स्मृति शेष :   पद,पैसा,प्रतिष्ठा से निर्लिप्त रहे भूपेंद्र बंडी 

स्मृति शेष :  पद,पैसा,प्रतिष्ठा से निर्लिप्त रहे भूपेंद्र बंडी 

मीडियावाला.इन।


   भूपेंद्र  बंडीजी का असामयिक निधन ना सिर्फ़ बास्केटबॉल के लिए एक बहुत बड़ा आघात हैं वरन, सारे खेल जगत के लिये एक ऐसी अपूरणीय क्षति हैं जिसे काफ़ी लंबे समय तक भरना असंभव हैं। जन्म-मृत्यु मनुष्य के हाथ में नहीं हैं, किंतु इस बीच के कालखंड में हम जो काम करते हैं उसी कारण, समाज हमें याद रखता हैं, या भुला देता हैं।

सदियों से समाज उनका ज़्यादा ऋणी रहना पसंद करता हैं जिन्होंने समाज से कुछ लेने के स्थान पर समाज को देना पसंद किया। भूपेन्द्रजी खेलों की दुनिया में अखिल भारतीय स्तर तक, अर्थात बास्केटबॉल  फ़ेडरेशन इत्यादि के पदाधिकारी बनने तक भले ही कभी ना पहुँच पाए हों, किंतु उन्होंने लगातार इस खेल की नईं-नईं पौध बनाने का काम अथक चालू रखा, बिना किसी भी अपेक्षा के। इसी काम के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। क़रीब पाँच दशक लम्बे, चुनौतीपूर्ण इस यज्ञ में उनको कई मित्रों ने अच्छा साथ दिया जिसके चलते इंदौर आज बास्केटबॉल  के राष्ट्रीय नक़्शे पर दमदारी से अपनी उपस्थिति दर्ज करता हैं।
        स्व जे एम शर्मा के साथ पहले एक खिलाड़ी के रूप में भूपेन्द्रजीं ने बास्केटबॉल  में प्रवेश किया। बात होगी शायद 1954 -55  की, याने क़रीब 65  वर्ष पूर्व। कुछ वर्षों बाद वें प्रशासक के रूप में आगे बढ़ते गए। बास्केटबॉल  उन दिनों नेहरु स्टेडियम  खेला जाता था। इंदौर में वें बास्केटबॉल  का पर्याय कब बन गए पता हीं नहीं चला।
मेरी पहली मुलाक़ात की उनकी जो याद हैं वह 1976  की हैं जब प्री-एशियन बास्केटबॉल  प्रतियोगिता नेहरु स्टेडियम  में चल रहीं थीं। देश के सारे नामी और ऊँचे पूरे खिलाड़ी ( किरीट ओझा, सुनील पांडा (7. 3  फ़ीट), और राजेश श्रीवास्तव ) इंदौर में आयें थे जिन्हें खेलता देखने मैं, मेरे खिलाड़ी दोस्त सुनील शुक्ला के साथ रोज़ स्टेडियम  जाता था। ऐसे खिलाड़ी पहलें कभी इंदौर में नहीं देखें गए थे। वहाँ भूपेन्द्र के साथ अविनाश आनन्द, रवि भास्कर, सुनील हार्डीया, प्रोफ़ेसर  एसके बंडी, स्व रूपसीगजी, जवाहर डागा आदि मेहनतकश वालंटियर्स  थे जों उस भव्य आयोजन को सफल बनाने में जीं-जान से लगें हुए थे। बास्केटबॉल  में तब भी पैसा नहीं था, और आज भी नगण्य-जैसा ही हैं।
       वह समय वाक़ई अलग था। इंदौर के खेल की दुनिया काफ़ी छोटी थीं। लगभग सारी खेल गतिविधियाँ नेहरु स्टेडियम  से ही संचालित होती थीं। मध्य प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन  हों या टेबल टेनिस एसोसिएशन हों या बैडमिंटन  या वेटलिफ़्टिंग हो, वहीं होता था। बाहर की तरफ़ सी सी आई के बच्चें क्रिकेट का प्रशिक्षण लेते थे और दूसरी ओर, थोड़ी दूरी पर, प्रकाश हॉकी क्लब था। गरमी की छुट्टियों में जो ग्रीष्मकालीन कोचिंग कैम्प लगते थे उनका सुंदर नज़ारा आज भी मेरी आँखों के सामने ताज़ा हैं। उसी स्टेडियम  में मैंने एथलेटिक्स  प्रतियोगिता में भी हिस्सा लिया था और कई वर्षों बाद क्रिकेट और फ़ुट्बॉल के बड़े मैचेज़, एक खेल पत्रकार की हैसियत से कवर भी किए। अब नेहरु स्टेडियम  की जों दूरदशा हैं उस पर तो आँसू आ जाते हैं।
      ख़ैर, कुछ दशक के अंतराल बाद जब रेस कोर्स रोड पर चार खेल संगठनों को सरकार ने ज़मीन मुहैया करवाई तब बास्कट्बॉल की गतिविधियाँ भी यहीं से संचालित होना प्रारम्भ हुआ। बंडीजी ने ट्रस्ट की ज़मीन पर भव्य स्टेडीयम बनाने के लिए जो अथक परिश्रम किए वो बिलकुल उनके निधन के पूर्व तक जारी रहें। आज रेस कोर्स रोड बास्केटबॉल स्टेडियम  पर रोज़ाना 400-500  बच्चें बास्केटबॉल  खेलने आते हैं उसका श्रेय काफ़ी हद तक स्व भूपेन्द्र जीं को जाता हैं। उनके परिवार ने भी उन्हें ग़ज़ब का साथ दिया, हमेशा।

