WhatsApp Image 2025 08 07 At 9.31.47 PM
Home कॉलम

नक्सल से निपटने के बाद मादक पदार्थों से देश को बचाने का अभियान

8

नक्सल से निपटने के बाद मादक पदार्थों से देश को बचाने का अभियान

आलोक मेहता

सीमा पर आतंकी गतिविधियों पर नियंत्रण और माओवादी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को मुक्त करने के बाद भारत सरकार अब मादक पदार्थों (नारकोटिक्स) की तस्करी तथा उसके जहर को समाज में फैलने से रोकने के लिए व्यापक अभियान चला रही है | पिछले दिनों एक अनौपचारिक बातचीत में मैंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से इसी सम्बन्ध में सवाल किया तो उन्होंने दृढ़ता के साथ कहा कि ‘ हम पिछले वर्षों से इस समस्या से निपटने के लिए कदम उठा रहे हैं और अब नारकोटिक्स पर नियंत्रण के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास करेंगे | यह आतंकवाद की तरह पूरी दुनिया के लिए और खासकर भावी नई पीढ़ी को सुरक्षित करने के लिए प्राथमिकता का मुद्दा है | ‘ इसी लक्ष्य से गृह मंत्रीअमित शाह ने इस सप्ताह भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जिओ गोर से मुलाकात की। इस बैठक में आतंकवाद-रोधी सहयोग, सीमा सुरक्षा तथा मादक पदार्थों (नारकोटिक्स) की तस्करी के विरुद्ध संयुक्त प्रयासों पर विशेष चर्चा हुई। दोनों देशों ने इस बात पर जोर दिया कि नशीले पदार्थों का अवैध व्यापार अब केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और युवाओं के भविष्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन चुका है।

अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर और गृह मंत्री अमित शाह की इस सप्ताह की बैठक केवल एक सामान्य कूटनीतिक मुलाकात नहीं थी। यह उस बढ़ती वैश्विक चिंता का प्रतीक है जिसमें ड्रग्स तस्करी, संगठित अपराध और आतंकवाद एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी हाल के वर्षों में विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों और प्रधान मंत्रियों के साथ हुई बैठकों में आतंकवाद के साथ नारकोटिक्स के मुद्दे की गंभीरता पर चर्चा करते रहे हैं | अमेरिका के साथ आर्थिक और व्यापार के नए समझौते पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से भी निर्णायक बातचीत हो चुकी है | गृह मंत्री अमित शाह और अमेरिकी राजदूत के बीच हुई बैठक का महत्व इसलिए भी है क्योंकि भारत पंजाब, राजस्थान, गुजरात और समुद्री मार्गों के माध्यम से होने वाली ड्रग्स तस्करी की चुनौती का सामना कर रहा है। गृह मंत्री अमित शाह पहले भी कई मंचों पर चेतावनी दे चुके हैं कि ‘ मादक पदार्थों का व्यापार और नार्को-टेररिज्म भारत के लिए दीर्घकालिक सुरक्षा खतरा बन सकता है।’ इस वर्ष जनवरी 2026 में भारत और अमेरिका ने संयुक्त ड्रग नीति कार्य समूह की बैठक भी आयोजित की थी, जिसमें दोनों देशों ने मादक पदार्थों और उनके उत्पादन में प्रयुक्त रसायनों की तस्करी रोकने के लिए सहयोग बढ़ाने का संकल्प लिया था।

भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर वह दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश है, दूसरी ओर यही युवा वर्ग ड्रग्स माफिया का सबसे बड़ा लक्ष्य भी है। पंजाब सीमा से होने वाली तस्करी, ड्रोन के जरिए भेजे जा रहे नशीले पदार्थ, अंतरराष्ट्रीय अपराध सिंडिकेट और नार्को-टेरर नेटवर्क भारत के सामने गंभीर चुनौती प्रस्तुत करते हैं।अमित शाह ने पिछले महीने भी एक बैठक में कहा था कि ड्रग्स का खतरा सीमाहीन है और इसके खिलाफ वैश्विक गठबंधन आवश्यक है। उन्होंने देशों के बीच वास्तविक समय की खुफिया साझेदारी और समन्वित कानूनी ढांचे की आवश्यकता पर जोर दिया |भारत का मानना है कि अकेला कोई देश ड्रग्स माफिया को समाप्त नहीं कर सकता। इसलिए आवश्यक है संयुक्त राष्ट्र स्तर पर सहयोग , साझा खुफिया नेटवर्क। , वित्तीय निगरानी। , समुद्री सुरक्षा और सीमा प्रबंधन।

