
Film Review: कंगना की आत्म केन्द्रित फिल्म : भारत भाग्य विधाता
– डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी
जब फिल्म के इंटरवल से पहले ही दर्शक सिनेमा हॉल से बाहर जाने लगे, तब एहसास हुआ कि भारत की भाग्य विधाता जनता ने कंगना रनौत की फिल्म को सिरे से खारिज कर दिया है।
सांसद कैसी भी हों, लेकिन वे दमदार अभिनेत्री हैं। पद्मश्री से सम्मानित हैं, पाँच फिल्मफेयर अवॉर्ड और चार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले हैं। लेकिन इस फिल्म में दर्शक उन्हें पसंद नहीं कर रहे। कंगना जिस फिल्म की निर्माता भी होती हैं, उसमें पूरी कहानी उनके इर्द-गिर्द ही घूमती है और बाकी सब किरदार ना-कुछ हो जाते हैं। इसलिए एक महत्वपूर्ण विषय पर बनी फिल्म भी दर्शक पसंद नहीं कर रहे।

26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमलों के बैकड्रॉप में फिल्म है। मुंबई वीटी के पास स्थित मैडम कामा अस्पताल में आतंकवादी अजमल कसाब और उसके साथी ने 26 नवंबर की रात हमला किया था। अस्पताल के स्टाफ, डॉक्टरों, नर्सों और सुरक्षा कर्मियों ने वहाँ मौजूद करीब 400 लोगों की जान बचाई थी। उन्होंने अस्पताल की बत्तियाँ बंद कर दी थीं और सभी दरवाजों पर ताले लगा दिए थे। आतंकवादियों को पहले लगा कि शायद अस्पताल खाली है, लेकिन वे ज्यादा नुकसान नहीं पहुँचा पाए।

कंगना ने इस फिल्म में कामा अस्पताल की नर्स गीता माधव गांधारे की भूमिका निभाई है। यह किरदार स्टाफ नर्स अंजलि कुलथे और सिस्टर माधुरी रहाटे के वास्तविक जीवन से प्रेरित है।
इन नर्सों ने वार्ड बॉय और सुरक्षा कर्मियों की मदद से मरीजों को बेड के नीचे फर्श पर लिटा दिया था, ताकि उन्हें खिड़कियों से आने वाली गोलियों न लगें। रोते हुए नवजात शिशुओं और डरी हुई माताओं को चुप कराया था, अस्पताल की लाइटें बंद कर दी थीं और आतंकियों को यह भ्रम बनाए रखा था कि अस्पताल में कोई नहीं है।
कामा अस्पताल के स्टाफ ने घायल पुलिसकर्मियों और नागरिकों को प्राथमिक उपचार देते हुए खुद को छुपाते हुए सुरक्षित रास्ते भी तलाशे। उनकी सक्रियता के कारण आतंकी अजमल कसाब और उसके साथी अस्पताल के वार्डों के अंदर नहीं घुस पाए और बाहर के इलाके में ही घूमते रहे।
कसाब को कोर्ट में देविका रोटावन ने पहचाना था, जो उस समय 9 साल की थीं और हमले में घायल हुई थीं। देविका की गवाही पर ही अजमल कसाब को 21 नवम्बर 2012 को पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में फांसी दी गई थी और वहीं दफना दिया गया था। फिल्म में देविका रोटावन का जिक्र तक नहीं है। नर्स की गवाही को ही महिमामंडित किया गया है।
फिल्म निर्माता और अभिनेत्री कंगना रनौत ने नर्स गीता गांधारे का रोल करते हुए पूरा का पूरा लाइन लाइट अपने ऊपर ही केंद्रित रखा है। पूरी फिल्म में अस्पताल का एक भी डॉक्टर नहीं दिखाया गया, जिसने मरीजों की जान बचाने के लिए सक्रिय योगदान दिया हो।
अस्पताल के सीनियर स्टाफ को मजाक का पात्र बना दिया गया है और स्वास्थ्य मंत्री तथा पूरी व्यवस्था को उपहास के केंद्र में रखा गया है। वास्तविकता यह है कि कामा अस्पताल के मरीजों को बचाने में सुरक्षाकर्मियों, डॉक्टरों, नर्सों और तमाम स्टाफ का सामूहिक योगदान था।
इस फिल्म में कंगना रनौत को ग्लैमर दिखाने का मौका नहीं मिला, लेकिन उनकी तारीफ करनी होगी कि उन्होंने ऐसी गंभीर भूमिका भी स्वीकार की। फिल्म के बाकी सभी कलाकार कंगना रनौत की तुलना में उतने मशहूर नहीं हैं, इसलिए फिल्म की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर ही आ गई।
गिरिजा ओक, स्मिता तांबे, प्रिया अर्जुन,जाहिद खान, सुहित आदि के भी रोल हैं, लेकिन वे इतने महत्वपूर्ण नहीं बने।
फिल्म में कंगना रनौत के डायलॉग अच्छे हैं। वर्दी केवल आर्मी, नेवी, एयरफोर्स, डॉक्टरों और वकीलों की ही महत्वपूर्ण नहीं होती, नर्सों की वर्दी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
कामा अस्पताल एक सरकारी अस्पताल है और वहाँ मंत्रियों के घर से फोन आते रहते हैं। मेडिकल सुपरिंटेंडेंट बात-बात पर प्रोटोकॉल और सरकारी नियम याद दिलाती है। इसी चक्कर में मूल कहानी को आगे बढ़ाने में काफी समय लग जाता है।
फिल्म नर्सों की जिंदगी के बारे में बताने में भी काफी वक्त देती है। दूसरे प्रोफेशन की तरह नर्सिंग प्रोफेशन में भी अनेक चुनौतियाँ हैं, तमाम तरह के दबाव, घर-परिवार की जिम्मेदारियाँ और समाज से अपेक्षित सम्मान न मिलना। ये सारी बातें फिल्म में दिखाई गई हैं।
यह फिल्म कई स्थानों पर आत्म-प्रशस्ति की शिकार है। कहीं-कहीं स्क्रीनप्ले बहुत कमजोर लगता है, जो कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय कंगना के किरदार को महान दिखाने पर ही केंद्रित रहता है। यह लॉजिक भी अटपटा लगता है कि कंगना अकेले ही पूरे महकमे में उँगलियाँ चला रही हैं।
वास्तविकता में उस खौफनाक रात को अस्पताल केसभी कर्मचारियों ने बहुत सूझबूझ और बहादुरी दिखाई। बिना किसी हथियार के सिर्फ अपने साहस के दम पर उन्होंने आतंकियों को अपने मंसूबों में कामयाब नहीं होने दिया। यह एक असाधारण घटना है।
अपने आप को सुपरस्टार से भी अधिक दिखाने की कोशिश में कंगना रनौत की फिल्में लगातार फ्लॉप हो रही हैं। अच्छी पृष्ठभूमि और गंभीर विषय होने के बावजूद यह फिल्म दर्शकों के लिए झेलना मुश्किल है। हाँ, इसमें पुलिस कर्मियों का व्यवहार और कर्तव्यनिष्ठा सराहनीय दिखाई गई है।
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