अलोकतांत्रिक पाबंदियों का दौर

अलोकतांत्रिक पाबंदियों का दौर

मीडियावाला.इन।

लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी का बड़ा हल्ला होता आया है। इस आजादी के लिए लोग अपनी जान देने तक पर आमादा होते हैं लेकिन आज लोकतंत्र का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार कदम-कदम पर लहू-लुहान नजर आता है। प्रतिकार  से घबड़ाई सत्ता घड़ी-घड़ी अभिव्यक्ति की आजादी छीनने के लिए जायज और नाजायज ,कानूनी और गैर कानूनी सभी तरह के तौर-तरीकों का इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रही है। तुर्रा ये है कि -लोग अभिव्यक्ति  की आजादी का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं।

कानून और व्यवस्था बनाये रखने के लिए सरकार के पास कानून भी है और सशस्त्र बल भी जो निर्बल अवाम के प्रति चाहे जब इस्तेमाल किया जाता रहा है। सत्ता किस दल की है ये महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि सत्ता का चरित्र हमेशा एक जैसा रहता है। आजकल प्रतिकार से निबटने के लिए सबसे पहले 'इंटरनेट'बंद किया जाता है। आज जब पूरी दुनिया में 'इंटरनेट' ही जीवन की सबसे बड़ी जरूरत बन गयी है तब उसी पर बार-बार और लगातार हमला करना एक सोची-समझी साजिश लगती है। 'इंटरनेट' केवल अफवाहें फ़ैलाने के ही काम नहीं आता, आजकल तो इंटरनेट के बिना न अर्थ व्यवस्था चलती है और न अस्पताल ।रोजमर्रा का अधिकाँश काम इंटरनेट पर निर्भर हो गया है।

नयी सरकार ने देश में इंटरनेट की सेवा का विस्तार जिस गति से नहीं किया जिस गति से कि उसे बाधित किया है। जम्मू-कश्मीर से धारा 370  हटाना हो या असम या यूपी में जन आंदोलनों से निबटना हो सबसे पहले इंटरनेट का गला दबाया जाता है, क्योंकि ऐसा करना सरकार के लिए आसान काम है। सरकार आसान काम सबसे पहले करती है। जनता से संवाद करने में हरेक सत्ता की जान निकलती है। सरकार उस अवाम से बात ही नहीं करना चाहती जिसके लिए उसे काम करना होता है। भारत जैसे विशाल देश में जहाँ  अभी इंटरनेट का जाल और गति दोनों दुनिया के दूसरे देशों के मुकाबले बहुत पीछे हैं वहां रोज-रोज इंटरनेट का गला घोंटना घोर आपत्तिजनक है, लेकिन सरकार के खिलाफ न अदालत बोलना चाहती है और न किसी की अंतरात्मा।

'इंटरनेट' आजकल किसी ऑक्सीजन मास्क से कम नहीं है। आप एक पल के लिए इंटरनेट बंद कर दीजिये, सारा जन-जीवन ठहर जाता है। इंटरनेट अब विलासता का साधन नहीं आम आदमी की जरूरियात का साधन है। घर में नाश्ता बुलाने से लेकर नल की मरम्मत तक का काम इसी के जरिये होता है और आप हैं कि सबसे पहले इसी पर हमला करते हैं और फिर ऊपर से ट्वीट भी करते हैं, जो किसी तक पहुंचता ही नहीं है, क्योंकि इंटरनेट तो पहले ही निर्जीव कर दिया जाता है। जैसे फोन टेपिंग अपराध है वैसे ही इंटरनेट को बाधित करना भी अपराध होना चाहिए फिर भले ही ये अपराध कोई सरकार करे या संस्था। इंटरनेट का इस्तेमाल केवल उस सूरत में रोका जाना चाहिए जब देश पर कोई विदेशी आक्रमण हो रहा हो या देश किसी बड़ी आपदा से जूझ रहा हो।

