Ashwin Joshi: दुश्मन – दुश्मन जो दोस्तों से भी प्यारा था

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Ashwin Joshi: दुश्मन – दुश्मन जो दोस्तों से भी प्यारा था

गोपीकृष्ण नेमा, पूर्व विधायक

आज 8 मई सुबह मोबाइल की घंटी बजी और एक परिचित ने सूचना दी की पूर्व विधायक श्री अश्वनी जोशी नहीं रहे। सुनकर मन मस्तिष्क कुंद हो गया। स्वास्थ्य ठीक नहीं है, यह जानकारी भी थी डेढ़ से दो माह से सम्पर्क भी नहीं था। पर यह सूचना कल्पना से बाहर थी। इसके पूर्व प्रतिदिन डेढ़ से दो घंटे की मुलाकात चाय पर चर्चा नित्य कर्म में सम्मिलित था।
पक्ष-विपक्ष एवं शहर के व्यक्ति अश्विन को मुंह फट मानते थे, दिल की बात जस की तस जुबां पर बयान करना राजनीतिज्ञों के लिए ठीक नहीं माना जाता है। पर जो मन में है वह मुंह पर बोल देना अश्विन की आदत में शुमार था जिससे निकटता के बजाय दूरियां बनाने वाले बढ़ते गये।

स्वभाव में एक और बात थी कि किसी की भी बात में चाहे वो बड़ा हो या छोटा नेता हो या कार्यकर्ता जिसके बारे में जो धारणा उसने बना ली उसको बदलना कठिन था। इस तरह की जिद का अंत हमेशा यह होता की तुम्हारे लिये वह ठीक हो सकता है पर मैं जानता हूं कि वह क्या है।

विधानसभा क्षेत्र 3 में मैं विधायक रहा तो चुनाव अश्विन से पराजित भी हुआ। चुनावी संघर्ष और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच हमारे संबंध सोच से परे विचार और निकटता का रहा।

हठी जिद्दी और मुँहफट कहने वालों को शायद अंदर के दूसरे अश्विन को देखने का मौका ही नहीं मिला होगा। लेकिन जिसने इस पक्ष को देखा है वे जानते हैं कि विभिन्न विषयों के अध्ययन करने की रुचि और उन विषयों को अपने मस्तिष्क में संजोने का भाव तथा समय समय पर उनको उच्चारित करने की आदत कविता शेर-शायरी में डूबकर उन्हें याद रखना और दोस्तों के बीच बातों-बातों में उनका उदाहरण करना ही अश्विन की आदत में शुमार था।

हम आपस में दस साल विधानसभा में कटु प्रतिस्पर्धी रहे पर रीति नीति के अलावा व्यक्तिगत वाद विवाद आलोचना से दोनों दूर रहे। चुनाव प्रचार के दौरान आमने-सामने आ जाने पर मुस्कुराकर अभिवादन करना या कोई चाय-नाश्ते की दुकान हो तो वहां पर साथ में चाय-नाश्ता करना लोगों में कौतूहल पैदा कर देता था।

विगत कुछ समय से स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के बाद भी लगातार रात को 7 से 9 के बीच मालगंज चौराहे पर आ जाना। देश-विदेश दल और दिल की बातें कर कब मिट्टी के साथ विदा होने वाला अश्विन सबसे बगैर मिले विदा हो गया। सबको छोड़ गया।

आना और जाना संसार की नियति है पर कुछ जाने वाले जाकर भी दिल से नहीं जाते किसी ना किसी रूप में याद आते हैं उनमें तुम हो अश्विन।

कुछ किस्से, कुछ शेर, कुछ कविताएं और कुछ गजल जो तुम गुनगुनाते या हमें सुनाते वे जब भी कानों में सुनाई देंगे तो तुम जरूर याद आओगे,

जरूर याद आओगे।

अलविदा अश्विन।