात्र, रामलला और चंपत-पुराण
दीप नारायण पाण्डेय
कहते हैं, उस रात अयोध्या में आरती की लौ कुछ देर तक सीधी नहीं जली। घंटा बजा, पर उसकी ध्वनि लौटकर उसी आँगन में ठिठक गई। सरयू ने भी बहते-बहते जैसे एक क्षण को पूछा—“जिस घर को श्रद्धा ने बनाया, उसके धन की रखवाली कौन करेगा?” दान-पेटी चुप खड़ी थी, पर भीतर पड़े सिक्के नींद में काँप रहे थे। वे सिक्के और रुपये केवल मुद्रा नहीं थे; किसी रिक्शेवाले की दिन-भर की कमाई थे, किसी बूढ़ी माँ की बची हुई दवा थे, किसी बच्चे की टूटी गुल्लक थे, किसी कारसेवक की स्मृति थे, किसी भक्त का विश्वास थे।
रामलला की ओर जाने वाली राह में अचानक कागजों का एक जंगल उग आया था। कहीं रसीद थी, कहीं खाता था, कहीं ताला था, कहीं चाबी थी, कहीं समिति थी, कहीं मौन था। भक्त ने सोचा था—“मैंने राम के लिए दिया।” व्यवस्था ने शायद सोचा—“यह प्रविष्टि किस खाते में जाएगी?” श्रद्धा जुड़े हाथ लेकर आई थी, पर सामने फाइल खुली मिली। आरती ऊपर उठ रही थी, और नीचे कहीं खाता-बही में अंकों की छाया लंबी होती जा रही थी।
जांच अच्छी बात है। पर जांच जांच है। जिन्होंने मंदिर निर्माण में योगदान दिया उनके मन में प्रश्न हैं—इस्तीफा देकर चंपत? नैतिकता की ओढ़नी ओढ़कर चंपत? जिम्मेदारी की आरती उतारकर चंपत? इतना बड़ा प्रकरण और बड़े नाम धुएँ की तरह चंपत? छोटे कर्मचारी गिरफ्तार, बड़े पदधारी सम्मानपूर्वक चंपत? भक्त पूछ रहे हैं—यह चंपत-लीला किस शास्त्र में लिखी है? जिसने दान गिना, वह पकड़ा गया; जिसने व्यवस्था बनाई, वह चंपत? जिसने पेटी उठाई, वह आरोपी; जिसने चाबी की संस्कृति बनाई, वह चंपत? जिसने नोट गिना, वह हिरासत में; जिसने गिनने की व्यवस्था बैठाई, वह चंपत? यह कोई सामान्य चोरी नहीं है; यह वह प्रसंग है जिसमें राम-भक्तों का भरोसा चोरी हुआ है। ऐतिहासिक चोरी है यह। एक संत ने अपूर्ण मंदिर के उद्घाटन पर चिंता व्यक्त की थी। कुप्रभाव अब दिखा।
उस रात दान-पेटी ने सपना देखा कि उसके भीतर के रुपये और सिक्के बाहर निकल आए हैं। एक सिक्का बोला—“मुझे उस मजदूर ने दिया था जिसने दिन भर ईंट ढोई।” दूसरा बोला—“मुझे उस स्त्री ने दिया था जिसने महीने के खर्च से बचाया।” तीसरा बोला—“मुझे उस बच्चे ने दिया था जिसने कहा था—रामलला के घर में मेरी भी छोटी-सी ईंट लगेगी।” पेटी रो पड़ी। उसने कहा—“मुझे चोरों से कम, चंपत-कला से अधिक डर लगता है। चोर कभी पकड़ा भी जाता है; चंपत-कला प्रेस-विज्ञप्ति लिखकर निकल जाती है।”
ट्रस्ट की कुर्सियाँ भी उस रात सोई नहीं होंगी। कुछ कुर्सियाँ हिल रही होंगी, कुछ अपने ऊपर बैठे नामों का भार नाप रही होंगी। दीवारें पूछ रही होंगी—“जो आंदोलन की धूल से आए थे, वे कहाँ हैं? जिनके पाँवों ने संघर्ष की सड़कें नापीं, वे बाहर क्यों हैं? जिनके लिए रामलला ही जीवन हैं, वे दर्शक क्यों हैं? और जिनके लिए आस्था परियोजना-पत्र रही, वे प्रबंधक कैसे बन गए? किसने बनाया?” कोई उत्तर नहीं आया। केवल कागज सरसराए, जैसे सूखे पत्ते किसी पुराने बरगद से गिरते हैं।
रामलला की मूर्ति मौन है, पर वह मौन खाली नहीं होता। वह मौन पूछ रहा है—“मंदिर मेरा है, पर उस पर चढ़ा विश्वास जनता का है। शिखर ऊँचा हो जाए और हिसाब नीचा रह जाए, तो प्रकाश कहाँ टिकेगा?” घंटा पूछ रहा था—“मेरी ध्वनि ऊपर क्यों जाती है, पर हिसाब नीचे क्यों अटक जाता है?” दीपक पूछ रहा था—“मैं अंधेरा घटाने आया था; खाता-बही अँधेरे में क्यों रखी है?”
यहाँ प्रश्न आस्था के विरुद्ध नहीं है। प्रश्न आस्था की रक्षा में है। दान का हिसाब माँगना भक्ति का अपमान नहीं, भक्ति की सुरक्षा है। भक्त को शांत रहने की सलाह देने वाले पहले दान का मार्ग सार्वजनिक करें। जिसने लिया, कहाँ रखा, किसने गिना, किसने देखा, किसने रोका नहीं, किसने देर की, किसने इस्तीफा दिया, किसने चुप्पी ओढ़ी—सब सामने आए। चंपत होने का रास्ता बंद हो। नाम, रकम, भूमिका, चाबी, कक्ष, खाता और आदेश—सब उजाले में आएँ। राम के नाम पर दिया गया धन राम के नाम पर ही लगे; बीच में कोई व्यवस्था-देवता उसका रूपांतरण न करे।
और शायद रामलला की करुण मुस्कान भी यही कहती होगी—
“भक्तों, श्रद्धा रखो, पर आँखें खुली रखो।
दान करो, पर लेखा माँगो।
मंदिर मेरा है, पर धन तुम्हारे विश्वास का है।
जिसने इसे चुराया, वह मुझसे नहीं छिपेगा।
जिसने चंपत होने की सोची, उसे याद रहे—
अयोध्या में रास्ते बहुत हैं, पर अंत में सब रास्ते स्वर्ग या नरक तक पहुँच सकते हैं।
स्वर्ग सेवा से मिलता है, छल से नहीं।
और नरक भेजने के लिए मंदिर-निर्माण और प्रबंधन के नाम पर अब तक की गई चोरी पर्याप्त योग्यता है।”
लेखक राजस्थान के सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी होकर पूर्व वन बल प्रमुख रहे हैं।





