
रविवारीय गपशप: जब पटवारी ने लैंड रिकॉर्ड कमिश्नर की कृषि भूमि पर बटाईदार का कब्जा दर्ज कर दिया
आनंद शर्मा
पिछले दिनों मैं अपने पुराने मित्र और सेवानिवृत आईएएस श्री एके सिंह साहब से बात कर रहा था , तो उन्होंने बताया कि रिटायरमेंट के बाद वे अब अपनी पुश्तैनी जमीनों की देख परख में लगे हैं , और नापजोख से लेकर नामान्तरण की औपचारिकताएं पूरी करवा रहे हैं । इसी सिलसिले में रीवा नगर में व्यावसायिक महत्व के एक भूखण्ड पर जब उन्होंने वारिसानों का नामांतरण करवाया तो उन्होंने पाया कि नामांतरण का आदेश तो हो गया पर अमल करते समय पटवारी ने भाइयों के नाम इधर उधर कर दिए हैं । इस बारे में जब उन्होंने कलेक्टर से सम्पर्क किया तो उनकी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि लगता है , कोई इनाम-इकराम की आशा में ये हरकत हुई है । रीवा के नए कलेक्टर श्री नरेन्द्र सूर्यवंशी ने राजस्व अमले की इन्हीं हरकतों को दुरुस्त करने के लिये रीवा जिले में विभाग के पेंडिंग प्रकरणों के निराकरण का अभियान चलाया हुआ है ।
कहते हैं चौधरी चरण सिंह, जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने पटवारी शब्द का ख़ौफ़ ख़त्म करने के लिये प्रदेश में इस पद का नाम पटवारी से बदल कर लेखपाल रख दिया था पर शेक्सपियर की सुनें तो वही हुआ कि नाम में क्या रक्खा है ? हालाँकि ऐसा नहीं है , कि पूरा केडर को दोष देना चाहिये, मैंने अपने सेवा काल में जनता के कार्यों के लिये पटवारी संवर्ग का बड़ा सकारात्मक सहयोग लिया है । ला एंड ऑर्डर से लेकर प्राकृतिक विपदा के समय तक मुझे पटवारी साथियों का जनकार्य के लिए हमेशा सहयोग मिला है ।
मैं नरसिंहपुर पदस्थ हुआ तो लोगों ने एक बड़ा पुराना क़िस्सा सुनाया कि नरसिंहपुर के रहने वाले फ़लाँ साहब आईएएस अफसर बने और तरक्की होते होते एक दिन वे भू अभिलेख विभाग के आयुक्त बन गये, जिसे सीएलआर कहा करते थे । पूरे राज्य के राजस्व और बंदोबस्त अमले का सीएलआर विभागाध्यक्ष हुआ करता था । साहब सीएलआर बने तो गाँव में उनकी जमीन की देखरेख करने वाले मैनेजर नुमा मुनीम ने सोचा कि अब पटवारी जी का रौब क्या खाना ? अब तो भैया इनके माई बाप हो चुके हैं , लिहाजा उस दिवाली हर बरस ईनाम के तौर पर पटवारी को दी जाने वाली अनाज की बोरी उन्होंने पटवारी को नहीं पहुंचाई । पटवारी मुनीम की होशियारी समझ गया पर बोला कुछ नहीं । भैया साहब यूँ तो आईएएस अफ़सर बन गए थे , पर घर से मालगुज़ार टाइप के बड़े किसान के लड़के थे और साहब के नाम पर खेती की ज़मीनें भी बहुत थीं जो उनके नौकरी में रहने से परम्परा गत रूप से वे बटाई पर दी जाती रहती थीं । पटवारी ने उस वर्ष गिरदावरी के दौरान खसरे में लिख दिया कि जमीन पर फसल फ़लाँ आदमी बो रहा है और इसकी ख़बर जानबूझकर मुनीम को भिजवा दी । उन दिनों मध्यप्रदेश के भूमि कानूनों के अनुसार , यदि एक निश्चित अवधि के ऊपर अभिलेख पर लिखे मालिक से अलग कोई अन्य भूमिहीन व्यक्ति फसल बो रहा होता था तो भूमि का मालिकाना हक फ़सल बोने वाले का हो जाता था । मुनीम ने भी सोचा कि इस बार तो इस पटवारी को सबक सिखाऊँगा । सीएलआर साहब जब छुट्टियों में घर आये , तो मुनीम ने पटवारी की कारस्तानी साहब को बताई । साहब ने पटवारी को बुलाया और पूछा भाई ऐसा क्यों लिख दिया ? पटवारी ने कहा साहब मैंने तो जो देखा वो लिख दिया , अब आप इस विभाग के सबसे बड़े साहब हो आप इसे सुधार दो । सीएलआर समझ गये कि कुछ पेंच है , उन्होंने पटवारी को बिठा कर प्रेम से फिर पूछा सही बताओ क्या बात है ? पटवारी ने उन्हें पूरी कहानी कही तो सीएलआर साहब मुस्कुराए और मुनीम को बुला कर समझाया , जैसे पहले इनाम जाता था , आईंदा भी जाता रहेगा ।





