
चुनावी जीत हार की बिसात बिछाती सर्वे कंपनियों के खेल में कितना दम ?
आलोक मेहता
चुनाव का मौसम है, हर कोई अपने-अपने आकलन दे रहा है. कोई ओपिनियन पोल, कोई चुनावी सर्वे, कोई पर्सनल ओपिनियन तो कोई कुछ और. लेकिन इन सबसे ऊपर एग्जिट पोल माना जाता है | इसके आने से अंदाज लग सकता है कि किस पार्टी की हवा तेज है, कौन चुनावों में बाजी मारेगा | अब लोगों की निगाहें इस सप्ताह विभिन्न समाचार चैनलों की ओर से पेश किए गए 5 राज्यों के चुनावी एग्जिट पोल्स पर लगी है | खासकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के एग्जिट पोल में सर्वे कंपनियों की अग्नि परीक्षा है | बंगाल के सर्वे साबित होने पर भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ जाएगा | डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा स्थापित जनसंघ – भारतीय जनता पार्टी हिंदुत्व और विकास के रथ पर भगवा और तिरंगे झंडे लहराते हुए सत्ता में आ सकती है | दूसरी तरफ एग्जिट पोल के केरल का गणित सही साबित होने पर भारत में लाल झंडे वाली कम्युनिस्ट पार्टियों की सत्ता किसी भी राज्य में नहीं होने का स्वर्णिम अध्याय जुड़ सकता है | मतगणना से पहले यह एग्जिट पोल क्या सच में बिलकुल सटीक नतीजे बताते हैं?
भारतीय चुनावों में राजनीतिक पार्टियां , फण्ड करने वाली कारपोरेट कंपनियां , भविष्य की सरकारों की संभावनाएं टटोलने वाली विदेशी शक्तियां हाल के वर्षों में कथित चुनावी रणनीतिकारों – उनकी सर्वे कंपनियों पर करोड़ों रुपया खर्च कर रही हैं | जब ऐसी कंपनियों के ओपिनियन और एग्जिट पोल ही नहीं विभिन्न चुनाव क्षेत्रों के सही गलत उम्मीदवारों के आकलन – सलाह पर कांग्रेस या भाजपा या क्षेत्रीय पार्टियों के शीर्ष नेता फैसले करने लगते हैं , तो दशकों से जमीनी काम करते और जनता से जुड़े नेता परेशान रहते हैं |
इसमें कोई शक नहीं कि अमेरिका और यूरोप की तरह विभिन्न देशों में पहले व्यापारिक बाजार के उपभोक्ताओं की पसंद या चुनावी तैयारी के लिए जनता का मूड जानने के लिए दशकों पहले सर्वे का प्रयोग शुरु हुआ | चुनावी सर्वे की शुरुआत सबसे पहले अमेरिका में हुई | जॉर्ज गैलप और क्लॉड रोबिंसन ने अमेरिकी सरकार के कामकाज पर लोगों की राय जानने के लिए ये सर्वे किया था | उसके बाद ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और डेनमार्क में भी चुनाव से पहले सर्वे हुए| ये 1930 और 1940 का दशक था | एग्जिट पोल की शुरुआत काफी बाद में हुई. टाइम मैगजीन के मुताबिक, 1967 में पहली बार दुनिया में बड़े स्तर पर कोई एग्जिट पोल किया गया था |अमेरिका के पॉलिटिकल रिसर्चर वॉरेन मिटोफस्की ने केंटुकी राज्य में होने वाले गवर्नर चुनाव के दौरान पहली बार एग्जिट पोल किया था | डच समाजशास्त्री मार्सेल वैन डैम ने इसी साल 15 फरवरी को नीदरलैंड्स के आम चुनाव के दौरान उम्मीदवारों को लेकर एक सर्वे किया था | दोनों ही जगहों पर एक्सपर्ट ये जानने की कोशिश कर रहे थे कि लोग आखिर किसे और क्यों वोट कर रहे हैं? इसके बाद वॉरेन और मार्सेल का ये तरीका मीडिया कंपनियां इस्तेमाल करने लगीं | मीडिया कंपनियों की वजह से 1970 के दशक में अमेरिका और पश्चिमी देशों में तेजी से एग्जिट पोल का कल्चर बढ़ने लगा. मतदान से नतीजों के बीच लोगों की उत्सुकता को कैटर करने के लिए मीडिया एग्जिट पोल का सहारा लेता था |
