स्मृति शेष – रघु राय : वे कैमरे से नहीं मन से तस्वीरें लेते थे , मन को छू लेती थी…

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स्मृति शेष – रघु राय : वे कैमरे से नहीं मन से तस्वीरें लेते थे , मन को छू लेती थी…

– जय नागड़ा

यदि हम लता मंगेशकर जी को संगीत की देवी और सचिन तेंडुलकर जी को क्रिकेट के भगवान का दर्ज़ा देते है तो फिर रघु राय सर को फोटोग्राफी का भगवान कहने में कोई संकोच नहीं हो सकता… बेशक मेरे लिए वे फोटोग्राफी के भगवान भी थे और द्रोणाचार्य भी… द्रोणाचार्य इसलिए कि मेरे जैसे कई एकलव्यों ने उनकी खींची तस्वीरें देखकर ही फ़ोटोग्राफ़ी सीखी। मैं तो बहुत सौभाग्यशाली रहा कि उनके सानिध्य में तीन दिन रहने का अवसर मिला जिसने मेरी समझ और दृष्टि दोनों बदल दी…

आज जब रघु राय सर के इस दुनिया को अलविदा कहने की ख़बर आई तो ज़ेहन में वे स्मृतियाँ तेज़ी से घूम आई जो धरोहर के रूप में मेरे जीवन में समाई हुई है। फोटोग्राफी में मैंने अपना कॅरियर शुरू किया ही था तब मैगजीन में रघु राय सर की खींची तस्वीरें देखकर बेहद प्रभावित होते थे ,वे कब हमारे रोल मॉडल बन गए हमें खुद नहीं पता चला। मन में अक्सर यह भाव आता रघु राय सर के साथ काम करने , उनसे सीखने का कोई मौका मिल जाये… 27 सितम्बर 1989 की शाम घंटाघर स्थित हमारे वीना स्टूडियो के सामने एक सफ़ेद एम्बेसेडर आकर रुकी उसमे से श्री एन के सिंह ( इण्डिया टुडे के ब्यूरो चीफ़ ) उतरे ,मेरे पास आये कहा “जय ,रघु राय आये है…” यकीन कीजिए मैं तो जैसे सुध -बुध खो बैठा दौड़ पड़ा कार की तरफ , रघु राय सर को अपने द्वार पर पाकर अचम्भित भी था और बेहद प्रसन्न भी। सच कहूं ऐसा लगा जैसे भगवान भक्त के द्वार आ गए हों… वे स्टूडियो में आये हमने चाय पी फिर रघु राय सर ने मुझसे पूछा ” दो दिन हमारे साथ रहोगे ? ” मन तो कह रहा था कि दो दिन क्या मैं तो जीवन भर आपके साथ रहने को तैयार हूँ।

पांच लाख रूपये में दस फोटो…

दरअसल रघु राय सर उस समय 28 सितम्बर 1989 को हरसूद में देश के सबसे बड़े पर्यावरणीय आंदोलन को कवर करने आये थे जिसमे बाबा आमटे , सुंदरलाल बहुगुणा ,मेधा पाटकर ,शबाना आज़मी ,मेनका गाँधी सहित कई पर्यावरण विद शामिल होने वाले थे। रघु राय सर को उस समय टाईम मैगज़ीन का एक असाइनमेंट मिला था जिसमे नर्मदा पर एक कवर स्टोरी की जानी थी जिसमे उनके दस -बारह फोटो प्रकाशित होने थे जिसके लिए उन्हें उस समय पांच लाख रूपये मिलने थे और टेक्स्ट का असाइनमेंट उनकी पूर्व पत्नी श्रीमती उषा राय को मिला था उसका भी मानदेय इतना ही था। यह बताना जरुरी होगा कि तब हमें नईदुनिया में एक फोटो का पारिश्रमिक तीस से पचास रूपये मिलता था। कल्पना कीजिए कि 1989 में जो पांच लाख रूपये थे उसकी आज कितनी कीमत होगी ? खैर इस बात का ज़िक्र सिर्फ इसलिए कि आप इससे रघु राय सर की फोटोग्राफी का मूल्यांकन कर सकें।

चांवल में मिठाई , नए प्रयोग करते रहना चाहिए 

27 सितम्बर की शाम वे स्टूडियो से निकलकर सीधे एनवीडीए गेस्ट हॉउस पहुंचे , उन्होंने मुझे वहां डिनर में ज्वाइन करने को कहा। मैं राम होटल से ताजी बनी मलाईबर्फ़ी लेकर पहुंचा था ,मुझे लगा कि खाने के बाद स्वीट डिश के रूप में वे बाद में लेंगे लेकिन उन्होंने तो डब्बे में से मिठाई निकाली और चांवल में मिक्स करके खाने लगे। मैं हैरान था कि चांवल में कौन मिठाई मिलाकर खाता है ? मुझसे कहा देखो नए -नए प्रयोग करते रहना चाहिये…