आपको  जानकर हैरानी होगी कि दक्षिण एशियाई देशों के लोगों के सामने मई 2017 से अप्रैल 2018 के बीच इंटरनेट बंद होने की कम से कम 97 घटनाएं हुईं। अकेले भारत में ऐसे 82 मामले सामने आए। ‘यूनेस्को इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट’ की ओर से हाल में जारी ‘क्लैंपडाउंस एंड करेज- साउथ एशिया प्रेस फ्रीडम रिपोर्ट 2017-18’ के अनुसार पाकिस्तान में इंटरनेट सेवा बंद होने की 12 घटनाएं हुईं जबकि अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में ऐसी एक-एक घटनाएं हुई हैं। ‘ब्रॉडबैंड या मोबाइल इंटरनेट या इंटरनेट आधारित मोबाइल ऐप पर जानबूझकर व्यवधान पैदा करना (जो अधिकारियों के आदेश या सत्ता के ख़िलाफ़ लोगों को रोकने के लिए होता है) संचार या ऑनलाइन सामग्री को नियंत्रित या धीमा किया जाने के उद्देश्य से होता है, ताकि जनता तक बात न पहुंचे।’ बहुत सारे मामलों में पाया गया है कि इंटरनेट सेवा बंद करने के पीछे कानून व्यवस्था का हवाला दिया जाता है और बहुत बार देखा गया है कि इसलिए भी इंटरनेट सेवा बंद हुई है क्योंकि संभावित हिंसा को रोकने के लिए प्रतिक्रियाशील उपाय के रूप में कदम उठाया गया है।

आजकल देश नागरिकता संशोधित क़ानून के विरोध के कारण अस्तव्यस्त है। सरकार को बार-बार स्थिति से निबटने के लिए इंटरनेट को बाधित करना पड़ रहा है। जनता में संवाद कायम न हो इसके लिए सरकार ने लाठी-गोली तक चला ली लेकिन प्रतिकार नहीं रुका। अब इंटरनेट पर पाबन्दी लगी है, लेकिन प्रतिकार नहीं रुक रहा। सरकार ये समझने की कोशिश ही नहीं कर रही कि प्रतिकार पाबंदियों से नहीं संवाद से रुकेगा। अगर किसी क़ानून को लेकर सचमुच कोई गलतफहमी है तो उसे दूर करने के उपाय किये जाना चाहिए, केवल विज्ञापन देने से बात नहीं बनेगी। आपके पास जनसंख्या बल है, सांसद हैं, विधायक हैं, 30  करोड़ कार्यकर्ता हैं, उन्हें मैदान में उतरिये, जिस नेट सेवा को आप बार-बार बंद करते हैं उसका इस्तेमाल गलतफहमी दूर करने के लिए कीजिये, शायद बात बन जाये। पाबन्दी किसी समस्या का हल नहीं है। चीन ने हॉंकॉंग में क्या कुछ नहीं किया, लेकिन क्या वहां प्रतिकार रुक गया?

हमें स्वीकार करना होगा कि जैसे सुमति, कुमति सबके भीतर होती है वैसे ही समर्थन और विरोध का भाव भी सभी के भीतर होता है, ये प्रकृति प्रदत्त गन है, इसे आप किसी क़ानून या औषधि से समाप्त नहीं कर सकते। जैसे समर्थन सहज है वैसे भी विरोध भी सहज है और उसे इसी सहजता से लिया जाना चाहिए। प्रतिकार को शत्रुभाव समझने वाले लोग और सरकारें नासमझ हैं। प्रतिकार को आप जितना रोकियेगा उतना ही ये बढ़ेगा। इसका शमन बातचीत से ही मुमकिन है। शंकाओं का समाधान आसान काम है, पाबंदियों से भी ज्यादा आसान। एक बार करके तो देखिये।

RB

0 comments      

Add Comment


राकेश अचल

राकेश अचल ग्वालियर - चंबल क्षेत्र के वरिष्ठ और जाने माने पत्रकार है। वर्तमान वे फ्री लांस पत्रकार है। वे आज तक के ग्वालियर के रिपोर्टर रहे है।