1980 में एग्जिट पोल पहली बार विवादों में आए. इस साल अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हो रहे थे. मीडिया कंपनी NBC ने मतदान खत्म होने से 3 घंटे पहले ही एग्जिट पोल जारी कर दिए. इस पोल में बताया गया कि जिमी कार्टर को हराकर रोनाल्ड रीगन चुनाव जीत रहे हैं. इसको लेकर जिमी के समर्थकों ने जोरदार विरोध किया | बाद में ये मामला अमेरिकी संसद में उठा | इस सर्वे ने मतदाताओं को कितना प्रभावित किया है, ये पता लगाने के लिए जांच कराई गई | इसके बाद मतदान खत्म होने से पहले एग्जिट पोल जारी होने पर अमेरिका में पाबंदी लगा दी गई | बाद में यही लर्निंग दुनिया के दूसरे देशों ने भी अपनाई |
भारत में सबसे पहली बार एग्जिट पोल 1957 में भारतीय जनमत संस्थान (इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक ऑपिनियन) ने करवाया था | जनमत संस्थान के प्रमुख एरिक डी कोस्टा को भारत में एग्जिट पोल का जनक माना जाता है |नब्बे के दशक में सैटेलाइट टीवी के जरिए सर्वेलोगों के घरों में पहुंचा | दूरदर्शन ने दिल्ली में मौजूद सेंटर फॉर द डेवलपिंग सोसाइटीज को पूरे देशभर में चुनावी सर्वे करने के लिए कहा| यह एग्जिट पोल का भारतीय चुनाव और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ रिश्ते की शुरुआत थी |प्रणव रॉय ने इंडिया टुडे पत्रिका से शुरुवात की और फिर धीरे धीरे स्वयं एक बड़ी मीडिया कंपनी टी वी कंपनी के संस्थापक हो गए | लेकिन पिछले दस वर्षों में चुनावी रणनीतिकारों – सर्वे कंपनियों की पचासों दुकानें खुल गई हैं | ज्योतिष की भविष्यवाणियों की तरह कभी किसीका अनुमान सही निकल जाता है और अधिकांश का गलत हो , तब वे आंकड़ों के खेल और नेताओं की कमजोरियां गिनाकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं | कुछ साल पहले तो ऐसी कुछ कंपनियों का ही स्टिंग ऑपरेशन करके एक टी वी चैनल पर भंडाफोड़ भी हुआ | लेकिन राजनीति के पश्चिमी शिक्षित दीक्षित कई बड़े नेता अपने पार्टी के प्रादेशिक और स्थानीय नेताओं के बजाय इन दुकानदारों पर भरोसा करते हैं |
एग्जिट पोल में आमतौर पर मतदाता की जानकारी से संबंधित सवाल शामिल होते हैं. मतदाता की उम्र और उसकी शिक्षा जैसी जानकारियां उससे पूछी जाती हैं. इन सर्वे में यह भी देखा जाता है कि इसके पहले वो मतदाता किसे वोट देता था और इस चुनाव में उसने किसे वोट दिया है. इसमें यह भी पता करने की कोशिश की जाती है कि किसी मतदाता ने किसी पार्टी को वोट क्यों दिया है. वह मतदाता किस चुनावी मुद्दे से प्रभावित रहा है, यह समझने की कोशिश की जाती है.
