क़र्ज़दार किसान देश की सेहत के लिए ख़राब है

क़र्ज़दार किसान देश की सेहत के लिए ख़राब है

मीडियावाला.इन।

आप सबसे माफ़ी मांगते हुए,यदि मैं कहूँ कि - भारत एक 'कृषि-प्रधान'नहीं,'राजनीति प्रधान' देश है,व इसके लोगों का आम शगल मनोरंजन और सनसनी ही है.वे इसके लिए क़र्ज़ में भी जीना पसंद कर लेते हैं.इस पर बेशक आप मुझ पर गुस्सा होंगे,पर आंकड़े और तथ्य देखेंगे,तो शायद भरोसा कर लें.

अपने देश में आंकड़े जमा करने की केंद्रीय एजेंसी 'नेशनल सेम्पल सर्वे ऑर्गनाइज़ेशन'(एनएसएसओ) है.इसके हवाले से 'इण्डिया स्पेंड'ने कुछ दिनों पहले कहा था कि भारत के 70 प्रतिशत लोग अपनी आमदनी से ज्यादा खर्च करते हैं.इसे बुराई कहें या मजबूरी,लेकिन यह गाँवों में ज्यादा है.वहां आमदनी है,लेकिन नियमित नहीं है.इसीलिए ग्रामीण भारतीय हमेशा कर्ज़े में ही रहता है.

इतिहास और अर्थशास्त्र पढ़ने वाले लोग जानते हैं कि इस 'ग्रामीण ऋणग्रस्तता' के प्रति 'राज'करने वालों की 'फ़र्ज़ी'चिंता हमेशा बरकरार रहती है.यहाँ तक कि अंग्रेजों ने भी 1928 में एक 'रॉयल कमीशन फॉर फार्मर्स' बनाया था.

उस कमीशन ने जो रिपोर्ट दी थी,उसके सारे कारण,परिस्थितियां और वायदे आज भी हू-बहू मौजूद हैं.भारत की अपनी सरकार ने भी लगभग उन्हीं 'विचार बिंदुओं'(टर्म्स ऑफ़ रेफेरेंस) पर 2006 में 'एक स्वामीनाथन आयोग' बनाया था.उसने भी अपनी रिपोर्ट दे दी है व कारण भी लगभग वे ही बताये हैं,जो रॉयल कमीशन ने लिखे थे.लेकिन,हालात वहीँ के वहीँ हैं.

यह आंकड़ा भी सरकारी ही है कि राजनीतिक लाभ के लिए की जाने वाली ऋणमुक्ति की तमाम घोषणाओं के बाद भी,अपने देश में आधे से ज्यादा किसान कर्ज़दार हैं.

किसानों को संस्थागत ढांचे से व्यवस्थित क़र्ज़ मिल सके,व उनका शोषण न हो,इसके लिए सरकारें पिछले पांच सालों से इस मद में 1 लाख करोड़ रुपये बढ़ाती चली आ रही हैं,लेकिन फिर भी महाजनी कर्ज़ा अभी भी 50 प्रतिशत के आसपास है.परिस्थितियां कुछ ऐसी ही हैं कि चुनावों के दौरान आप क़र्ज़-मुक्ति की कितनी भी घोषणाएं कर दें,महाजनी कर्ज़ा तो अपनी जगह रहेगा ही.

यहाँ एक बात ध्यान देने की है कि खाद,बीज,कृषि-रसायन और खेती में काम आने वाले सभी यंत्रों के निर्माता तो 'कॉर्पोरेट्स'ही हैं.इस बाज़ार पर सौ फ़ीसदी कब्ज़ा कॉर्पोरेट्स का है.इसलिए जरूरी चीज़ों के लिए मिले क़र्ज़ के रुपये भी क़र्ज़ के रास्ते इन्हीं के पास चले जाते हैं.किसान की फसल हो,न हो,उससे उन्हें क्या लेना देना.इसलिए यहाँ भी फायदा किसान का नहीं कार्पोरेट्स का है.

नेशनल सेम्पल सर्वे ऑर्गनाइज़ेशन कहता है कि ग्रामीण स्तर पर यदि संपत्ति और क़र्ज़ का अनुपात 60 :40 का हो, तो बात चिंता की तो है,पर सामान्य है.लेकिन यदि संपत्ति के मूल्य और क़र्ज़ का अनुपात 40 : 60 का है तो बात चिंता की है.आजकल जमीनों की कीमतें तो स्थिर हैं,लेकिन जिनके लिए क़र्ज़ लिया जाता है,उन चीज़ों के दाम आसमान को भी मात दे रहे हैं.

छोटे किसानों का संपत्ति के मूल्य और क़र्ज़ का अनुपात तो और भी ज्यादा है,या लगभग अति चिंता का विषय है.इसीलिए किसान खेती से बाहर होते जा रहे हैं.राष्ट्रीय कृषि गणना ने बार बार कहा है कि अपने देश में कई सामाजिक कारणों से छोटे किसानों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है.देश के कुल किसानों का 68 प्रतिशत किसान दो हेक्टेयर (लगभग ढाई एकड़ से थोड़े कम का एक हेक्टेयर होता है) या इससे कम का मालिक है.

