किसान आन्दोलन

किसान आन्दोलन

मीडियावाला.इन।                                           विश्व के राष्ट्रों  का इतिहास साक्षी है कि  तीव्र विकास ही स्थायित्व और शक्ति प्रदान करता है।द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अनेक विकासशील देश  जो आज विकसित श्रेणी में खड़े हुए है, उन्होंने अपने देशों में राजनीतिक सुगमता के स्थान पर आर्थिक प्रगति का ध्येय रखा। चीन के देंग जिआओपिंग और  सिंगापुर के ली क्वान यू जैसे नेताओं के एतिहासिक आर्थिक सुधारों ने इन देशों को अभूतपूर्व प्रगति दी। भारत ने अपने आज़ादी के बाद के पहले 40 वर्षों को समाजवादी सपनों में खो दिया। आर्थिक स्थिति धरातल पर आ जाने के बाद नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की जोड़ी ने कुछ आर्थिक सुधार किए, जिनसे भारत ज़मीन से उठकर कम से कम चलने काबिल हुआ।वैसे तो आर्थिक सुधार देखने में बहुत आसान दिखते हैं, लेकिन राजनैतिक रूप से इन्हें लागू करना लगभग पहाड़ उठाने के समान है। आर्थिक सुधारों का तत्काल कोई भी लाभ नहीं होता है, बल्कि कुछ  जमे हुए लोगों के निहित स्वार्थ इससे टकराते हैं। इसलिए अनेक देशों में, विशेष रूप से प्रजातांत्रिक देशों में, लोक लुभावन खैरातवाद ने सुधार का स्थान ले रखा है। इसका उद्देश्य जनता का तत्काल समर्थन या वोट प्राप्त करना होता है।देश का भविष्य केवल चंद लोकप्रिय नारों में सिमटकर रह जाता है। हमारे देश की सामूहिक इच्छाशक्ति को यह निर्णय लेना है कि क्या हम अपना  विकास करने के क़ाबिल हैं या नहीं अथवा करना भी चाहते हैं या नहीं?

