किसान आंदोलन से दूर क्यों हैं कांग्रेस की सरकारें...?

किसान आंदोलन से दूर क्यों हैं कांग्रेस की सरकारें...?

मीडियावाला.इन।

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को नोटबंदी के फैसले से इतनी जद्दोजहद नहीं सहनी पड़ी, जितनी उन्हें मात्र दो राज्य पंजाब और हरियाणा के किसान आंदोलन के साथ जूझना पड़ रहा है। अब तो 45 दिनों से कडक़ड़ाती ठंड में लगातार चल रहे किसान आंदोलन को सुप्रीम कोर्ट ने भी संज्ञान में लेते हुए स्पष्ट कर दिया है कि मामला बातचीत से हल किया जाना चाहिए। हालांकि केन्द्र सरकार ने जिन 3 नए कृषि कानूनों को लागू किया है, उससे पूरे देश के किसान नाराज हैं, ऐसा बिलकुल नहीं है, वरना केवल पंजाब और हरियाणा तथा कनाडा और ब्रिटेन के ही किसान आंदोलन में भाग नहीं लेते। और तो और भारत में ही कांग्रेस शासित राज्य छत्तीसगढ़ और राजस्थान तथा विपक्षी दलों के और कई राज्यों से किसान आंदोलन के पक्ष में आवाज तक नहीं उठी, खोज का विषय है। इसका मतलब तो यह भी निकाला जाना चाहिए कि कांग्रेस के नेता और कांग्रेस शासित राज्यों को भी तीनों कृषि कानून बेहद पसंद हैं, वरना पंजाब और हरियाणा के किसान के आंदोलन को सफलता तक पहुंचाने के लिए हर किसान को सामने आना चाहिए था। इसलिए यह भी सही है कि तीनों कृषि कानूनों में आम किसानों का बड़ा हित छिपा हुआ है, जिसे पंजाब और हरियाणा के किसान अपने संपन्न आंदोलन के माध्यम से नजर अंदाज करना चाहते हैं और इसके माध्यम से देश की राजनीति को बदलने में पंजाब और हरियाणा के किसानों की भूमिका को अहम बनाना चाहते हैं। सवाल उठता है कि क्या तीनों कृषि कानूनों में किसानों के हितों का सचमुच में कुठाराघात हो रहा है, यदि किसानों का बड़ा अहित हो रहा है तो मात्र दो राज्य के किसानों का संघर्ष ही सामने क्यों पूरा देश क्यों नहीं, चौंकाने वाला वाक्या है। इस वक्त सच तो यह है कि ‘मीडिया’ की बेहतर भूमिका की जरूरत है, जिससे हम मुंह मोड़ रहे हैं। सवालों की तह तक न जाते हुए वही दिखा रहे है, जो किसान कह रहे है, यदि किसानों की बात में दम है भी तो उनकी मांगों का विश्लेषण किया जाना चाहिए। यह कॉलम मोदी सरकार की तारीफ के लिए लिखा गया कोई जुमला नहीं है, परन्तु यह सवाल है पूरे देश के कांग्रेस नेताओं से या फिर उन राज्यों के नेताओं से, जहां भाजपा की सरकारें नहीं हैं। वहां किसानों के इस बड़े आंदोलन के पक्ष में आवाजें क्यों नहीं उठ रही हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री के नाती संजय नाथ ने कहा कि मोदी सरकार के ये तीनों कृषि कानून ऐतिहासिक हैं। उन्होंने केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर से बकायदा मुलाकात करके आज स्व. लालबहादुर शास्त्री के उस नारे को ताजा कर दिया जिसमें उन्होंने अकाल ग्रस्त भारत में जय-जवान, जय किसान का नारा दिया था। संजय नाथ ने कहा तो नहीं कि प्रधानमंत्री बातचीत के लिए सामने आएं, लेकिन यदि नरेन्द्र दामोदर दास मोदी किसानों से बातचीत करके सीधे उनकी समझ में पड़े पर्दे को हटाने की कोशिश करेंगे तो संभवत: यह किसान आंदोलन 72 घंटे में ही समाप्त हो जाएगा। परन्तु नरेन्द्र मोदी को अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति वाला जिगर किसानों के सामने रखना होगा, शायद यही भावना आज के सुप्रीम कोर्ट के मार्ग दर्शन से भी उजागर होता दिखाई दे रहा है। सवाल उठता है मोदी कितना आगे बढ़ेंगे या जिद पर ही डटे रहेंगे और किसान अडानी-अंबानी चिल्ला-चिल्लाकर सरकार की मुसीबत बढ़ाते रहेंगे। यदि प्रधानमंत्री स्वयं उपवास पर बैठ जाएं और किसानों से अपील करें कि कानून को वापस नहीं लिया जा सकता परन्तु किसानों की अपेक्षा के अनुसार संशोधन किया जा सकता है तो संभवत: परिणाम आ ही जाएगा और पंजाब, हरियाणा के किसानों की वजह पूरे विश्व में सुर्खियां  बटोर रहा इस आंदोलन पर विराम भी लग सकता है। परन्तु यह कांग्रेस के लिए सदमे से कम नहीं होना चाहिए कि जिस आंदोलन को कांग्रेस शासित राज्य पंजाब के किसानों ने खड़ा किया है, उनके साथ कांग्रेस शासित या समर्थित राज्यों के किसान शामिल नहीं हैं। मतलब आम किसानों का मत है कि देश के सीमित एवं लघु किसानों ने ठहरे मन से ही किसान आंदोलन का विरोध किया है, यह बात मीडिया को भी अपनी भूमिका तय करने के पहले समझना ही होगा।

RB

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विजय कुमार दास

  वरिष्ठ पत्रकार श्री विजय दास राष्ट्रीय हिंदी मेल  समाचार प त्र के  प्रधान सम्पादक है .साथ ही पत्रकारिता के सुदीर्घ अनुभवी श्री दास सेन्ट्रल पत्रकार क्लब के संस्थापक है .