वे एक अच्छे संघटक रहें, सभी को साथ लेकर चलना उनकी ख़ूबी थीं। खेल प्रशासक आज कतिपय कारणों से विवादों में राहतें हैं, कुछ काफ़ी धनवान हों गए हैं, राजनीति में लिप्त भी पाए जातें है,किंतु भूपेन्द्र बंडी इन सभी माया-मोह से दूर रहें। एक बिरले अपवाद !  कभी पद, पैसा, या सम्मान की लालसा नहीं रखीं। आख़िर तक राजमोहल्ले से  बास्केटबॉल  स्टेडियम तक स्कूटर से आना जाना करते रहें।
      उनके निधन के कुछ ही माह पूर्व जरूर उन्हें दो बड़ीं उपलब्धियाँ देखेंने को मिली जिसके लियें वे तन, मन धन से कोशिश में लगे थे। पहला, एक नए इंंडोर स्टेडियम  का निर्माण और उसके कुछ माह पहलें बास्केट्बॉल एसोसिएशन  से विवाद की समाप्ति। किंतु, भुपेंद्र जीं को अभी जाना नहीं था। उनके  लगाए वृक्षों को तो अभी अभी फल आने लगे थे। काश, कुछ दिन और रूक जातें, भूपेन्द्र भाईं। बास्केटबॉल  आज अपने आप को अनाथ पा रहा हैं।   ( लेखक प्रसिद्ध  पत्रकार , बास्केट्बॉल ट्रस्ट के पूर्व चेयरमन और मप्र क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं)

 

 

 

 

 

 

 

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अभिलाष खांडेकर

 

जन्म : मुंबई 

शिक्षा : एम. ए. राजनिति  विज्ञानं और एम कॉम.

पत्रकारिता : इंदौर में अंग्रेजी दैनिक फ्री प्रेस से 1983 से प्रारम्भ 

अनुभव : दैनिक भास्कर में राजनीतिक  संपादक, संपादक डी एन ए  , दिव्य मराठी 

उल्लेखनीय :हिंदी, मराठी, अंग्रेजी में समान रूप से लेखन।  1992 के विश्व कप कवरेज के दौरान ऑस्ट्रेलिया के एडिलेड में क्रिकेट के पितामह डॉन ब्रेडमैन से साक्षात्कार। पर्यावरण के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय, द नेचर वालेंटियर्स के संस्थापक। आई आई एफ एम भोपाल के सदस्य।  2019 से मप्र क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष। 35 वर्ष सक्रिय पत्रकारिता के बाद  हाल-फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर सक्रिय।  भोपाल में निवास।