बाजार का अध्ययन करने वाली कंपनी एक्सिस माई इंडिया ने पिछले वर्षों में मीडिया संस्थानों में अपनी साख जमाई और कहा था कि वह 25 करोड़ परिवारों से जुड़ने के लिए 500 करोड़ का निवेश करेगी। इसके लिए कंपनी दोतरफा संचार समस्या समाधान पर ध्यान देने के साथ एक डिजिटल मंच विकसित कर रही है।एक्सिस माय इंडिया के संस्थापक और अध्यक्ष प्रदीप गुप्ता ने कहा था कि कंपनी की परियोजना में 500 करोड़ रुपये तक का निवेश करने की योजना है। इसे ऋण और इक्विटी डाइल्यूशन के जरिये जुटाया जाएगा।एक्सिस माई इंडिया की शुरुआत वर्ष 1998 में हुई थी। कंपनी को दरअसल लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनावों के दौरान सर्वेक्षण करने के लिए जाना जाता है और इसी के जरिये उसने लगभग 8.5 करोड़ घरों तक पहुंचने का दावा किया है।
गुप्ता ने कहा था -‘एग्जिट पोल या ओपिनियन पोल बाजार के अनुसंधान का हिस्सा होते हैं। हमारे पास सभी 25 करोड़ भारतीय परिवारों की समस्याओं को हल करने की एक दृष्टि है। यह एक महत्वाकांक्षी योजना है और निस्संदेह रूप से बहुत चुनौतीपूर्ण भी है।’’ मजेदार बात यह है कि एक महत्वपूर्ण चुनाव के एग्जिट पोल पर कभी न्यूज़ चैनल के स्टूडियो में नामी एंकर राजदीप सरदेसाई के साथ डांस करने वाले अगली बार अपने अनुमान गलत साबित होने पर स्टूडियो में आंसू बहाते माफ़ी मांगते दिखे |
इस बार पश्चिम बंगाल में संभावित नतीजों को लेकर प्रमुख जनमत सर्वेक्षण एजेंसियों ने एग्जिट पोल के अनुमान जारी किए , जो एक विभाजित तस्वीर पेश करते हैं। कुछ सर्वेक्षणों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जीत का अनुमान लगाया गया , जबकि कुछ का कहना था कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) राज्य में पिछले 15 वर्षों से चली आ रही अपनी सत्ता बरकरार रखेगी।
एक्सिस -माई इंडिया के संस्थापक प्रदीप गुप्ता ने पश्चिम बंगाल चुनाव के लिए एग्जिट पोल का अनुमान जारी नहीं करने की घोषणा करके सारे सर्वेक्षणों पर प्रश्न चिन्ह लगाने की कोशिश की है | गुप्ता ने अपने निर्णय का कारण यह बताया कि मतदाता यह बताने से बच रहे हैं कि उन्होंने किसे वोट दिया है।एक प्रेस विज्ञप्ति में गुप्ता ने कहा कि एक्सिस माई इंडिया ने पश्चिम बंगाल के सभी 294 विधानसभा क्षेत्रों में सुनियोजित क्षेत्रीय अनुसंधान अभियान चलाया। उन्होंने आगे बताया कि 16 स्वतंत्र क्षेत्रीय इकाइयों में संगठित 80 प्रशिक्षित सर्वेक्षकों की एक टीम ने मानकीकृत एग्जिट पोल पद्धति का उपयोग करते हुए मतदाताओं के साक्षात्कार आयोजित किए, जिसमें 13,250 से अधिक उत्तरदाताओं का नमूना शामिल था।“पश्चिम बंगाल में किए गए फील्डवर्क में एक असामान्य और सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण चुनौती सामने आई। हमने असाधारण रूप से उच्च गैर-प्रतिक्रिया दर देखी, जिसमें लगभग 70% मतदाताओं ने सर्वेक्षण में भाग लेने से इनकार कर दिया। हालांकि उत्तरदाताओं की कुछ हद तक झिझक को हमारे सैंपलिंग मॉडल में शामिल किया गया है, लेकिन इस स्तर की अस्वीकृति दर ऐतिहासिक मानदंडों से काफी अधिक है और इससे गैर-प्रतिक्रिया पूर्वाग्रह का उच्च स्तर उत्पन्न होता है|” बयान में कहा गया कि हमारी टीमों ने फील्डवर्क पूरा करने के लिए 8,324 किलोमीटर से अधिक की यात्रा की, और हमने पश्चिम बंगाल के लिए निष्कर्ष प्रकाशित करने की तैयारी कर ली थी। हालांकि, डेटा की गुणवत्ता, प्रतिक्रिया वितरण और सांख्यिकीय विश्वास स्तरों की विस्तृत आंतरिक समीक्षा के बाद, हमने राज्य के लिए एग्जिट पोल के अनुमान जारी न करने का निर्णय लिया |” सो अब चुनावी सर्वेक्षणों को लेकर हर तरह के दांव पेंच और नाटक जारी हैं | इन बड़ी कंपनियों को देखकर देश भर में अनेकों चुनावी कम्पनियाँ और कथित रणनीतिकार खड़े हो गए हैं | यह बिजनेस चमक रहा है | ज्योतिष की तरह विभिन्न वर्गों को प्रभावित प्रसन्न करने के लिए उनके खेल जारी रहेंगे |