पिछले वर्षों (2020–2024) के दौरान भारत की विभिन्न एजेंसियों—विशेषकर नाकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो , डी आर ई , बी एस एफ , कोस्टल गार्ड्स , राज्यों की पुलिस ने सीमा क्षेत्रों, बंदरगाहों, समुद्री खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई की है।यदि 2020–2024 में भारत की चुनौती मुख्यतः पंजाब सीमा और बंदरगाहों तक सीमित दिखाई देती थी, तो 2025 ने दिखाया कि समुद्री मार्ग राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रमुख मोर्चा बन चुका है | 2025 में 1,800 करोड़ रुपए मूल्य की मेथामफेटामाइन गुजरात तट के पास पकड़ी गई। 33 करोड़ का हशीश ऑयल जहाज से बरामद हुआ।भारतीय नौसेना ने 2.5 टन से अधिक मादक पदार्थ पश्चिमी हिंद महासागर में पकड़े। इससे यह संकेत स्पष्ट रूप से मिलता है कि ड्रग्स तस्कर भूमि सीमा के साथ-साथ समुद्री मार्गों का भी बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहे हैं, और सुरक्षा एजेंसियों को अब “नार्को-टेरर” के खिलाफ समुद्र में भी उतनी ही बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ रही है।