...और वह पारस स्पर्श जिसने मेरी दृष्टि बदल दी 

डिनर के बाद थोड़ा इत्मीनान से बैठे तो मेरे पास तो सवालों का ढेर था , मेरा सबसे पहला सवाल था ” आप कौनसा कैमरा इस्तेमाल करते है ? ” उन्होंने जो जवाब दिया उसने मेरी दृष्टि और मेरा पूरा सोच ही बदलकर रख दिया। उन्होंने मुझसे पूछा “दुनिया में सबसे अच्छे कैमरे कौन बनाता है ? मैंने तुरंत कहा “जापान” निकॉन ,केनन , मिनोल्टा सभी बड़ी कंपनियां वहीँ की है। उनका अगला सवाल था “क्या दुनिया के सबसे अच्छे फोटोग्राफर सिर्फ जापान में ही है ? मैंने जवाब दिया “नहीं ,मुझे तो भारतीय फोटोग्राफर ज्यादा प्रभावित करते है ” राजा दीनदयाल के अठारहवीं सदी के फोटोस भी प्रभावित करते है और रघु राय से लेकर राजेश बेदी तक एक लम्बी फेहरिस्त है।

अब रघु राय सर ने ठंडी साँस ली और कहा “मैं यही कहना चाहता हूँ कि कैमरा सिर्फ एक टूल भर है ,असली चित्र तो पहले मन में बनता है। क्या तस्वीर लेना ? कब लेना ? किस क्षण को कैमरे में कैद करना ? यह महत्वपूर्ण है। आप साधारण कैमरे से भी अच्छी तस्वीर निकाल सकते है और महंगे अच्छे कैमरे से बकवास तस्वीर भी। कैमरे के पीछे जो दिमाग है ,मन है वह महत्वपूर्ण है। तब मैं तीन कैमरे ,ज़ूम लेन्सेस ,टेली वाइड एंगल आदि अपने बैग में रखता था ,एक ब्लेक एन्ड व्हाइट के लिए दूसरा कलर फोटोस और तीसरा ट्रांसपैरंसी के लिए। राय साहब ने कहा एक कैमरा रखों अपने लक्ष्य पर ध्यान दे सको ,यदि कैमरे में उलझकर मूवमेंट खो दिया तो कहाँ से अच्छी फोटो मिलेगी ? यह ऐसी सीख थी जिसने मेरी सोच को पूरी तरह बदल दिया , कैमरे से ज्यादा सब्जेक्ट महत्वपूर्ण हो गया। यह रघु राय सर का पारस स्पर्श ही था जिसने मेरे भीतर छिपे छायाकार को परिपक़्व बना दिया।

यह तस्वीर जो धरोहर बन गई

दूसरे दिन 28 सितम्बर हम साथ में हरसूद गए ,पूरे कार्यक्रम को कवर किया। उनका एनर्जी लेवल प्रेरित करने वाला था। तीसरे दिन हम ओम्कारेश्वर पहुंचे जहाँ ओंकारेश्वर के प्राकृतिक सौंदर्य से वे भी बहुत प्रभावित हुए। वहां नौकायन के दौरान हमारी यह तस्वीर एन के सिंह सर ने निकाली जो धरोहर बन गई।

जब उन्होंने एक भिक्षु महिला को अपनी कार में साथ बैठाया 

ओम्कारेश्वर से कार से लौटते हुए जब बस स्टेण्ड के सामने से गुजर रहे थे तब अचानक एक बुजुर्ग भिक्षु महिला कार के पास आई और कुछ कहने लगी वह निमाड़ी में बोल रही थी जिसे राय सर समझ नहीं पाए और उन्हें लगा कि कुछ मदद मांग रही है , उन्होंने तुरंत पर्स में से सौ रूपये निकाले और उसे दे दिए। थोड़ा आगे बढे तब भी वह महिला कुछ कह रही थी। रघुराय सर ने कहा कि शायद वह महिला कुछ और मदद चाह रही है , वापस लौटे और उससे समझा तो पता चला कि बस स्टेण्ड पर भीड़ बहुत होने से वह बस में बैठ नहीं पा रही है ,उसे मोरटक्का तक जाना था ,राय सर ने कार का दरवाजा खोल उस भिक्षु महिला को अपने पास बैठाया और फिर उसे मोरटक्का छोड़ा। सोचता हूँ कि क्या रघु राय साहब सिर्फ एक अच्छे फोटोग्राफर भर थे ? नहीं , वे बेहतर और संवदेनशील इंसान थे ,लोगो की मदद करना उनका स्वभाव था , यही मानवीय भावनायें ही उनकी खींची तस्वीरों में हमेशा परिलक्षित होती है। वे कैमरे से नहीं ,मन से तस्वीरें निकालते थे इसलिए वे मन को छू जाती थी…