कुल मिलाकर देश के 70 प्रतिशत खेत छोटे हैं.अब आप खुद ही अंदाज़ लगा लें कि ग्रामीण ऋणग्रस्तता क्यों न बढे.औद्योगीकरण और तमाम शहरीकरण के बावजूद 48 करोड़ लोगों की आजीविका अभी भी खेती है.यानी जोर जोर से 130 करोड़ की ताक़त पर गुमान करने वालों को याद रखना होगा कि उनके एक तिहाई भाई क़र्ज़ में डूबे हैं.

अंग्रेजों के बनाये रॉयल कमीशन ने ही लिखा था कि"भारतीय किसान क़र्ज़ में पैदा होता है,जिंदगी भर क़र्ज़ ढोता है,और मरते वक़्त अपनी संतानों के माथे पर क़र्ज़ छोड़ जाता है." यही की यही बात थोड़े दूसरे या मुलायम शब्दों में स्वामीनाथन साहब ने की है.

दोनों ने इसके पीछे सामाजिक कारणों को भी बराबर का ज़िम्मेदार माना है.फ़िज़ूल खर्ची,शादी,विवाह,जन्म और मृत्यु के समय होने वाले खर्च भी इस ऋणग्रस्तता के बड़े जिम्मेदार हैं.

सरकारें कुछ भी वादे या दावे करे,पर हम अपने ही इन कारणों पर विचार तो कर सकते हैं,या इन्हें तो रोक ही सकते हैं.इन किन्हीं भी खर्चों से लौटकर कुछ नहीं आना है.

सब जानते हैं कि खेती से कम आमदनी,असुरक्षित और अनिश्चित परिणाम अपनी जगह हमेशा रहने हैं,और परिवारों के बढ़ते ही जाने से 'जोतों' को भी छोटा होते जाना है.

इसलिए जो करना है,वह किसान को ही करना है.कहावत भी तो अपनी ही है कि "बिना मरे स्वर्ग नहीं दिखता".गांधीजी की 150 वीं जयंती पर उन्हें याद कर,हम यह भी तो याद रख ही सकते हैं कि वे ही तो कहते थे कि इस धरती माता के पास सबका पेट भरने की क्षमता है,पर एक की भी लालच या फ़िज़ूलख़र्ची के लिए उसके पास जगह या क्षमता नहीं है".

एक पुरानी बात याद आई.भारत में अंग्रेजी-राज के दौरान अंग्रेज़ सबसे ज्यादा खादी से डरता था.क्योंकि इससे उसकी मिलों के बने कपड़े नहीं बिकते थे.इसलिए वह चाहता ही नहीं था कि भारत का किसान कपास उगाये.बावजूद इसके अपने देश में विदर्भ में कपास की खेती बंद नहीं हुई.विदर्भ के उन किसानों से जब पूछा गया कि वे ऐसा क्यों करते हैं,तो उत्तर था इसे बेचकर आधे में आपका 'लगान'पटा देंगे और आधे से अपना कर्ज़ा.बचे हुए से परिवार पाल लेंगे.

सारे बैंकर,सारे सरकारी कारकून और सारे प्रगतिशील शहरी जान लें कि हमारे किसानों का तब दिया गया यह जवाब साधारण बात नहीं थी.भारतीय किसान का यह एक संस्कारी उत्तर है,कि जिसका लिया है,उसका वापस देना है.भारत का आम किसान ऋणमुक्ति से न तो फायदा ले पाता है और न वह संतुष्ट और खुश होता है.

देश में राजनीति ने माहौल तो ऐसे बनाया है कि सरकार किसानों पर खजाना लुटा रही है.खेतों में जाने वाली नहरों में पानी की जगह रूपया बहकर जा रहा है.लेकिन ऐसा है नहीं.

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि किसानों की आमदनी रोज़ घटी है.एनएसएसओ और सीडीएस के ही आंकड़े हैं कि अपने देश में प्रति घंटे दो हज़ार किसान खेती छोड़कर मजदूरी में आ रहे हैं,क्योंकि गरीबी में उनका दम घुटता है.

अब एक दूसरा पहलू देखें कि भारत में 2011 में 55 अरबपति थे.जो 2018 में 150 हो गए.इनकी कुल संपत्ति अपनी जीडीपी की 22 प्रतिशत है.

हम फॉर्चून या फ़ोर्ब्स की सूची में चौथे नम्बर पर जरूर हैं,किन्तु संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास क्रम में 131 वें स्थान पर हैं.

अकेले मुकेश अम्बानी की,जितनी साल भर की कमाई है,उससे कम राशि 'मनरेगा'में काम करने वाले 2 करोड़ भारतीयों,को साल भर में मिलती है.

यह सब जानते हुए,न हम इधर देखना चाहते हैं,और न बात करते.सरजी,न आप चाँद पर रहते हैं,और न गरीब किसान पाताल में.अपन सब भारत में ही रहते हैं.यह अपना ही देश है,इसलिए बात कीजिये,चिंता कीजिये और प्रश्न पूछिए.यह देश की सेहत के लिए जरूरी है.

0 comments      

Add Comment


कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...