ड्रग्स की समस्या केवल सीमावर्ती राज्यों या अपराध जगत तक सीमित नहीं रह गई है। पिछले कुछ वर्षों में स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, हॉस्टलों, पब, बार, रिसॉर्ट, होटल और नाइटलाइफ़ से जुड़े इलाकों में भी नशीले पदार्थों की पहुँच बढ़ने को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। विभिन्न अध्ययनों और सरकारी अभियानों से संकेत मिलता है कि ड्रग्स का प्रयोग कम उम्र में शुरू हो रहा है और युवाओं को प्रभवित कर रहा है | अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स द्वारा 10 शहरों में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि कुछ बच्चों में नशीले पदार्थों के प्रयोग की शुरुआत औसतन 12.9–13 वर्ष की आयु के आसपास हो रही है, जबकि कुछ मामलों में शुरुआत 11 वर्ष की आयु तक देखी गई। अध्ययन में लगभग 15 प्रतिशत विद्यार्थियों द्वारा किसी न किसी मन:प्रभावी पदार्थ को आजमाने की बात सामने आई। प्रकाशित एक अन्य सर्वेक्षण में कक्षा 8 से 12 तक के छात्रों में 10% से अधिक द्वारा पिछले वर्ष किसी न किसी प्रकार के पदार्थ सेवन की जानकारी सामने आई थी | विशेषज्ञों के अनुसार इसके प्रमुख कारण हैं – साथियों का दबाव ,सोशल मीडिया और डिजिटल प्रभाव , परिवार में तनाव , मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ , जिज्ञासा और प्रयोग करने की प्रवृत्ति तथा आसान उपलब्धता |कॉलेजों में स्थिति और अधिक जटिल हो जाती है क्योंकि छात्रों को अधिक स्वतंत्रता, हॉस्टल जीवन और नाइटलाइफ़ का संपर्क मिलता है | पुलिस और जनप्रतिनिधियों ने कॉलेज परिसरों के आसपास नशे की उपलब्धता को लेकर चिंता व्यक्त की है। नागपुर में स्थानीय प्रशासन ने कॉलेजों से निगरानी बढ़ाने की अपील की और छात्र समुदाय में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति पर चिंता जताई। कर्नाटक के बेलगावी में पुलिस ने कॉलेज परिसरों के आसपास विशेष अभियान चलाया और बड़ी संख्या में युवाओं के नशीले पदार्थों के संपर्क में होने की बात सामने आई।सामुदायिक चर्चाओं और छात्र अनुभवों में भी यह चिंता दिखाई देती है कि कुछ हॉस्टलों और विश्वविद्यालय क्षेत्रों में गांजा, सिंथेटिक ड्रग्स और अन्य पदार्थों की उपलब्धता पहले की तुलना में अधिक दिखाई दे रही है। । बड़े महानगरों—जैसे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, गोवा, पुणे और हैदराबाद—में पुलिस समय-समय पर होटल, पब, फार्महाउस पार्टियों और निजी आयोजनों पर छापे मारती रही है।विशेषज्ञों के अनुसार अब केवल हेरोइन या अफीम ही समस्या नहीं हैं। शहरी क्षेत्रों में एमडीएमए , एलएसडी। मेफेड्रोन , मेथम्फेटामिन , पार्टी ड्रग्स का खतरा बढ़ा है |इनका उपयोग अक्सर पार्टी संस्कृति, नाइट क्लब, निजी पार्टियों और कुछ मामलों में कॉलेज नेटवर्क से जुड़ा पाया जाता है। बड़े महानगरों—जैसे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, गोवा, पुणे और हैदराबाद—में पुलिस समय-समय पर होटल, पब, फार्महाउस पार्टियों और निजी आयोजनों पर छापे मारती रही है। इन मामलों में निजी पार्टियों में ड्रग्स का उपयोग , रेव पार्टियाँ , हाई-प्रोफाइल नेटवर्क और विदेशी तस्करी नेटवर्क से संपर्क की बातें सामने आई हैं |2025–26 के दौरान पंजाब के नशामुक्ति कार्यक्रमों में 90,000 से अधिक लोगों का उपचार किया गया। यह बताता है कि समस्या कितनी व्यापक हो चुकी है। कश्मीर के स्थानीय अध्ययनों में युवाओं के बीच नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बताया गया है।गोवा लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों और नाइटलाइफ़ के कारण ड्रग्स नियंत्रण एजेंसियों की विशेष निगरानी में रहा है। स्थानीय समुदायों ने भी स्कूलों और युवाओं तक ड्रग्स पहुँचने पर चिंता व्यक्त की है। युवाओं में ड्रग्स की लत केवल स्वास्थ्य समस्या नहीं है। इसके कारण पढ़ाई में गिरावट ,स्कूल छोड़ना मानसिक अवसाद , चिंता विकार हिंसक व्यवहार , सड़क दुर्घटनाएँ , अपराध में शामिल होना और पारिवारिक संबंधों के टूटने की स्थितियां बन रही हैं | एम्स के और अन्य स्वास्थय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुरुआती हस्तक्षेप न किया जाए तो ड्रग्स का प्रयोग धीरे-धीरे निर्भरता और फिर लत में बदल जाता है। बहरहाल भारत अभी अमेरिका या कनाडा जैसी ओपिऑयड महामारी की स्थिति में नहीं है, लेकिन कई विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि शुरुआत की आयु कम हो रही है, सिंथेटिक ड्रग्स बढ़ रही हैं, कॉलेज और शहरी युवा अधिक प्रभावित हो रहे हैं, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ और नशा एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं।इसलिए स्कूल स्तर से जागरूकता, कॉलेजों में काउंसलिंग, परिवारों की भागीदारी, नशामुक्ति केंद्रों का विस्तार और तस्करी नेटवर्क पर कठोर कार्रवाई अत्यंत आवश्यक मानी जा रही है।

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल ड्रग्स की तस्करी नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को नशे की गिरफ्त में जाने से बचाना है। यदि स्कूल, कॉलेज, परिवार, समाज और कानून-प्रवर्तन एजेंसियाँ मिलकर समय रहते कार्रवाई करें तो भारत उस बड़े सामाजिक संकट से बच सकता है जिसका सामना कई पश्चिमी देशों ने पिछले दशकों में किया है।