
मर्सिडीज से स्टेज शो तक: गोविंदा को लेकर सोशल मीडिया पर क्यों मची है चर्चा
▪️राजेश जयंत
सोशल मीडिया इन दिनों एक अजीब किस्म की फिल्मी पटकथा लिख रहा है, जिसके केंद्र में हैं 90 के दशक के सुपरस्टार गोविंदा। वह अभिनेता, जिसने कभी अपने अंदाज, डांस और संवादों से हिंदी सिनेमा पर राज किया, आज सोशल मीडिया की अदालत में खड़ा है। वायरल पोस्ट्स में दावा किया जा रहा है कि जो गोविंदा कभी मर्सिडीज और बीएमडब्ल्यू से नीचे की कारों में बैठना पसंद नहीं करते थे, वही अब छोटे शहरों में स्टेज शो, आर्केस्ट्रा, शादी और बर्थडे कार्यक्रमों में डांस करते नजर आ रहे हैं। इसी के साथ उनके निजी जीवन को लेकर भी तरह-तरह के संकेत और टिप्पणियां जोड़ दी गई हैं।

● सोशल मीडिया का नैरेटिव क्या है
इन वायरल पोस्ट्स का मूल भाव “डाउनफॉल” का है। कहा जा रहा है कि करियर की गलतियां, वक्त पर लिए गए फैसलों की कमी और निजी जीवन के उतार-चढ़ाव ने एक सुपरस्टार को इस मुकाम तक पहुंचा दिया। कुछ लोग इसे भाग्य से जोड़ रहे हैं, कुछ इसे रिश्तों के बिगड़ने से, तो कुछ पारंपरिक सोच के सहारे यह कहने से भी नहीं चूक रहे कि जब “घर की लक्ष्मी रूठती है” तो जीवन की दिशा बदल जाती है।

● हकीकत और धारणा के बीच की महीन रेखा
सच्चाई इतनी सरल नहीं होती, जितनी सोशल मीडिया पोस्ट्स में दिखा दी जाती है। स्टेज शो करना या निजी आयोजनों में परफॉर्म करना किसी कलाकार का पतन नहीं, बल्कि उसके करियर का एक अलग चरण हो सकता है। देश ही नहीं, दुनिया भर में बड़े कलाकार लाइव शो, इवेंट्स और निजी कार्यक्रमों के जरिए अपने दर्शकों से जुड़े रहते हैं। गोविंदा आज भी एक ब्रांड नेम हैं। उनकी पुरानी फिल्में, गाने और डायलॉग आज भी टीवी, ओटीटी और सोशल मीडिया पर उतने ही लोकप्रिय हैं। निजी जीवन से जुड़े दावे अधिकतर कयास, अफवाह और अनुमान हैं, जिनकी कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आती।

● फेम का सच और वक्त का खेल
सिनेमा की दुनिया में शोहरत किसी स्थायी संपत्ति की तरह नहीं होती। आज तालियों की गूंज होती है, तो कल सन्नाटा भी मिल सकता है। स्टारडम एक ऊंची लहर की तरह होता है, जो कभी शिखर पर ले जाती है, तो कभी किनारे छोड़ जाती है। मंच बदल जाना, काम का स्वरूप बदल जाना, इसका मतलब यह नहीं कि कलाकार खत्म हो गया। कई बार यह सिर्फ समय के साथ खुद को जिंदा रखने की कोशिश होती है।

● क्यों वायरल हो रही हैं ऐसी पोस्ट्स
असल में सोशल मीडिया को उत्थान से ज्यादा पतन की कहानियां आकर्षित करती हैं। एक चमकते सितारे को गिरते हुए देखने का नैरेटिव ज्यादा लाइक, ज्यादा शेयर और ज्यादा टिप्पणियां बटोरता है। यहां संवेदना कम होती है और सनसनी ज्यादा। किसी के संघर्ष, उसकी मजबूरी या उसके चुनाव को समझने की जगह, उसे जज करना ज्यादा आसान होता है।
● असली सबक क्या है
गोविंदा की कहानी, जैसी भी हो, यह याद दिलाती है कि सिनेमा और जिंदगी दोनों अनिश्चित हैं। शोहरत स्थायी नहीं होती और सफलता हमेशा एक सी नहीं रहती। मंच बदल सकता है, हालात बदल सकते हैं, लेकिन गरिमा के साथ आगे बढ़ना ही असली जीत होती है। यह कहानी सिर्फ एक अभिनेता की नहीं, बल्कि हर उस इंसान की है जिसने कभी ऊंचाई देखी हो और वक्त के थपेड़ों से गुजरा हो।
संदेश
कामयाबी मिले तो घमंड मत करो और जब वक्त बदले, तो इंसानियत मत छोड़ो। क्योंकि जिंदगी किसी फिल्म की तरह तय स्क्रिप्ट पर नहीं चलती, यहां हर सीन नया होता है, हर मोड़ अनिश्चित होता है।