        पंजाब के किसानों का आंदोलन वैसे तो वहाँ की कृषि व्यवस्था को देखते हुए पूर्णतया स्वाभाविक है। पूरे पंजाब की कृषि व्यवस्था गेहूं और धान के समर्थन मूल्य पर आधारित है।समर्थन मूल्य भारत के करदाताओं के धन से दिया जाता है और कुल मिलाकर केवल छह प्रतिशत किसानों को इसका लाभ मिलता है।लाभ उठाने वाले अधिकांश पंजाब, हरियाणा और कुछ  अन्य छिटपुट क्षेत्रों के हैं।धान पंजाब की स्वाभाविक फ़सल नहीं है और वहाँ के भूजल के दोहन के कारण स्थिति गंभीर हो रही है। धान की पराली जलाना भी एक मजबूरी हो जाती है, जो कि पर्यावरण के लिए एक चुनौती है।उद्योगों के अभाव में जो पंजाब किसी ज़माने में भारत का अग्रणी प्रति व्यक्ति आय का प्रदेश था, आज उसका स्थान 16वॉं है।  समर्थन मूल्य तथा अनिवार्य ख़रीदी से आज FCI की गोदामें आवश्यक रिज़र्व से ढाई गुना अधिक अनाज से भरी पड़ी है। महंगे होने के कारण यह अनाज विदेशों में भी कोई ख़रीदने को तैयार नहीं है। यह केवल बर्बाद होने के लिए है जो वास्तव में करदाताओं की गाढ़ी की कमाई का दुरुपयोग है। वैसे विश्व भर में किसानों को सब्सिडी दी जाती है परंतु वो इस प्रकार से दी जाती है कि सभी फसलों का उचित उत्पादन हो सके। पंजाब को अन्य कैश फसलों की ओर भी ध्यान देना होगा। 
       विगत छह बर्षों से अधिक के मोदी शासन काल में पंजाब के किसानों का दिल्ली घेरने का आंदोलन सबसे सशक्त आंदोलन है। राजनैतिक रूप से विपक्ष अन्य वास्तविक मुद्दों पर ऐसा आंदोलन खड़ा करने में सक्षम नहीं रहा है।अब बड़ी भीड़ देख कर शिवसेना जैसी घोर दक्षिणपंथी पार्टियों से लेकर वामपंथी पार्टियाँ तक सब पंजाब के किसानों के समर्थन में खड़ी है।अनेक ग़ैर राजनीतिक संगठन और NGO आंदोलन के समर्थन में है। लगभग सभी एन जी हूँ मोदी सरकार की फंडिंग नीति के कारण उसके विरोधी है।लेकिन सबसे अधिक ज़ोरदारी से कांग्रेस पार्टी इस आंदोलन के पीछे खड़ी है।अपने घोषणापत्र से यू- टर्न लेते हुए कांग्रेस इस आंदोलन को बढ़ावा दे रही है। कांग्रेस ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर पूरे भारत में बड़ा आंदोलन खड़ा करने का प्रयास किया है जो फ़िलहाल सफल होता नहीं दिख रहा है। पंजाब के मंडी के बिचौलिए और कुछ अन्य स्रोतों से आंदोलन की अच्छी फंडिंग हो रही है, तथा यह सम्पन्न किसानों का आंदोलन बहुत लंबा चलने में समर्थ है।आंदोलन में किसानों को छोड़कर अन्य जितने भी समर्थक हैं उनका एकमात्र उद्देश्य मोदी का व्यक्तिगत विरोध करना है।
    जहाँ तक तथाकथित किसान एक्ट का संबंध है, इस बारे में पूर्व में अनेक बार लिख चुका हूँ। निसंदेह ये एक्ट, जिसमें विशेष रूप से कॉन्ट्रैक्ट खेती का प्रावधान है, वह भारत के 95% ग़रीब किसानों के लिए भविष्य में विकास का एक मात्र विकल्प है। मंडी को बनाए रखते हुए फसल को वैकल्पिक स्थानों पर बेचने की स्वतंत्रता का प्रावधान है।यदि कृषि क्षेत्र में शीत भंडारण और एग्रो-इंडस्ट्री के लिए पूंजी आती है तो इसका सर्वाधिक लाभ ग़रीब किसानों को ही होगा। किसान कानूनों के महत्वपूर्ण प्रावधान वैकल्पिक है।इसके अतिरिक्त और कौन सा मार्ग है जिससे ग़रीब किसानों को उठाया जा सकता है?  क्या विपक्ष भारत के बहुसंख्यक किसानों की वर्तमान स्थिति से  पूर्णतया संतुष्ट हैं; यदि नहीं तो उनके उत्थान के लिए विपक्ष की ओर से कोई स्पष्ट नीति या विकल्प नहीं बताया गया है। 
      किसान भारतीय समाज के एक महत्वपूर्ण अंग हैं।यद्यपि अर्थव्यवस्था में उनका योगदान केवल 17% है परन्तु उनकी जनसंख्या भारत की आधे के बराबर है। हम किसानों की विशाल जनसंख्या को उद्योगों में स्थानांतरित करने में विफल रहे हैं। यदि ऐसा हुआ होता तो बचे हुए किसानों की आज आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी होती।किसानों की वर्तमान जनसंख्या और महत्व को देखते हुए यह उचित होता कि मोदी सरकार किसान क़ानून बनाने से पहले किसानों से व्यापक विचार विमर्श करती।यदि ऐसा हुआ होता तो आज जैसी स्थिति निर्मित नहीं होती। प्रजातंत्र का मुख्य आधार आम सहमति है। किसान कानूनों को अब वापस लेने का कोई प्रश्न नहीं उठता है, परन्तु फिर भी बातचीत के आधार पर इस में कुछ संशोधन के साथ आंदोलन का निराकरण करना आवश्यक है। यह भी आश्चर्यजनक है कि प्रारंभ में समर्थन मूल्य की गारंटी माँगने से शुरू हुआ आंदोलन अब सभी किसान एक्ट को समाप्त किए जाने की बात कर रहा है।हमें यह भी सोचना होगा कि क्या केवल भीड़तंत्र के आधार पर भारत की संसद से पास किये गये क़ानून को वापस करवाना प्रजातंत्र के लिए ख़तरनाक नहीं होगा? कृषि क्षेत्र के अतिरिक्त, श्रम कानूनों में भी सुधार किए गए हैं तथा अन्य बड़े राजनैतिक दृष्टि से अप्रिय सुधार भी किये जाने आवश्यक है। क्या हम विकास के लिए उठाए गए किसी भी सुधार के क़दम को केवल इसलिए वापस ले लेंगे क्योंकि कुछ तत्वों का उससे तात्कालिक नुक़सान हो सकता है या सरकार को चोट पहुँच सकती है? यदि ऐसा है, तो भारत इक्कीसवीं शताब्दी में भी अपने विशाल आकार और संस्कृति के  बावजूद पिछड़ा देश बने रहने के लिए विवश रहेगा। यदि हम राजनीति के कारण पिछड़ा बने रहने के लिए तैयार है, तो फिर किसी और तर्क की आवश्यकता नहीं हैं।

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एन. के. त्रिपाठी

एन के त्रिपाठी आई पी एस सेवा के मप्र काडर के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। उन्होंने प्रदेश मे फ़ील्ड और मुख्यालय दोनों स्थानों मे महत्वपूर्ण पदों पर सफलतापूर्वक कार्य किया। प्रदेश मे उनकी अन्तिम पदस्थापना परिवहन आयुक्त के रूप मे थी और उसके पश्चात वे प्रतिनियुक्ति पर केंद्र मे गये। वहाँ पर वे स्पेशल डीजी, सी आर पी एफ और डीजीपी, एन सी आर बी के पद पर रहे।

वर्तमान मे वे मालवांचल विश्वविद्यालय, इंदौर के कुलपति हैं। वे अभी अनेक गतिविधियों से जुड़े हुए है जिनमें खेल, साहित्य एवं एन जी ओ आदि है। पठन पाठन और देशा टन में उनकी विशेष रुचि है।

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