
Film Review: वेलकम टू द जंगल या वेलकम टू द अजायबघर
डॉ प्रकाश हिंदुस्तानी
वेलकम टू द जंगल कोई फ़िल्म है या अवॉर्ड फ़ंक्शन में कलाकारों की भीड़? यह किसी स्कूल का एनुअल फ़ंक्शन तो नहीं, जहाँ तीस–चालीस बच्चों को स्टेज पर खड़ा कर दिया गया हो ताकि उनके अभिभावक फोटो खींच सकें! या फिर किसी शादी के महिला संगीत कार्यक्रम में पूरे खानदान की रंगारंग पेशकश!
इसमें अक्षय कुमार डबल रोल में हैं और परेश रावल के साथ सुनील शेट्टी, अरशद वारसी, दिशा पाटनी, जैकलीन फर्नांडिस, लारा दत्ता, राजपाल यादव, जाकिर हुसैन, जैकी श्रॉफ, रवीना टंडन, यशपाल शर्मा, जॉनी लीवर, श्रेयस तलपड़े, मुकेश तिवारी, आफताब शिवदासानी, फरीदा जलाल, दलेर मेहंदी, तुषार कपूर, कृष्णा अभिषेक, कीकू शारदा, विंदू दारा सिंह, फिरोज़ खान, पुनीत इस्सर, सयाजी शिंदे, सुदेश बेरी, किरण कुमार, हेमंत पांडे, नवाब शाह, वृहि कोडवारा, पंकज धीर आदि आदि इत्यादि भी हैं। कलाकारों की भर्ती थोकबंद है!
इसमें हिंदी फ़िल्मों के कलाकार हैं, भोजपुरी और पंजाबी फ़िल्मों के कलाकार हैं, टीवी कलाकार हैं, पुराने धार्मिक धारावाहिकों के कलाकार हैं। जो भी मिला, मानो रोजगार कार्यालय की भर्ती की तरह शामिल कर लिया गया। कुल मिलाकर पूरी बॉलीवुड पंचायत जंगल में बैठ गई। महाभारत वाले चेहरे (पंकज धीर, फिरोज़ खान, पुनीत इस्सर) भी एंट्री मारते हैं—धूम-धड़ाका, तुनक-तुनक, घिस-घिस!
वेलकम टू द जंगल शायद इसीलिए बनाई गई है कि देखो, हम कितने सारे कलाकारों की भीड़ इकट्ठी कर सकते हैं। इस फ़िल्म में नकली जंगल है, नकली शोर है, लोग हैं, भागदौड़ है, डायलॉग हैं और कुछ पात्र ऐसे हैं जो कभी-कभी सिर्फ़ उपस्थिति दर्ज कराने आ जाते हैं।
जब अक्षय कुमार के सामने रवीना टंडन आती है, तब लगता है कि गाना बजेगा – टिप टिप बरसा पानी, पर यहाँ तो रवीना का मुख्य किरदार त्योरियां चढ़ाकर हर किसी पर थूकने का ही है।
कल्पना कीजिए कि फौजी के रूप में कीकू शारदा आपको कैसा लगेगा? किसी तोतले का मज़ाक? क्या आप किसी बुजुर्ग की पोपली जबान पर हँस सकेंगे? शुद्ध उर्दू अल्फ़ाज़ से चिढ़ेंगे या उसके कायल हो जायेंगे?
आपको कैसा लगेगा जब फिल्म में आप हमारे बहादुर वरिष्ठ फौजी अधिकारियों को एक टुच्चे से आतंकी की निजी कैद में देखेंगे? यहाँ आतंकी शोले का गब्बर जैसा है, जिसने पीओके के आजादगंज को शोले का रामगढ़ बना रक्खा है!
डायरेक्टर ने शायद सोचा होगा – एक मिनट में जितने कलाकार पर्दे पर ला सकते हो, ले आओ। किसी न किसी को देखकर दर्शक हँस ही देगा। लतीफ़े भी वैसे ही हैं जैसे व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से सीधे आयात किए गए हों। जैसे दसवीं मंज़िल पर पेट्रोल पंप खोल दो, कोई आएगा नहीं और नुकसान होगा।
भारतीय शादियों के महिला संगीत में एक परंपरा होती है—पूरे खानदान के लोग स्टेज पर प्रस्तुति देने आ जाते हैं। बड़े फूफा, छोटे चाचा, ताऊ, साला, जीजा, चुन्नू, मुन्नू, भैया की साली, भाभी की बहन कोई नहीं बचता। वैसा ही इस फ़िल्म में हुआ है।
अभी ऐसी टेक्नोलॉजी विकसित नहीं हुई है कि कोई व्यक्ति अपना दिमाग घर पर रखकर सिनेमा हॉल चला जाए। इसलिए मजबूरी में आप दिमाग साथ लेकर जाते हैं। लेकिन जब हॉल से बाहर निकलते हैं और कोई पूछता है – फ़िल्म कैसी लगी? तब अचानक ख्याल आता है – अरे, आप कोई फ़िल्म देखकर आ रहे थे क्या?
फ़िल्म की शुरुआत दिलचस्प है। एक टैक्स-चोर अमीर आदमी अपनी काली कमाई को सफेद करने के लिए बहुत बड़े बजट की फ्लॉप फ़िल्म बनाने का प्लान बनाता है। लेकिन उसका प्लान ही बीच में फ्लॉप हो जाता है। इस कहानी के आसपास जो कुछ आ सकता था, वह सब आ गया—हँसी-मज़ाक, एक्टिंग, ओवरएक्टिंग, नॉस्टैल्जिया, व्हाट्सऐप वाले लतीफ़े, हेलीकॉप्टर, कश्मीर, पीओके, आतंकवादी, शूटिंग के कलाकार, नकली आतंकवादी, आइटम सॉन्ग, भोजपुरी तड़का, ग्लैमर और पेपराज़ी।
फ़िल्म के अंत से ज़्यादा रोचक इसका इंटरवल है। इसलिए इंटरवल में तुरंत मत उठिए, वरना गड़बड़ हो जाएगी।
मुझे फ़िल्म के कुछ संवाद अच्छे लगे, क्योंकि वे यथार्थ से मेल खाते हैं। एक जगह अक्षय कुमार कहते हैं—
“हमें इस वतन से, यहाँ की मिट्टी से कुछ लेना-देना नहीं है। हम सब भांड हैं, पैसे के लिए कुछ भी कर सकते हैं!”
फ़िल्म की कहानी में कुछ ऐसे मोड़ भी हैं जिनसे लगता है कि जिन्हें हम गुंडा कहते हैं, थोड़ा-बहुत ज़मीर उन्हीं लोगों में बचा हुआ है।
हालाँकि भारतीय सेना की जो पैरोडी इसमें की गई है, वह खटकती है। और बॉडी-शेमिंग को लेकर जो संवाद और दृश्य हैं, वे भी अनावश्यक लगते हैं।
बाकी जो है, सो है। यह फिल्म देश के संसाधनों के दुरूपयोग का नमूना है।
मुझे पता है कि मेरी तारीफ़ करने से आप फ़िल्म देखने नहीं चले जाएँगे और अगर मैं कहूँ कि फ़िल्म बकवास है तो भी आप देखने से नहीं रुकेंगे।
इसलिए—
वेलकम टू द जंगल।
लेकिन यह जंगल नहीं है।
इसका नाम होना चाहिए था—
वेलकम टू द अजायबघर।
देखने चले जाइये, अजायबघर की कोई न कोई चीज़ तो पसंद आ ही जाएगी।
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